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Saturday, April 17, 2021
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रहीम का मकबरा और उनकी बात

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मैं बचपन से ही कबीर और रहीम को बहुत पसंद करता आया हूं क्योंकि ये दोनों कवि बड़ी-बड़ी शाब्दिक लफ्फाजी करने की जगह अपनी सफल व आम आदमी को आसानी से समझ में आ जाने वाली भाषा में जीवन के सत्य को वर्णित करते थे। उनके दोहे लाजवाब होते थे। वे आज भी मुझे अच्छी तरह से याद हैं। कई बार अपनी खराब हो रही याददाश्त के कारण मुझे अक्सर यह पता लगाना पड़ता है कि मैं जिस दोहे का इस्तेमाल करने जा रहा हूं वह कबीर का है या रहीम का।

दिल्ली में रहते हुए मुझे दिसंबर में 41 साल हो जाएंगे। मगर मैं जब तक पंडारा रोड़ का घर छोड़कर वसुंधरा एंक्लेव नहीं रहने आया तब तक मैंने इस सत्य पर ध्यान ही नहीं दिया था कि जाने माने कवि रहीम मेरे नए घर से कुछ किलोमीटर दूर अपने मकबरे में चिरनिंदा में सोए हैं। जब भी मैं डीएनडी फ्लाईओवर से क्नाट प्लेस की ओर जाता हूं तो मुझे बाईं ओर रहीम या अब्दुर रहीम खान-ए-खाना का मकबरा दिखाई पड़ता है। जब मैं 2015 में आया था तो उस समय इस मकबरे की मरम्मत का काम चल रहा था व पिछले दिनों इसकी मरम्मत पूरी हो जाने पर रहीम की 464वीं जन्म शताब्दी दिवस पर उसे आम जनता के लिए खोल दिया गया।

याद करा दूं कि 2014 में हुमायु के मकबरे के संरक्षण का काम शुरू करने के बाद आगा खान ट्रस्ट ने रहीम के मकबरे के संरक्षण का काम भी शुरू कराया था। जिस आधार पर उनके मकबरे की इमारत खड़ी हुई थी उसमें कई दरारे आ गई थी। संरक्षण के दौरान उन्हें ठीक किया गया। इसके अलावा छतरियों, गुंबद और दीवारो व छत का भी संरक्षण किया गया। देश में किसी राष्ट्रीय महत्व की इमारत के संरक्षण के लिए अब तक का सबसे लंबे समय तक चलने वाला यह काम था।

शायद रहीम की शख्सियत में ही खासियत कुछ ऐसी थी जो देश उन्हें आज भी इतना महत्व दे रहा है। रहीम न केवल मुगल बादशाह अकबर के नवरत्नो में से एक थे बल्कि वे उनकी सेना के प्रमुख कमांडर भी रहे थे। इस मकबरे की कहानी बहुत रोचक है। इतिहास बताता है कि वास्तव में रहीम ने यह मकबरा अपनी पत्नी के लिए बनवाना शुरू किया था। इतिहासकारो का दावा है कि इससे पूर्व  मुगल बादशाह अपनी पत्नियो के मकबरे नहीं बनवाते थे। बताते है कि इस मकबरे से प्रेरित होकर ही शाहजहां को मुमताज बेगम का मकबरा ताजमहल बनाने की प्रेरणा मिली थी।

रहीम 17 दिसंबर 1556 को जन्मे थे। उनका पूरा नाम खानजादा मिर्जा खान अब्दुल रहीम खान-ए-खाना था। बताते हैं उनके पूर्वज राजपूतों से मुसलमान बने थे व खान-ए-खाना का मतलब राजाओं का राजा होना है। वे अकबर के सबसे विश्वासपात्र अभिभावक व हितचिंतक बैरम खान के बेटे थे। रहीम का जन्म लाहौर में हुआ था। बाद में बैरम खान की अकबर से अनबन हो गई और अकबर ने उन्हें सजा देने की जगह हज पर चले जाने व अपने राज से बाहर कहीं और बस जाने का निर्देश दिया। बैरम खान जब हज से लौट रहे थे तब पाटन गुजरात में उनकी हत्या कर दी गई पर उनकी पत्नी व बच्चे रहीम को सही सलामत अकबर को दिल्ली में सौंप दिया गया।

