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सुलेमानी के मारे जाने से संकट बढ़ेगा

मैं तकदीर का कायल हूं। मेरा मानना है कि कई बार तो हमें कुछ गलत नहीं करने के बावजूद दूसरों की गलतियों का खामियाजा भुगतना पड़ता है, जिससे हमारा न तो कुछ लेना-देना ही होता है और न ही कुछ और लोगों के उस काम में हमारी कोई भूमिका ही होती है। हाल ही में अमेरिका द्वारा ईरान के जाने-माने कमांडर जनरल कासिम सुलेमानी के द्रोण के जरिए किए गए हमले में मारे जाने की खबर पढ़ी तो यह बात याद आ गई। यह वो व्यक्ति है जो कि इस क्षेत्र में बहुत अहमियत रखता था। उसने खाड़ी के देशों में ईरान का काफी प्रभाव बढ़ाया था। उसकी हत्या के बाद सोशल मीडिया पर तीसरे विश्व युद्ध की आशंकाएं जताई जाने लगी हैं। उसकी हत्या के बाद न सिर्फ मध्य पूर्व, बल्कि पूरी दुनिया में उथल-पुथल होने की आशंका बढ़ गई है। उसकी अहमियत बिन लादेन व आतंकवादी बगदादी से भी ज्यादा थी। उसे ज्यादा खतरनाक आतंकी माना जाता था। इसकी वजह यह थी कि जहां बिन लादेन व बगदादी को औपचारिक रूप से कोई सरकारी संरक्षण हासिल नहीं था वहीं सुलेमानी इतना ज्यादा शक्तिशाली था कि ईरान सरकार से लेकर पूरे मध्य पूर्व में उसका सिक्का चलता था। वह तो देश की गुप्तचर सेवा का प्रमुख होने के साथ-साथ वहां के भावी राष्ट्रपति पद कर उम्मीदवार भी माना जा रहा था। इराक के बगदाद हवाईअड्डे से बाहर निकलते ही द्रोण द्वारा किए गए अमेरिकी हमले में वह और उसका दामाद व उसके दो साथ भी मारे गए, जो सेना में अहम पदों पर थे।

जनरल सुलेमानी ईरान की इस्लामी क्रांतिकारी रक्षक सेना कुद्स का प्रमुख था। उसकी संस्था दूसरे देशों में स्थित ईरानी दूतावासों का इस्तेमाल वहां छुपकर अपनी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए करती थी। पिछले साल ही अमेरिका ने उसे विदेशी आतंकी संगठन घोषित किया था। वह 1998 से इस पद पर काबिज था व उसके ईरानी सुप्रीम नेता अयातुल्ला अली खुमैनी से बहुत अच्छे संबंध थे। वह वहां की राजनीति तय करता था। उसने ओमान की खाड़ी, इराक, सीरिया से लेकर लेबनान व आसपास के देश में अपना प्रभुत्व स्थापित किया हुआ था। वह आमतौर पर खुद चुप रहता व अपने विरोधियों की हत्या कर उन्हें हमेशा के लिए खामोश कर देने में विश्वास रखता था।

उसे अमेरिका से सख्त नफरत थी और वह अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को माकूल जवाब देने की धमकी दे चुका था। उसका कहना था कि वह उनसे टकराव लेने का इंतजार कर रहा है। उसने उनसे कहा था कि वह ईरान, लेबनान, इराक गाजा व अफगानिस्तान की नीतियों को नियंत्रित करता है। अफगानिस्तान में उसने दूतावास में अपनी कुद्स सेना के अफसर को नियुक्त किया है। यहां यह याद दिलाना जरूरी हो जाता है कि 1979 में जब अयातुल्ला रहोल्ला खुमैनी ने ईरान में अमेरिका समर्थक शाह का तख्ता पलटा तभी सुलेमानी उसके संपर्क में आया व उसकी क्रांतिकारी सेना में शामिल हो गया। उसने ईरान-इराक युद्ध के दौरान अपनी सेना को खाना पानी सप्लाई करना जारी रखा। वह 1998 में कुद्स का प्रमुख बना और ऊपर वालों का करीब होता चला गया। उसने इस क्षेत्र में इस्लामी क्रांति फैलाने पर जोर दिया। कुद्स सेना को लेबनान भेजकर वहां के शिया लड़ाकों को एकजुट करने की जिम्मेदारी भी उसने निभाई। उसने ईरान की सेना में करीब सवाल लाख सैनिक भर्ती किए।

मजेदार बात यह है कि शुरू में उसने अमेरिका के साथ मिल कर काम किया। जब अमेरिका में हुए हमले के बाद अफगानिस्तान में इस देश द्वारा आतंकवादियों को नष्ट करने की कोशिश की जा रही थी तो सुलेमानी अमेरिका के साथ आ गया क्योंकि वह चाहता था कि तालिबान हार जाए। मगर जब राष्ट्रपति जार्ज डब्लु बुश ने ईरान पर परमाणु हथियार एकत्र करने का आरोप लगाया तो उसके अमेरिका से संबंध समाप्त हो गए। जब अमेरिका ने सद्दाम हुसैन का 2003 में तख्ता पलटा तो उस दौरान सुलेमान पर ईरान के अमेरिकी सैनिकों पर हमला कराने के आरोप लगे। अंततः अमेरिका ने 2011 में सुलेमानी पर प्रतिबंध लगा दिया। अमेरिका ने सुलेमानी पर अपने व मित्र देशों के सैनिकों को मारने व घायल करने का आरोप लगाया।

सुलेमानी की हत्या करने के बाद न केवल मध्य-पूर्व में तनाव बढ़ेगा, बल्कि इसके दूरगामी परिणाम पूरी दुनिया में दिखाई पड़ने की आशंका है। क्योंकि अयातुल्ला अली खुमैनी ने उसकी मौत के बाद कहा है कि उसके अल्लाह के पास जाने के बाद उसके मार्ग व मिशन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। हम उसके हत्यारे के खिलाफ जम कर कार्रवाई करेंगे। ईरानी विदेश मंत्री ने तो अमेरिका के इस कृत्य को अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद की संज्ञा देते हुए कहा कि आईएसआईएस, अल कायदा सरीखे संगठन जो भी उसके खिलाफ कार्रवाई करेंगे अमेरिका खुद उसके लिए जिम्मेदार होगा।

अमेरिका के दबाव में आकर हमने ईरान से तेल खरीदना बंद कर दिया था। आजकल वह हमारे तेल की पूरी आपूर्ति करता है। मगर अमेरिका के इस हमले के बाद तेल का दाम तीन डॉलर प्रति बैरल बढ़ गया है। इसका सीधा असर देश होगा और महंगाई बढ़ेगी। ईरान ने बदले की कार्रवाई करते हुए बगदाद स्थित अमेरिकी ठिकानों पर हमला कर दिया है। देखना है कि खाड़ी के देशों में बड़ी तादाद में सेना भेज रहे अमेरिकी राष्ट्रपति अब क्या कार्रवाई करते हैं। यह तो भैंसे और हाथी की लड़ाई है, जिसमें घास की भूमिका में आए खाड़ी व एशिया के तमाम छोटे देश बुरी तरह से पिस जाएंगे। तेल तो महंगा होना शुरू भी हो गया है।

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