अपराधी का खौफ कैसे खत्म हो?

खबरिया चैनलों परजब कानपुर के दुर्दांत अपराधी विकास दुबे के किले जैसे विशाल घर पर उसके ही बुलडोजर के जरिए घर को गिराते हुए देखा तो लगा कि बहुत जल्दी ही तमाम खबरिया चैनलो पर इस कांड की चर्चा शुरू हो जाएगी। मानवाधिकार समर्थक पीपी करते हुए पुलिस को कोसते हुए कहेंगे कि उसने यह कदम उठाकर गलत काम किया है। आखिर पुलिस उसे सजा देने वाली कौन होती है?

इस घटना को देखकर मुझे पुरानी कुछ बातें यादहोआई। एक समय था जबकि देवराज दीवान नामक दिल्ली का एक अपराधी बहुत चर्चा में आ गया  था। आनंद पर्वत इलाके में उसका दबदबा था। तब पूर्व सैन्य अधिकारी एचएल कपूर दिल्ली के उपराज्यपाल बने तो उन्होंने आनंद पर्वत इलाके में स्थित उसकी बहुमंजिली इमारत को सरकारी बुलडोजरो से ध्वस्त करवाकर खबरिया चैनलो पर जमकर प्रचार करवाया। बाद में उन्होंने कुछ संवाददाताओं को विश्वास में लेकर कहा कि पिछले कुछ समय से दिल्ली में अवैध निर्माण बहुत तेजी से बढ़ रहे थे। लोगों के दिल से कानून व सरकार का डर निकलता जा रहा था। इसलिए मैंने शहर के सबसे बदमाश व संपर्क संपन्न व्यक्ति के अवैध निर्माण को तोड़ने का फैसला दिया था।

मतलब दिल्ली में यह संदेश जा सके कि जब सरकार इसके अवैध निर्माण के खिलाफ इतना कड़ा कदम उठा सकती है तो ऐसा अन्य अवैध निर्माण के खिलाफ भी कर सकती है। इससे अवैध काम को लेकर लोगों के मन में डर पैदा होगा। विकास दुबे बेहद जघन्य अपराधी था। उसकी स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब एक बहुत बड़े हत्याकांड में उस पर मुकदमा अदालत में पेश हुआ तो इस हत्याकांड के चश्मदीद गवाह एक पुलिस वाले तक ने अदालत में उसके खिलाफ गवाही नहीं दीऔर विकास दुबे बरी हो गया।

वह इतना खतरनाक था कि उसने अपने गांव के लोगों की जमीन पर कब्जा करके वहां अपना किले जैसा घर बना रखा था जहां वो व उसके पिट्ठू रहा करते थे। कहते है कि उसके लिए एक पास के थानेदार ने अपने ही साथ के पुलिस वालो के खिलाफ मुखबरी की व उसके कारण आठ अधिकारी मारे गए। वह समय रहते साफ बच निकला। इससे उसके आतंक व उसके प्रति लोगों के मन में भरे डर का अंदाजा लगाया जा सकता है। अफवाह तो यह भी थी कि उसने गोलीकांड में मारे गए एक आला पुलिस अफसर के हाथ पैर भी काट दिए थे ताकि पुलिस को और ज्यादा आतंकित किया जा सके।

मुझे याद है जब पंजाब में आतंकवाद का दौर खत्म करने के लिए केपीएस गिल ने अपना अभियान शुरू किया तो वे इलाके के जाने माने आतंकवादी के घर पर स्थानीय बदमाशों से हमला कर उसका पैसा साजो-सामान लूटा देते थे। इस काम में भी स्थानीय आम नागरिक की मदद लेते थे। तब एक बार शाम को उन्होंने आपसी बातचीत में कहा था कि मेरा काम सिर्फ आतंकवादियों को सबक सिखाना ही नहीं बल्कि उन्हें व इलाके के लोगों के लिए सार्वजनिक संदेश भी देना है।

आम आदमी को उसके घर पर हमलों को लेकर उसका सामान लूटवा कर हम यह सोच देना चाहते हैं कि उनकी मनमानी व जनता पर छाया डर समाप्त हो गया है व अब आम आदमी भी उससे बदला लेने के लिए तैयार हो चुका है। उनकी रणनीति रंग लाई व देखते ही देखते तमाम जाने-माने आतंकवादी मारे गए। एक आला पुलिस अधिकारी का कहना था कि कुख्यात बदमाशों के डर से उनके खिलाफ कोई गवाही देने नहीं आता क्योंकि उसके बदले में उसके मारे जाने से डरते थे व आराम से अपराधी बरी हो जाते। इसको मिटाने का एक ही तरीका है कि इन्हें इस धरती से साफ कर दिया जाए। सुनने में यह बात मानवधिकार समर्थको को बुरी लग सकती है मगर इनका और कोई ईलाज नहीं है।

हम यह भूल जाते है संतोष शुक्ला को तो उसने थाने के अंदर मारा था। पुलिस वाले उसके आतंक के कारण उसके लिए मुखबरी करने लगे व उन्हें सबक सिखाने के लिए उसने दबिश देने आए पुलिस के अधिकारियों को चुन-चुन कर मारा था। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि वह कितना खूंखार था। अब तक की जांच में यह पता चल चुका है कि पुलिस द्वारा दबिश किए जाने की खबर उसके पास के ही एक थाने के पुलिस अधिकारी ने दी थी।

पुलिस के मुताबिक उसने पुलिस के लोगों को उन्हीं के हथियारो से हत्या करके नक्सली माओवादी द्वारा अपनाई जाने वाली आतंक की नीति का परिचय दिया। उसने उन पर हमला करने के पहले अपने साथियो को घर बुलवा लिया था व घर की छत पर उन्हें तैनात कर नीचे मुकाबला करने आए पुलिस दल पर हमला किया था। पुलिस कर्मियो के हथियारो से उनके सिर कंधे व छाती पर गोलियां मारी गई थी। उसके विशाल घर में छुपने के लिए बंकर बना हुआ था व उसकी दीवार 12 फुट ऊंची थी जिसके चारो और कंटीले कंटसेनटीज तार लगे थे। जिनका आमतौर पर सेना सीमा पर इस्तेमाल करती है।

उसके घर में चार काफी बड़े-बड़े कमरे थे जिनमें ऐशो-आराम का सामान उपलब्ध था। घर में हर कोण पर 16 सीसीटीवी कैमरे लगे हुए थे ताकि वह आने जाने वालों पर नजर रख सके। वह भागते समय इन कैमरो की वीडियो रिकार्डिंग ले जाने में कामयाब रहा। जहां एक और योगी सरकार अपने कार्यकाल के दौरान बड़ी तादाद में अपराधियों के सफाया का दावा कर रही है वहीं विकास दुबे का यह हमला सरकार व राज के कानून की हालात बयां करते हैं।

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