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Saturday, April 17, 2021
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किसान आंदोलन व शरद जोशी का न होना

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देश में जबरदस्त किसान आंदोलन चल रहा है और इस दौरान जाने माने किसान नेता व उनके हितैषी शरद जोशी का नाम नहीं होने के कारण उनकी कमी बहुत खल रही है। वे आज इस दुनिया में नहीं है। एक समय वह भी था जब वे देश में छाए हुए थे। याद दिला दे कि शरद अनंत राव जोशी ने सासंद राजू शेट्टी के साथ मिलकर किसान के हित की चिंता में स्वाभिमानी शेतकरी संगठन की स्थापना की थी। वे जाने माने अर्थशास्त्री व नेता थे। उन्होंने स्वतंत्र भारत पक्ष नाम से पार्टी बनायी थी व शिवसेना व भाजपा के सहयोग से राज्य सभा में गए। हालांकि वे 1991 विधानसभा का चुनाव हार गए थे।

उन्होंने 2015 में संविधान के जनप्रतिनिधि कानून से समाजवाद शब्द बाहर निकालने के लिए निजी विधेयक भी प्रस्तुत किया था। वे महाराष्ट्र के सतारा इलाके के रहने वाले थे। उन्होंने भारतीय डाक सेवा से संयुक्त राष्ट्र में अपनी नौकरी शुरु की थी। बाद में वे जाने माने अर्थशास्त्री बन गए। उन्होंने किसानों के लिए शेतकरी संगठन बनाकर प्याज, कपास व गन्ना किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य दिलवाने के लिए आंदोलन किया। संयुक्त राष्ट्र से लौटने के बाद उन्होंने पुणे के निकट जमीन खरीद कर खेती करना शुरु कर की थी।

आज दिल्ली के आसपास जो हो रहा है उन्होंने वह काम 1979 में ही किसानों को उनकी प्याज की फसल का उचित मूल्य दिलवाने की मांग को लेकर पुणे-नासिक राजमार्ग जाम कर दिया थाा। तब किसानों को सही दाम न मिलने से नाराज होकर प्याज को सड़कों के किनारे फेंकना शुरु कर दिया था। उन्होंने भारत बनाम इंडिया शब्द दिया व उनका मानना था कि ग्रामीण भारत के किसानों की समस्या को जब तक जोर के साथ नहीं उठाया जाएगा तब तक शहरों में रहने वाले लोग उनकी समस्याओं से परिचित नहीं होंगे व किसानों को न्याय नहीं मिलेगा।

उन्होंने किसानों को शहरों के मार्ग अवरुद्ध करने के लिए कहा जिसमें रेलगाड़ियों की पटरी से लेकर राजमार्ग अवरुद्ध करना तक शामिल था। प्रदर्शनकारी किसान यही कर रहे हैं। उस समय उनकी गिनती देश के तीन बड़े किसान नेताओं महेंद्र सिंह टिकैत (भारत किसान यूनियन) व एमडी नंजुंडास्वामी के साथ होती थी। इन तीनों ने कृषि के क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रवेश के विरोध में उनके बिक्री केद्रों को आग लगा दी। उन्होंने महाराष्ट्र में सरकार द्वारा कपास खरीदने के एकाधिकार व उसे राज्य के बाहर ले जाने पर लगी रोक को खत्म करवाया।

शरद जोशी ने धारा प्रवाह भाषण से अलग चलने का इतिहास बनाया था। जब 9 मार्च 2010 में राज्यसभा में ऐतिहासिक महिला आरक्षण बिल पेश हुआ तो वे उसके विपक्ष में मतदान करने वाले सांसद थे। आज यह माना जाता है कि महिलाओं के राजनीतिक सशक्तीकरण का विचार दिवंगत राजीव गांधी का था जिसे देवगौड़ा ने 1993 में खासी अहमियत दी। शरद जोशी के मुताबिक उनके संगठन शेतकरी संगठन व महिला अघाड़ी ने सबसे पहले इस बारे में सोचा था व 1986 में ही महाराष्ट्र के पंचायती राज चुनावों में 100 फीसदी महिला पैनलों की व्यवस्था करने का प्रस्ताव किया था।

तब वहां कांग्रेस के शंकर राव चव्हाण की सरकार थी और वे उनके इस ऐलान से इतना घबरा गए कि उन्होंने तीन साल तक पंचायत चुनाव करवाने की हिम्मत ही नहीं की। 1989 के बाद चुनाव करवाए व इसी दौरान पंचायतों में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने वाला विधेयक महाराष्ट्र विधानसभा में पेश किया। उसके बाद में केंद्र ने उसे संसद में प्रस्तुत किया। जोशी को इस बात का बहुत दुख था कि किसी ने यह आरक्षण विधेयक तैयार करते समय उसे गहराई से व गंभीरता से नहीं पढ़ा। शरद जोशी का कहना था कि उन्होंने महिला आरक्षण विधेयक का इसलिए विरोध किया था क्योंकि उनका मानना था कि अगर पंचायत राज पूरी तरह से महिला को सौंप दिया जाता तो कहीं बेहतर होता।