अकबर ने रहीम को मिर्जा खान की पदवी दी व अपना नवरत्न बनाया। बाद में अकबर ने रहीम की सौतेली मां व बैरम खान की दूसरी पत्नी सलीमा सुल्तान बेगम से शादी कर ली। अकबर ने उन्हें युद्ध के दौरान महाराणा प्रताप से बातचीत करने के लिए भेजा था। बाद में वे महाराणा प्रताप के बेटे अमरसिंह से हार गए व उन्होंने सेना से इस्तीफा लेकर अपना पूरा जीवन साहित्य व कविता के लिए समर्पित कर दिया। कहा जाता है कि वे गरीबो की बहुत मदद किया करते थे। तुलसीदास तक उनसे बहुत प्रभावित थे। नौ भाषाओं के जानकार रहीम ने बाबरनामा का फारसी भाषा में अनुवाद किया। उनका संस्कृत भाषा पर अधिकार था। अकबर की मृत्यु के बाद वे उनके बेटे व हुमायु के विश्वासपात्र बने। वे कलम व तलवार दोनों के ही घनी थे।

कहते हैं कि अकबर ने अपने बेटे को शिक्षा देने के लिए रहीम को चुना था। विश्वासपात्र होने के पीछे एक बड़ा कारण यह भी था। इसे महज संयोग ही कहा जाएगा कि पहले उनके पिता बैरम खान के सलीमा के पिता अकबर के साथ मतभेद हुए व बाद में रहीम के जहांगीर के साथ मतभेद हो गए। महाकवि दिनकर के अनुसार अकबर ने जो सम्मान हिंदुत्व को दीन-ए-इलाही में दिया वहीं सम्मान रहीम ने अपनी कविताओं में हिंदुत्व को दिया। वे धर्म से मुसलमान व संस्कृति से शुद्ध भारतीय थे। हुमायु ने रहीम की शादी बैरम खान की कट्टर विरोधी मिर्जा अजीज की बहन महा बानो से करवा दिया था। इस विवाह के कारण उनके बीच की आपसी रंजिश समाप्त हो गई।

उनका विवाह 13 साल की उम्र में हुआ था व उनके 10 बच्चे थे। इसे संयोग ही कहा जाएगा कि अकबर के बेटे जहांगीर के विश्वासपात्र रहने के बावजूद बाद में रहीम के उनसे संबंध खराब हो गए। हालांकि वे अकबर व जहांगीर दोनों के ही वजीर रह चुके थे। उनके मकबरे की कहानी भी बहुत अजीबो-गरीब है। उन्होंने इसका निर्माण 1598 में अपनी पत्नी के निधन के बाद करवाया था। मगर खुद उन्हें 1627 में अपनी पत्नी के करीब वहीं दाफना दिया गया क्योंकि वे तब तक बादशाह दरबार में काफी कमजोर शख्सियत हो चुके थे। इससे भी बुरा तब हुआ जब दिल्ली सफदरजंग के मकबरे का निर्माण शुरू हुआ। 1754 में जब इसका निर्माण हुआ तो इसके लिए बड़ी तादाद में रहीम के मकबरे से संगमरमर के पत्थर चुरा कर उनका वहां इस्तेमाल किया गया। सफदरजंग अवध के नवाब थे व जब मुगलिया शासन कमजोर होने लगा तो मुहम्मद शाह बहादुर ने सिंहासन पर बैठने पर उन्हें अपना वजीर बना दिया था।

वे बहुत अमीर थे व उन्होंने मुगलिया शैली में अपना मकबरा बनवाया था। बादशाह खुद कठपुतली बनकर रह गया था व सारी ताकत वजीर के पास ही थी। उसने रहीम के मकबरे तक को नहीं बख्शा। आज रहीम का मकबरा फिर से संरक्षित कर दिया गया है मगर रहीम ने जिदंगी के कटु सत्यों को जिस तरह से अपनी कलम के जरिए संजोया था वे आज हर इंसान के दिल में उतर चुके हैं। इनमें मुझे सबसे सत्यवादी वह दोहा नजर आता है जोकि एक शाश्वत सत्य है कि रहिमन चुप हो बैठिये, देखि दिनन के फेर। जब नीके दिन आइहैं, बनत न लगिहैं देर। वे तुलसीदास के बहुत घनिष्ठ मित्र थे। जब उनका बुरा समय आया तो जहांगीर ने नाराज होकर उनकी सारी संपत्ति जब्त कर ली व उन्होंने चित्रकूट में एक मंदिर के सामने भीख मांगते हुए अपने प्राण त्याग दिए।

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