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Saturday, April 17, 2021
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क्या नाम है जेल भेजे गए हाईकोर्ट जज का?

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जब मैं रात को रजाई में लिपटा हुआ बिस्तर पर बैठे हुए कौन बनेगा करोड़पति देखता हूं तो मुझे लगता है कि किसी-न-किसी दिन मैं इस कार्यक्रम में यह सवाल जरूर देखूंगा कि उस भारतीय जज का नाम बताए जोकि देश के पहले व संभवतः एकमात्र ऐसे थे जोकि सुप्रीम कोर्ट द्वारा उसकी मानहानि करने के आरोप में 6 माह के लिए जेल भेजे गए व जिसे महिला वकीलो को अपमानजनक संदेश भेजने के अपराध में गिरफ्तार किया गया था।

इस सवाल का जवाब जानने के लिए सबको जस्टिस करनन का नाम याद कर लेना चाहिए। उनका पूरा नाम जस्टिस चिन्नास्वामी स्वामीनाथन करनन है। वे 12 जून 1955 को तमिलनाडु (पहले मद्रास) में पैदा हुए थे। दलित परिवार में पैदा हुए करनन अपने आठ भाई-बहनों में दूसरे नंबर पर थे। उनके पिता अध्यापक थे। कानून की डिग्री हासिल करने के बाद करनन वकालत करने लगे व अनेक सरकारी संस्थाओं ने उन्हें अपना कानूनी सलाहकार नियुक्त किया।

सन् 2009 में मद्रास होईकोर्ट के चीफ जस्टिस अशोक कुमार गांगुली ने जज नियुक्त करने वाले कॉलेजियम में उनका नाम भेजते हुए उन्हें जज नियुक्त करने के लिए कहा। हालांकि वे खुद व कॉलेजियम के अन्य सदस्य करनन के नाम से परिचित नहीं थे। उस समय कॉलेजियम के प्रमुख भारत के प्रधान न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन थे जिन्होंने करनन के नाम पर मोहर लगा दी। बाद में जस्टिस गांगुली ने ‘द हिंदू’ अखबार से बातचीत में यह खुलासा किया कि उन्होंने करनन को दलित होने के कारण जज बनाया था ताकि दलित लोग भी जज बन सके। जस्टिस गांगुली समेत कॉलेजियम के अन्य सदस्यो ने अपने इस फैसले पर खेद जताते हुए कहा कि उनसे बहुत बड़ी गलती हो गई।

इसकी वजह जस्टिस करनन का व्यवहार था। उन्होंने नवंबर 2011 के राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग को पत्र लिखकर मद्रास होईकोर्ट के न्यायाधीश के द्वारा अपने साथ जातिगत भेदभाव करने का आरोप लगाया। इतना ही नहीं उन्होंने अपने चैंबर में प्रेस कांफ्रेंस आयोजित की। वे 2009 से अपने साथ दुर्व्यवहार महसूस करते आए थे जोकि अभी तक जारी है। उन्होंने एक न्यायाधीश पर किसी  कुर्सी पर बैठे हुए उन्हें पैर मारने का आरोप लगाया। इसके कारण हाईकोर्ट में हंगामा मच गया व अनुसूचित जाति के अध्यक्ष व कांग्रेसी नेता पीएल पूनिया ने करनन की शिकायत पत्र को सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस एसएच कपाडि़या के पास कार्रवाई के लिए भेज दिया। बाद में यह मामला दब गया।

जस्टिस करनन ने अपने एक विवादास्पद फैसले में कहा कि अगर कोई शादी का वादा करके सैक्स करता है तो उसे शादी माना जाएगा। जब उनके इस फैसले की आलोचना हुई तो उन्होंने सफाई दी कि उनका उद्देश्य किसी की भावनाओं को आहत करना नहीं है। वे देश की सांस्कृतिक अखंडता को बरकरार रखने के लिए ऐसा कह रहे थे ताकि विभिन्न धार्मिक व जातीय समुदायों में एकता बनी रहे।