उनका मानना था कि बारी-बारी से महिलाओं के लिए चुनाव क्षेत्र आरिक्षत करना, या लाटरी के जरिए उनके लिए निर्वाचन क्षेत्र चुनना अच्छी बात नहीं है। यह तो देश के लोकतंत्र के लिए खतरा है। अगर हम लाटरी से सीट का चयन करते हैं तो हो सकता है कि किसी क्षेत्र विशेष की कोई महिला इस क्षेत्र से चुनाव लड़ने के लिए तैयार ही न हो और जो पुरुष उम्मीदवार काफी लंबी समय से अपने चुनाव क्षेत्र में काम करता आया हो उसमें महिलाओं के प्रति बेवजह कटुता पैदा हो जाए।

एक बड़ा खतरा यह भी है कि तमाम नेता अपने घर के ऐसे महिलाओं को इन सीटों से चुनाव लड़वा दे जिन्होंने कम से कम उस क्षेत्र में रुचि दिखाई हो व राजनीतिक कार्यशालाओं में हिस्सा ही न लिया हो। जीतने वाली महिला यह सोच कर अपने चुनाव में भी हिस्सा न लेती हो कि पता नहीं कि उसे लाटरी के कारण अगली बार चुनाव लड़ने का मौका मिलेगा या भी नही। इस बात की क्या गारंटी है कि 33 फीसदी आरक्षण के बाद वह महिलाएं दोबारा जीत सकेगी। यह विधेयक तैयार करते समय जरा भी दिमाग नहीं लगाया गया था। यही कारण था कि वह विधेयक इतने लंबे अरसे से लटका हुआ है।

शरद जोशी जनरल एग्रीमैंट आन ट्रेड एंड टैरिफ (जीएसटी) व 1995 में भारत के डब्ल्यूटीओ में शामिल होने के पक्ष में थे। वे खुले बाजार व प्रतिस्पर्धा के पक्षधर थे। एपीएमसी की श्रृंखला के खिलाफ थे। उनका मानना था कि सहकारी बाजार में किसानों को अपने उत्पाद का सही दाम नहीं मिल पाता। जब दूसरे किसान नेता सब्सिडी को मांग कर रहे थे तब जोशी खुले बाजार की दलील दे रहे थे। उनका कहना था कि सरकार आम लोगों को सस्ते में अनाज उपलब्ध करवाने के लिए किसान की लागत तक वसूल नहीं होने देती है। उनके संगठन ने उनके न होने बावजदू सरकार द्वारा किसानेां के लिए तैयार किए गए तीनों कानूनों का स्वागत किया था।

उनके संगठन के मौजूदा अध्यक्ष अनिल घनवत के मुताबिक एपीएमसी से चंद लोग किसानों को सस्ती दरों पर अनाज बेचने के लिए मजबूर कर उनका शोषण करते है। यह गुट खुद को वामपंथी विचारधारा से प्रेरित मानता है। जहां एक ओर संगठन ने केंद्र के कृषि कानूनों का समर्थन किया है वही उसने प्याज के निर्यात पर लगी रोक भी समाप्त करने की मांग की है। मांग न माने जाने पर भाजपा के सांसदों को प्याज की मालाएं पहनाने की धमकी दी मगर दुख तो इस बात का है कि आज शरद जोशी दुनिया में नहीं हैं व देश का कोई किसान उनकी दलीलों को स्वीकार नहीं कर रहा है व किसानों का सरकार पर से विश्वास उठ गया है।

आज उनके तरीके से रास्ते रोक कर अपनी मांगों को मनवाने का आंदोलन है। इतने बड़े आंदोलन में उनका संगठन पूरी तरह से चर्चा के बाहर है। मगर संगठन के संस्थापक रहे एक पूर्व सांसद राजू शेट्टी ने प्रधानमंत्री से कहा है कि वे स्तालिन की तरह से बरताव न करे। यहां याद दिला दे कि उन्होंने शरद जोशी से मतभेद हो जाने के बाद 2004 में अपना अलग स्वाभिमानी शेतकरी संगठन बना लिया था व 2009 के लोकल चुनाव में स्वाभिमानी पक्ष के टिकट पर जीते व सांसद बने। 2014 में एनडीए में शामिल हो गए थे। अब वे खुलकर शेतकरी संगठन व मोदी सरकार के खिलाफ हो गए हैं व उन्होंने प्रधानमंत्री पर अडानी व अंबानी के एजेंट के रुप में काम करते हुए कृषि कानून बनाने का आरोप लगाया है।

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