राजेश पायलट की और यादे - Naya India
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राजेश पायलट की और यादे

जब मैंने पिछले दिनों अपने कॉलम में सचिन पायलट के पिता राजेश पायलट के बारे में लिखा तो मेरे पास मेरे मित्र व पाठक कुमुद बिहारी सिंह समेत तमाम पाठको के फोन आए। उन्होंने मुझे राजेश पायलट के अतीत व उनके साथ हुए अनुभवों के बारे में विस्तार से लिखने को कहा। मेरा मानना है कि राजेश पायलट एक अच्छे नेता ही नहीं एक अच्छे इंसान भी थे। उन्होंने रिपोर्टिंग के मामले में मेरी इतनी मदद की थी कि मैं उसे कभी भुला नहीं सकता।

मैंने एक समय उनकी मदद से कांगेस में काफी हलचल मचा दी थी।  राजेश पायलट का बचपन बेहद गरीबी व गुमनामी में शुरू हुआ था। वे कहते थे कि जिस व्यक्ति को अपनी जन्मतिथि तक मालूम न हो उसके बारे में क्या कहा जा सकता है। पहनने के लिए पर्याप्त कपड़े नहीं होने के कारण वे एनसीसी की वर्दी पहन कर स्कूल जाते थे व एक बार तो अपने फटे कपड़ो के कारण उन्हें 1500 छात्रों के सामने प्रधानाचार्य की लताड़ सुननी पड़ी। वे कहते थे कि हमारे देश में निर्धनता का कोई रिकार्ड नहीं रखता है। मां-बाप तक नहीं। वे गांवों के गरीब बच्चो की तरह गाय के साथ तालाब में नहाते, तैरते व दोपहर को पिता के लिए खाना लेकर खेत जाते थे। जब प्राइमरी स्कूल में पढ़ रहे थे तभी उनके पिता चल बसे थे। उस समय पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दादरी के निकट बैदपुरा गांव में रहते थे।

वे रेल यात्रा के बहुत शौकीन थे। जब खेत के पास से गुजर रही मालगाड़ी रूक जाती तो उसमें दूसरे बच्चो के साथ चढ़ जाते थे। उनका चचेरा भाई नत्थी शौकीन मिजाज था व दिल्ली में डेरी चला कर दूध बेचता था। उसकी आय कम व खर्च ज्यादा थे। अतः वह अपना काम करवाने के लिए राजेश पायलट को दिल्ली ले आया व पायलट भी 112 गुरुद्वारा रकाबगंज स्थित दूध डेरी में रहने लगे। रात को रजाई की आस में ठिठुरते हुए सोना व ठंड लगने पर भैंस से लिपट जाना उनकी आदत थी।

सुबह होने पर भैसो को चारा डालने, दूध दुहने में जुट जाते थे। मार्च महीने के आने का इंतजार करते ताकि सर्दिया कम हो जाए। उनकी जिदंगी मशीन बनकर रह गई थी। भैंसे दुहने के लिए उनका स्कूल में भी मजाक किया जाता। वे उनकी गरीबी पर हंसते थे। वे गोल मार्केट के डीएवी स्कूल में अपने फटे कपड़ो के कारण काफी चर्चित हो गए थे। प्रधानाचार्य तक ने उनसे कहा था कि फटे कपड़े छात्रो को शोभा नहीं देते हैं। एक दिन तो हिम्मत करके उन्होंने कह दिया छात्र इसलिए पढ़ता है ताकि वह कमा सके व मांगने के बजाए कपड़े खरीद सके। मुझे अफसोस है कि आपको मेरे कपड़ो के कारण शर्म आ रही है।