उनका नाम दूसरी बार विवादो में तब आया जब जनवरी 2014 में करनन मद्रास होईकोर्ट में एक जनहित याचिका की सुनवाई कर रही खंडपीठ के कमरे में घुस गए। यह मामला कुछ जजो की नियुक्ति का था। उन्होंने बेंच से कहा कि जजो का चयन गलत हुआ था। वे इस मामले में अपनी और से एक हलफनामा दायर करना चाहते हैं। तब सुप्रीम कोर्ट ने उनके इस बरताव पर दुख जताया था। उनका कहना था कि हम लोग उनके इस बरताव से बौखला गए।

तब मद्रास होईकोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस राजेश कुमार अग्रवाल ने सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश पी सदाशिवम से करनन का तबादला किसी और न्यायालय में करने का अनुरोध किया था। हालांकि करनन ने दोनों ही मुख्य न्यायाधीशो को पत्र लिखकर कहा कि वे अपने आरोपो को सही साबित करने के लिए मद्रास होईकोर्ट में ही रहना चाहते हैं। उन्होंने जिला जजो की नियुक्ति में हेराफेरी के आरोप लगाए। उन्होंने देश के राष्ट्रपति को पत्र लिखकर इन जजो की नियुक्ति की प्रक्रिया बताने की मांग की।

उनकी हरकतों से परेशान होकर मद्रास होईकोर्ट के 20 न्यायाधीशो ने एक पत्र लिखकर चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया से करनन को मद्रास होईकोर्ट से कहीं और भेजे जाने की मांग की थी। उन्होंने 2015 में एक अन्य जज पर अपनी अदालत में काम करने वाली एक महिला का अपने चैंबर में शारीरिक शोषण करने पर आरोप लगाए। हालांकि वे अपने आरोपो को प्रमाणित नहीं कर सके। उन्होंने 2015 में उन्होने बेकार के मुकदमे दिए जाने का आरोप लगाया व फरवरी 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने करनन का तबादला कलकत्ता हाईकोर्ट कर दिया।

करनन ने 23 जनवरी 2017 को प्रधानमंत्री को भेजा गया अपना वह पत्र अखबारो में छपवाया जिसमें सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट के 20 भ्रष्ट न्यायाधीशो की पहली सूची शामिल थी। उनका दावा था कि वे आगे चलकर और भी नाम जारी करेंगे। करनन ने तब इंतहा कर दी जब उन्होंने 8 मई 2017 को चीफ जस्टिस व सुप्रीम कोर्ट के सात अन्य न्यायाधीशो को अनुसूचित जाति जनजाति कानून के तहत पांच-पांच साल की कड़ी सजा सुना दी। उनकी इस हरकत से परेशान व शमिंदा होकर सुप्रीम कोर्ट ने अगले ही दिन सुप्रीम कोर्ट की अवमानना करने के अपराध में 6 महीने की कैद की सजा सुनाई।

उसके बाद करनन लापता हो गए। कहा जाता है कि वे नेपाल व कलकत्ता में रहे। वे 12 जून को रिटायर हुए व अगले ही दिन उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। कलकत्ता पुलिस ने उन्हें कोयंबटूर से गिरफ्तार किया। 6 माह की सजा काटने के बाद उन्हें 20 दिसंबर 2017 को जेल से रिहा कर दिया गया। पहले लगता था कि जज करनन का विवाद यहीं समाप्त हो जाएगा व वे इस घटना से कुछ सबक लेंगे। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। कुछ दिनों पहले चेन्नई पुलिस की साइबर अपराध शाखा ने उन्हें अनेक जजो व उनके परिवार के सदस्यो के खिलाफ सोशल मीडिया पर अश्लील व अपमानजनक बातें लिखने के अपराध में गिरफ्तार कर लिया।

ऐसा करने के लिए मद्रास हाईकोर्ट राज्य के पुलिस महानिदेशक व चेन्नई के पुलिस आयुक्त को लताड़ते हुए कहा कि वे लोग उनके खिलाफ मामले दर्ज किए जाने के बावजूद कोई कार्रवाई क्यों नहीं कर रहे हैं। बाद में उन्हें एक मिजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया जिसने उन्हें जेल भेज दिया। किसी ने सही ही कहा है कि पुरानी आदते बहुत मुश्किल से छूटती है व इंसान अपनी गलतियों से सबक नहीं लेता है।

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