राज्यपालः माल किसी का कमाल किसी का खेलना

राजस्थान में वहां के राज्यपाल कलराज मिश्र व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बीच विधानसभा का सत्र बुलाए जाने पर जिस तरह से खींचातानी हुई उसकी हमारे संविधान के निर्माताओं ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी। वहां सचिन पायलट व अशोक गहलोत के बीच चल रही उठा-पटक के बीच मुख्यमंत्री यह सत्र बुलाकर अपनी मजबूत स्थिति, अपना बहुमत साबित करना चाहते हैं। पर इसमें भी अंडगा लगा।

इस घटना ने पिछले कुछ समय राज्यपालो द्वारा राज्य सरकारों के गठन व उन्हें बर्खास्त किए जाने के सिलसिले में उठाए जाने वाले कदमो को उजागर कर दिया हैं। वे प्रधानमंत्री व केंद्र के दरोगा सीबीआई की तरह काम करते नजर आने लगे हैं। यहां खसियत यह है कि हमारे देश में जिस भी दल की केंद्र में सरकार होती है उस पर राज्यपाल के जरिए अपनी राजनीतिक मनमानी करने के आरोप लगते आए हैं।  भाजपा व कांग्रेस विपक्ष में होते हैं तो राज्यपाल की ऐसी मनमानी पर लोकतंत्र की हत्या करने जैसे बयान करते हैं व खुद सत्ता में आने पर वहीं हथकंडे अपनाते हैं। वैसे सच यह है कि मनमानी का यह सिलसिला दशको से ही आजादी के 12 साल बाद ही शुरू हो गया था। जवाहर लाल नेहरू ने 1955 में केरल की तत्कालीन ईएमएस नंबूदरीपाद सरकार को बर्खास्त करवा दिया था। यह सिलसिला वहीं नहीं रूका।

जाने-माने आईपीएस अधिकारी रहे पश्चिम बंगाल के राज्यपाल धर्मवीर ने 1967 ने अजय मुखर्जी सरकार को बर्खास्त कर कांग्रेस द्वारा समर्पित पीसी घोष की सरकार को सत्ता की बागडोर पकड़ाई थी। इसके बाद यह सिलसिला ही शुरू हो गया। राज्यपालों द्वारा राज्य की सबसे बड़ी पार्टी की सरकार बनाने का मौका न देने तक के मामले प्रकाश में आए। इसे बढ़ावा देने में कांग्रेस की सबसे अहम भूमिका रही। आंध्रप्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल रामलाल ने वहां के मुख्यमंत्री एनटी रामाराव की जगह उनसे राजनीतिक विद्रोही नंडेला भास्कर राव को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलवा दी थी।

उस समय रामाराव अपने दिल का आपरेशन करवाने अमेरिका गए हुए थे। उसी साल सिक्किम के राज्यपाल होमी तलयार खान ने नरबहादुर भंडारी की सरकार को बर्खास्त कर दिया था। दोनों कदम तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के इशारे पर उठाए गए थे। सिलसिला राजीव गांधी के शासन काल में भी जारी रहा। 1988 में कर्नाटक में एसआर बोम्मई की सरकार को राज्यपाल पी वेंकट सुबैय्या ने बर्खास्त कर दिया और यह मामला लंबे अरसे तक अदालत में चला और वहां सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला दिया कि सरकार के बहुमत का फैसला सदन के अंदर किया जाना चाहिए और बाद में होने वाले तमाम मामलो में यह एक मिसाल माना गया।

अपनी सरकार में विद्रोह हो जाने के बाद बोम्मई सदन में बहुमत परीक्षण करवाना चाहते थे मगर पी वेंकट सुबैय्या ने तत्कालीन राजीव गांधी सरकार से राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने की सिफारिश कर दी। तब बोम्मई जनता पार्टी में थे व उनकी पार्टी को लोकदल में शामिल होने के बाद जनता दल अस्तित्व में आया। बाद में उन्होंने पुनः अपनी सरकार बनाई। यहां याद दिलाना जरूरी हो जाता है कि कोई भी दल पाक साफ नहीं है।

1996 में एचडी देवगौड़ा की अगुवाई वाली संयुक्त मोर्चा सरकार ने भाजपा शासित गुजरात सरकार में राष्ट्रपति शासन लगवा दिया था। उस समय केपीसिंह वहां के राज्यपाल थे। जब शंकरसिंह वाघेला के साथ 40 विधायको ने सुरेश मेहता सरकार के खिलाफ विद्रोह का बिगुल बजाया था। सुरेश मेहता ने विधानसभा में अपना बहुमत साबित कर दिया मगर वहां विभिन्न पक्षों के विधायको के बीच सदन के अंदर जमकर मारपीट हुई व वहां संवैधानिक मशीनरी अवरोध पैदा होने से राज्यपाल की सिफारिश के कारण केंद्र सरकार ने गुजरात में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया।