घर में विधवा मां व बहने व एक छोटा भाई था। अतः दुखी होने पर वो वापस गांव नहीं लौटते। एक बार जब राजेश पायलट भैंस दुह रहे थे तो किसी के आने की आहट सुनकर पीछे घुमे तो देखा कि वहां प्रधानाचार्य थे। उन्होंने कहा कि मैं घूमने जा रहा था और उन्हें एक छोटा-सा पार्सल दे गए। दूध बांट कर आने के बाद जब राजेश पायलट ने उसे खोला तो उसमें से एनसीसी की वर्दी निकली। उसमें एक कागज रखा था जिस पर लिखा था कि मेरी पृष्ठभूमि भी तुम्हारी जैसी थी। हम मांगकर चीजे नहीं लेते पर तुम अब नेशनल कैडेड कोर के साथ इसे पहनकर स्कूल आना।

जब वे नवी कक्षा में आए तो उन्होंने म्यूनिसिपल सेकेंडरी स्कूल में दाखिला लिया। उन्होंने विज्ञान के लिए अंग्रेजी माध्यम को चुना। उनकी अंग्रेजी को लेकर उनका उपहास उड़ाया जाता था। जब वे दसवीं कक्षा में थे तो उन्होंने राष्ट्रीय रक्षा अकादमी एनडीए का पर्चा भर उसकी परीक्षा के लिए उसका शुल्क 37-50 रुपए जुटा पाना बहुत बड़ा काम था। वे अपने कागजातों को अटैस्ट करवाने के लिए साउथ ब्लाक तक पहुंच कर वहां सुबह आने वाले अफसरो की कारो को रोकने की कोशिश करने लगे। संयोग से एक कार में बैठे लेफ्टीनेंट कर्नल पी एल नेगी उन्हें अपने साथ कार में बैठाकर दफ्तर ले गए व कागजो पर दस्तखत करने के बाद मार्गदर्शन के लिए उनसे अपने घर आने को कहा।

उसके बाद पायलट नियमित उनके तालकाटोरा रोड स्थित उनके आवास पर जाने लगे। दुर्भाग्य से वह रक्षा एकादमी में दाखिला पाने की परीक्षा में असफल हो गए पर हकीकत कि उन्होंने तालकटोरा रोड पर लगे खंबो की बत्तियो के नीचे देर रात तक पढ़ना शुरू कर दिया। जब वे उच्च माध्यमिक कक्षा में गए तब उन्हें एयरमैन की नौकरी मिली। तब उन्हें महीने में सौ रुपए मिलने थे। उन्होंने नौकरी नहीं स्वीकारी और ज्यादा मेहनत से आगे की पढ़ाई करने मेरठ चले गए क्योंकि कम अंक होने के कारण उन्हें दिल्ली के किसी कॉलेज में दाखिला नहीं मिला।

उन्होंने जेबी कॉलेज बड़ौत में दाखिला लिया। वहां रहते हुए उन्होंने सैन्य अधिकारियेां के प्रशिक्षण स्कूल का टेस्ट दिया  व साक्षात्कार में चुन लिया गए। अंतिम चुनाव के लिए इलाहाबाद जाना पड़ा था। उसके लिए उन्हें एक मच्छरदानी. पीटी के जूते खरीदने पड़े जोकि बहुत मंहगे थे। वहां पहुंचने पर उन्होंने पाया कि उनके अलावा सभी उम्मीदवारों के साथ बहुत अच्छा बरताव किया जा है। उनका समान लेने आए एक आई ने उनकी और व्यंग्य भरी मुस्कान से पूछा कि बस इतना ही सामान है। उनके साथ शर्मनाक बरताव किया। वह चुन लिए गए।

एक दिन जब वे रेस्तरां में बैठे चाय पी रहे थे तो उन्होंने एक अखबार में पढ़ा कि भारतीय वायुसेना के विमान चालको की जरूरत है। इंटरव्यू में उनसे पूछा कि क्या तुम कोई खेल खेलते हो। हां करने पर दोबारा पूछा गया कि कौन-सा खेल खेलते हो। उनसे फिर पूछा कि कितने खिलाड़ी होने से चाहिए। पायलट ने 11 कहा। जबकि उन्होंने जिदंगी में कोई खेल नहीं खेला। जब उनसे पूछा कि बॉलीबॉल में कितने सदस्य हाते हैं तो उन्होंने कहा कि सर मैं कोई खेल नहीं खेलता। पर मुझे सेना में भरती होने का चाव है।

