पहले डाकूओं का समर्पण अब नेता बनते है!

महात्मा गांधी की गांधीवादी विरासत की आचार-विचार में पालना और भूदान कराने वाले विनोबा भावे ने एक वक्त डाकुओं के आत्मसमर्पण की कोशिश की थी। पुलिस चंबल क्षेत्र में डाकूओं से निपटने में तब नाकाम रहती थी। सबसे पहले 1960 में विनोबा भावे के कहने पर 20 डकैतो ने आत्मसमर्पण किया। फिर कुख्यात डकैत मोहर सिंह ने अपने 100 साथी डकैतो व दूसरे छोटे-मौटे दलो के डकैतो के साथ आत्मसमर्पण किया था। मध्य प्रदेश में चंबल की घाटियों में डकैत सालों से अपना साम्राज्य चलाते आ रहे थे। वे जब चाहे डकैती डालते, हत्या कर लूटमार करते थे। पहले आचार्य विनोबा भावे व फिर जयप्रकाश नारायण ने उन लोगों को डकैती छोड़कर आत्मसमर्पण करने के लिए मनाया था।

उस समय अंतर्राष्ट्रीय टाइम पत्रिका के भारत स्थित संवाददाता विल्यिम स्टीवार्ड ने इस कार्रवाई को डकैतो के सामने सरकार का आत्म  समर्पण करार दिया था। लंबे बाल वाले एक डकैत रमेश सिकरवार ने भी तब आत्मसमर्पण किया था। उसे पुलिस पांच सालो से तलाश रही थी। उस पर व उसके आठ साथियों पर सरकार ने 1.45 लाख रुपए का ईनाम रखा था। उसके बाद तो आत्मसमर्पण की बाढ़ आ गई।

पहले मलखान सिंह व फिर फूलनदेवी ने एक बड़े कार्यक्रम में अर्जुनसिंह के सामने हथियार डालकर आत्मसमर्पण किया था। जिसका दुनिया भर में प्रचार-प्रसार हुआ। जब हाल में विकास दुबे द्वारा कानपुर, उत्तर प्रदेश की जगह मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में जाकर आत्मसमर्पण करने की खबर पढ़ी तो वह घटना याद हो आई। एक समय था जब लोग मध्य प्रदेश को आत्मसमर्पण का आर्दश प्रदेश  मानते थे। शायद इसकी एक वजह यह भी हो सकती है क्योंकि वहां अपराधी लोग अपने को कहीं ज्यादा सुरक्षित मानते हैं।

जब हाल ही में मध्य प्रदेश के मध्यमत में वहां होने वाले आत्मसमर्पण के बारे में पढ़ा तो लगा कि इतिहास की जानकारी रखने वाले तमाम पत्रकार एक ही समूह की सोच रखते हैं। इसमें कहा गया था कि अगर आप कानपुर के आठ पुलिस कर्मियों को नृशंस हत्या करने वाले विकास दुबे को मध्य प्रदेश के महाकाल मंदिर में कथित रूप से आत्मसमर्पण की बात पर गौर करें तो लगेगा है कि मध्य प्रदेश अपराधियों के समर्पण के लिए आदर्श  है। इस मामले में मध्य प्रदेश सरकार और पुलिस को महारत हासिल है।

मध्य प्रदेश में यह काम पिछले छह दशको से अबाध रूप से चल रहा है। पांच लाख का ईनामी विकास दुबे पुरे देश में सुरक्षित रहने के बावजूद 200 किमी की यात्रा कर बैखौफ मध्य प्रदेश में आ गया। उसे किसी ने एयरड्राप नहीं किया। विकास सड़क मार्ग से उज्जैन तक पहुंचा लेकिन उसे न तो किसी ने रोका न टोल नाका उसे पहचान पाया, नहीं किसी पुलिस चौकी पर उसकी जांच हुई। जबकि एक साधारण आदमी को 10 जगह पर परेशान किया जाता है और अपना परिचय देते-देते थक जाता है। जाहिर है कि विकास के उत्तर प्रदेश से मध्य प्रदेश लाने का उत्तरदायित्व मध्य प्रदेश की सत्ता और पुलिस ने उठाया। इस अभियान में तत्कालीन केंद्र और राज्य सरकारो का भरपूर सहयोग मिला।

दरअसल हमारे देश में बड़े नेताओं और दलों ने अपराधियों को बड़ा बढ़ावा दिया है जैसे पुजारी पत्थर के साथ करते हैं। पुजारी पत्थर को राजनीति के मंदिर में स्थापित कर उसे शिव शंकर बना देते हैं। वैसे ही हमारे नेताओं ने अपराधियों को विधानसभा व संसद में जाकर उन्हें माननीय बनाया है। कानपुर के निकट धरमपुरी गांव में 20 लोगों को एक लाइन में खड़ा कर गोली मारकर उनकी हत्या करने वाली फूलन देवी दो बार समाजवादी पार्टी के टिकट पर जीत कर लोकसभा पहुंची।

एक बार जब मुख्यमंत्री रहते हुए मुलायम सिंह यादव ने लखनऊ में एक प्रेस कांफ्रेंस में वहां के एक जाने माने अपराधी अन्ना को पार्टी में शामिल करवा रहे है तो उस पर सवाल उठाने वाले पत्रकार को उन्होंने झाड़ते हुए कहा कि क्या ह्रदय परिवर्तन करवाने का अधिकार सिर्फ विनोबा भावे को ही था। उन्होंने उसके राजनीति में प्रवेश को उसका ह्रदय परिवर्तन बताया था।

अपराधियों को समाज में कैसे इज्जत मिलती है इसका उदाहरण मुझे तब मिला जबकि एक बार आत्मसमर्पण करने वाले डाकुओ पर स्टोरी करने के लिए मैं ग्वालियर गया। वहां के एक पत्रकार ने मुझे एक महिला से मिलवाया और बाद में बताया कि यह एक जाने-माने डकैत की प्रेमी रह चुकी है। जब डकैत ने आत्मसमर्पण करने के बाद उसने ग्वालियर में मकान किराये पर लेकर रहना शुरू कर दिया तो शुरू में उसके पड़ोसी उस पर फत्तियां कसते थे। मगर जब एक दिन उन लोगों ने पेरोल पर बाहर आए उस डकैत को उसके घर से निकलते देखा तो वे लोग उन्हें आंटीजी कहकर प्रणाम करने लगे।

सरकार ने तो बिहार के एक अपराधी अतीत वाले सांसद को गृहराज्य मंत्री तक बना दिया। एक बार जनसभा में मैंने उनके इतिहास, भूगोल का खुलासा किया तो उन्होंने अगले दिन अपने दफ्तर में बुलाकर मुझसे कहा कि आपको सारी गलत जानकारी दी जा रही है। उन्होंने चाय व ड्राई फ्रूट मगवाएं व काजू की प्लेट मेरे सामने रखते हुए कहा कि काजू खाइए व भविष्य में स्वाद का मजा लेते हुए मेरे बारे में सही लिखिए। चुनाव के करीब तमाम उम्मीदवारों के बारे में खुलासे छपने के बाद भी राजनीतिक दल उनको टिकट देते हैं और वे जीतकर माननीय बनते हैं। इस काम में कोई भी दल पीछे नहीं। अब छप रहा है कि अगर विकास न मारा जाता तो एक दिन माननीय बन जाता।

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