मैं भावना शून्य, मन ही मन हिला हूं

जब जीजाजी अपना ईलाज करवाने कुछ माह पहले दिल्ली आए थे तो उनके रहते आंख खोलते ही सेलफोन पर एसएमएस व व्हाट्सएप देखने की आदत पड़ गई थी जोकि उनकी मृत्यु के बाद भी जारी रही। इस बीच प्रिय मित्र छोटे की पहले मां बीमार हुई व उनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी भाभीजी स्नेहलन बीमार हो गई। जब आदतन सुबह डरते-डरते फोन देखा तो एक बुरी खबर पढ़ी जोकि तड़के 4.50 पर उनके न रहने की थी। समझ में नहीं आया कि उन्हें कैसे सांत्वाना दूं। मुझे लगा कि आज कोविड युग में उसकी मौजूदगी के दौरान पढ़ना जितना मुश्किल है उससे भी कहीं ज्यादा मुश्किल किसी को उसका शिकार हो जाने के बाद दुनिया में न रहने से बाकी परिचित लोगों के लिए होता है। सब भावना शून्य बन जाते हैं।

जीजाजी की कानपुर में मौत हो जाने के बाद लॉकबंदी के चलते मैं इस अहम जरूरी अवसर पर उनके अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो पाया। थोड़ी देर बाद मित्र का एसएमएस आया कि हम लोगों को थोड़ी देर में मृत्यु प्रमाण पत्र मिल जाएगा। मैं उन्हें कानपुर ले जाना चाहता हूं मगर टेंपो ट्रक के चालाको ने कह दिया है कि कोरोना के शिकार व्यक्ति के पार्थिक शरीर को दिल्ली से बाहर लाने व ले जाने की हमे इजाजत नहीं है। कुछ देर बाद उन्होंने मृत्यु प्रमाण पत्र भेजते हुए डीएम या एसएसपी स्तर के अधिकारी से शव ले जाने के लिए अनुमति हासिल करने को कहा।

प्रमाण पत्र पर लिखा था कि उनकी मृत्यु कोविड बना कैंसर से हुई है। तमाम संपर्को ने बताया कि किसी भी कीमत पर हमें शव ले जाने की इजाजत नहीं मिलेगी। जोकि कोराना के मरीज तक को दूसरे राज्य अपने यहां आने से रोक रहे हो तो उसका शिकार बने व्यक्ति के शव को ले जाने की इजाजत देने का सवाल ही पैदा नहीं होती है।

मुझे यह भी बताया गया कि शव को कानपुर ले जाना तो दूर रहा। अस्पताल उन्हें उनका शव तक नहीं दिखाएगा। नियमानुसार उनके शव का लेपन कर उसे प्लास्टिक के खोल में लेजर कर अस्पताल के दो कर्मचारी उसे अपने साथ शवदाह गृह तक ले जाते हैं। वहां अंतिम संस्कार करने के पहले परिवार के दो खास लोगों को उनका चेहरा खोलकर अंतिम दर्शन करने की अनुमति दी जाएगी। मैंने उन्हें सारी स्थिति बता दी। फिर मित्र का एसएमएस आया कि वे शव को निकट स्थित पंजाबी बाग के शमशान की जगह निगम बोध घाट पर ले जा रहे हैं। क्योंकि वहां के कर्मचारी ठीक तरह से अंतिम दर्शन करने देते हैं।

आसपास कहीं भी दुकान पर पीपीई किट उपलब्ध न होने के कारण अपने मित्र आलोक की सलाह पर अंतिम संस्कार के लिए वहां न जाने का फैसला किया क्योंकि छोटे ने कहा था कि हम लोग ज्यादा देर इंतजार नहीं कर सकते। रविवार होने के कारण ड्राइवर छुट्टी पर था व वे निगम बोध घाट पर जा रहे थे। अंततः पत्नी ने घर में वहां से लौटने वालो के लिए खाना बनाने की तैयारी शुरू कर दी। मैंने उनके छोटे भाई को कई बार फोन किया। मुझे पता था कि वहां व्यस्त रहने के कारण उसे फोन उठाने में दिक्कत होगी।