वहां उनके चुने जाने के बाद यह तय करने में दिक्कत हुई कि वे वायुसेना चुने या थलसेना। वायुसेना में वेतन अधिक था अतः उन्होंने वायुसेना को चुना। जब वे प्रशिक्षण के लिए कोयबंटूर गए तो उन्होंने महसूस किया कि गरीबी तो उनका पीछा छोड़ चुकी मगर अंग्रेजी अच्छी न होने के कारण उनका उपहास उड़ाया जाता रहा। उन्होंने अंग्रेजी सीखी। देर रात तक जागकर पढ़ाई करने लगे व फिर उन्हें प्रशिक्षण के लिए आगे भेज दिया। वे बताते थे कि एक बार उड़ान भरते समय एक पेट्रोल की टंकी खाली होने पर मैं दूसरी टंकी को चालू करना भूल गया व मुझे लगा कि मेरा विमान दुर्घटनाग्रस्त हो जाएगा। मगर वह हवा की शक्ति से बढ़ता रहा। वे सफलतापूर्वक उतर आए।

जब बेगम पोट में उन्हें पायलट का बैज मिला तो वे शायद यह सम्मान पाने वाले एकमात्र गुर्जर थे। अब वे अफसर राजेश्वर प्रसाद बन गए थे। उनकी उत्तर पूर्व में नियुक्ति कर दी गई। 12 मार्च 1974 में दिल्ली के शाहदरा के गांधी नगर में रहने वाली रमा उनकी पत्नी बनी। रमा कांग्रेस में सक्रिय थी। उन्होंने इस्तीफा देकर दिवंगत इंदिरा गांधी से मुलाकात की। उन्होंने उनसे कहा कि वे बागपत से चरणसिंह के खिलाफ चुनाव लड़ना चाहते हैं। इंदिरा गांधी ने उनके अपने फैसले पर पुनर्विचार करने को कहा। वे चुनाव लड़े। उसके बाद उन्होंने दौसा से चुनाव लड़े व जीते।

दौसा से चुनाव के लिए परचा भरते समय उनके किसी समर्थक के कहने पर अपने नाम के आगे पायलट जोड़ दिया और वे राजेश्वर प्रसाद सिंह विधूड़ी से राजेश पायलट हो गए। वे केंद्र में संचार व गृह राज्य मंत्री रहे। उन्होंने विवादास्पद तांत्रिक चंद्रास्वामी को जेल भिजवाया व मुझे उसकी एक कांग्रेसी नेता के साथ फोटो भी उपलब्ध करवाई। उन्होंने अपने कार्यकाल में नेताओं और अपराधियों की सारी कमियांउजागर की। विवादास्पत वोरा कमेटी नियुक्त हुई। वे कहते थे कि उसका उद्देश्य शरद पवार की बिखियां उधेड़ना था।

जब मैं एक बार उनके साथ दौरे पर गया तो लौटते समय एयरपोर्ट पर हमें एक व्यक्ति खड़ा रोता मिला। उन्होंने उसे बुलाकर पूरा विवरण लिया तो उसने बताया कि उसके पिता की मृत्यु हो गई थी। घर जाना था। उन्होंने उसे अपने साथ दिल्ली ले जाने का फैसला लिया व यहां पहुंचने पर उसके घर तक गए। जब मैं उनके चुनाव प्रचार के दौरान साषथ जाता था तो वे . समोसे व मिठाई की प्लेट खुद उठा लेते व इसको मुझे पकड़ा कर कहते कि इसे मेरे सुरक्षा के जवानो व ड्राइवर को दे देना। वे लोग भूखे होंगे। वे एक सफल नेता ही नहीं बल्कि अच्छे इंसान भी थे जोकि बहुत कम उम्र में 11 जून 2011 को जयपुर के निकट एक कार दुर्घटना में अपनी जिदंगी खो बैठे।

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