फिर उत्तर प्रदेश सुर्खियो में आया। वहां के राज्यपाल रोमेश भंडारी ने 1998 में कल्याण सिंह सरकार बर्खास्त कर दी। जगदंबिका पाल को उनकी लोकतांत्रित कांग्रे के बहुमत के नाम पर शपथ दिलाई।  वह एक ऐतिहासिक मामला था। राज्यपाल ने रात 8 बजे सरकार बर्खास्त की व 10 बजे जगदंबिका पाल को नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ दिलवाई। वक्त का मजा देखिए कि जिस जगदंबिका पाल के लिए जिधर माल उधर पाल का नारा लगा था वो भी आज भाजपा के सांसद हैं। उस समय कल्याण सिंह अदालत में गए व अदालत ने उन्हें पुनः मुख्यमंत्री घोषित करते हुए उसी दिन सदन में अपना बहुमत साबित करने का आदेश दिया व वे इसमें जीत गए व जगदंबिका महज एक दिन के मुख्यमंत्री के रूप में प्रसिद्ध होकर इतिहास पुरूष हो गए।

राज्यपाल तो राज्यपाल इसमें राष्ट्रपति तक विवाद में नहीं बच सके। याद दिला दें कि फरवरी 2005 में बिहार विधानसभा चुनाव में किसी को बहुमत नहीं मिला व सरकार नहीं बन पाई। वहां राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। दो महीने बाद राजग ने सरकार बनाने का दावा करते हुए कहा कि उनके पास जद(यू) के 115 विधायको का समर्थन हैं व कुछ लोजपा के विधायक उसका समर्थन कर रहे हैं। तत्कालीन राज्यपाल बूटा सिंह ने राष्ट्रपति डा एपीजे अब्दुल कलाम को पत्र लिखकर आगाह किया कि मौजूदा हालात में हार्स ट्रेडिंग किए जाने का खतरा है व इसलिए विधानसभा भंग कर दी जानी चाहिए। देर रात तत्कालीन यूपीए सरकार ने मास्को के अधिकारिक यात्रा पर गए डा कलाम को बूटा सिंह की रिपोर्ट फैक्स की व डा कलाम से दो घंटे के अंदर ही विधानसभा भंग किए जाने की सिफारिश दिल्ली भेज दी।

मामला सुप्रीम कोर्ट में गया। अदालत ने बूटा सिंह की इस सिफारिश को गलत बताते हुए कहा कि केंद्र सरकार को उनका सुझाव स्वीकार करने के पहले तथ्यो की जांच कर लेनी चाहिए थी। इस फैसले के बाद बूटा सिंह ने अपना इस्तीफा दे दिया। उसी साल पड़ोसी राज्य झारखंड के तत्कालीन राज्यपाल सिब्ते रजी ने राजग के 41 विधायको के समर्थन दावे को न मानते हुए जेएमएम के शिबु सोरेन की सरकार बनवाई। जब भाजपा 81 सदस्यीय विधानसभा के 41 विधायको को राज्यपाल के सामने परेड कराने पर अड़ी तो शिबू सोरेनने विधानसभा में विश्वासमत साबित किए बिना ही नौ दिन तक सत्ता में रहने के बाद इस्तीफा दे दिया व भाजपा के अर्जुन मुंडा ने मुख्यमंत्री की शपथ ली।

केंद्र में सत्ता में आने के बाद भाजपा सरकार ने मार्च 2016 में कांग्रेस के विधायको को भाजपा में शामिल हो जाने के कारणहरीश रावत सरकार को बर्खास्त करवा दिया।वहां के राज्यपाल केके पॉल ने मुख्यमंत्री से अपना बहुमत साबित करने को कहा। विश्वासमत हासिल के दिन से पहले विधानसभा अध्यक्ष ने नौ विद्रोही विधायको को अयोग्य घोषित कर दिया व केंद्र सरकार ने हरीश रावत को अपना बहुमत साबित करने का मौका दिए बिना ही बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगवा दिया। मामला अदालत में गया व उत्तराखंड हाईकोर्ट ने अप्रैल में राष्ट्रपति शासन को गलत करार देते हुए हरीश रावत से अपना बहुमत प्रमाणित करने को कहा व उन्होंने यह कर दिखाया।

राजग के ही शासन में 2017 में गोवा विधानसभा में कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। रात को 40 सदस्यीय विधानसभा में उसने 17 व भाजपा के 13 विधायको पर तत्कालीन राज्यपाल कवियत्री मृदुला सिन्हा ने सबसे बड़े राजनीतिक दल कांग्रेस की जगह भाजपा को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया।

पिछले साल महाराष्ट्र में विधानसभा के चुनाव नतीजे आने के बाद काफी दिनों तक राजनीतिक उठा-पटक चली। राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश की व उसे स्वीकार कर लिया। 22 नवंबर को कांग्रेस, शिवसेना व राकांपा ने उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में सरकार बनाने का दावा किया मगर 23 नवंबर की सुबह 8 बजे राज्यपाल ने भाजपा नेता देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलवाई। राकांपा के अजीत पवार को उपमुख्यमंत्री पद की शपथ दिलवाई गई। इसके लिए सुबह पौने छह बजे वहां लगाया गया राष्ट्रपति शासन समाप्त कर दिया गया। देर रात 12.30 बजे राज्यपाल ने इस सिलसिले में अपनी रिपोर्ट सरकार में दी थी अंततः उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री बनाना पड़ा। हमारे देश में कुल मिलाकर राज्यपालो का प्रिय खेल माल किसी का कमाल किसी का खेलना है।

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