कुछ घंटों बाद उसका फोन आया व उसने बताया कि वे लोग वापस नोएडा तक पहुंच चुके हैं। मैंने उसे बताया कि मैंने ड्राइवर को तुरंत घर आने को कहा है व उसके आते ही खाना लेकर आ रहा हूं। खैर हम लोग करीब एक घंटे के बाद नोएडा स्थित उसकी बेटी के घर के लिए रवाना हुए। हालांकि वहां पहुंचने पर पता चला कि नोएडा में ही रहने वाली उसकी बेटी के ससुर ने बाहर से खाना मंगवाने का प्रबंध कर लिया था। मगर मेरा मकसद तो उससे मिलना था?

सारे रास्ते भर मैं यह सोच-सोचकर परेशान होता रहा कि इन हालात में उससे किस तरह से मिलूंगा। मुझे डाक्टरो ने उससे लिपट कर गले मिलने तक से मना किया था। खैर हम लोग उसके घर पहुंचे तब तक अंतिम संस्कार के लिए गए सभी परिवार के सदस्य नहा चुके थे। वह मेरे पास ही आकर बैठ गए। सच कहूं तो मैं उस समय भावना शून्य हो गया। कोरोना ने मानो मेर शब्द चयन पर ही प्रतिबंध लगा दिया था।

मुझे उसके साथ बिताए गए बचपन के दिन याद आ गए। मुझे याद आया कि जब कुछ साल पहले मैं दिल्ली से उसके घर कानपुर गया था तो भाभीजी ने मेरी कैसी आवभगत की थी। वे बेहद दुखी था व संभलकर बातचीत कर रहा था। ऐसे हालात में कोई क्या कह सकता है। उसकी दोनों बेटियो की शादी हो चुकी है। एक पति के साथ अमेरिका में है व दूसरी पति के साथ नोएडा में रहती है।

छोटा बेटा अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करके विदेश जाने की तैयारी में हैं। वह कानपुर के अपने काफी बड़े घर में अब अकेला ही रह जाएगा। पहले मां की व अब पत्नी की अचानक मृत्यु के बाद वह एकदम अकेला पड़ गया है। कुछ देर तक चुप रहने के बाद उसने भावुक होते हुए कहा कि मां के जाने के बाद मनुष्य भावानात्मक रूप से अकेला हो जाता है व पत्नी के जाने के बाद वह कुछ नहीं कर पाता है। मुझे तो यह तक नहीं पता कि घर की किस अलमारी में कहां क्या रखा है व उसकी चाभियां कहां है। स्नेह (भाभीजी) को ही हर चीज का पता था। पिता के जाने पर परिवार को आर्थिक दिक्कतो से गुजरना पड़ता है पर पत्नी के जाने के कारण तो मानो जिदंगी का सबकुछ ही चला जाता है।

मैं कल्पना कर सकता हूं कि वह भाभीजी के न रहने के बाद इतने बड़े घर में अकेला जिदंगी कैसे काटेगा। उसे तो खाना बनाना दूर रहा सब्जी तक काटनी नहीं आती है। बच्चे भी उससे बहुत दूर है। करीब साल भर पहले ही वह सपत्नीक बेटी के पास अमेरिका घूमने गया था और अब वह दिल्ली से भी कानपुर अकेला जाएगा। उसके बारे में सोचकर भी मुझे डर लगने लगता है। ईश्वर से बस इतनी ही प्रार्थना कर सकता हूं कि वह उसे लड़ने की शक्ति दे। इस बीच उसने अब लोगों को कोरोना के बारे में शिक्षित करने के लिए सोशल मीडिया पर अपना अभियान तेज कर दिया है।

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