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सुर्खियों में रेमडेसिवीर दवा

पिछले कुछ दिनों से कोरोना, विकास दुबे के बाद जो नाम खबरों में सबसे ज्यादा छाया हुआ है वह है रेमडेसिवीर  है। संयोग ही कहा जाएगा कि तीनों ही गलत वजह से चर्चा में है। कोरोना महामारी होने के कारण सुर्खियों में है तो विकास दुबे ने उत्तरप्रदेश के आठ पुलिस अफसरों की हत्या कर खबरों में अपनी जगह बनाई जबकि रेमडेसिवीर कोरोना का इलाज करने वाली दवाई है जिसकी भारत में काला बाजारी हो रही है।

अब इस कालाबाजारी के खिलाफ कुछ कदम उठाए गए हैं। रेमडेसिवीर एंटीवायरल दवा है जो कि वायरस को शरीर में अपनी संख्या बढ़ाने से रोकती है। इस दवा को विशेषकर 2014 में इबोला का इलाज ढूंढने के लिए खोजा गया। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पाया कि रेमडेसिवीर से कोरोना का इलाज करने में सफलता मिलेगी क्योंकि यह दूसरे वायरस को अपनी संख्या बढ़ाने से रोकती है।

नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इन्फेक्शन डिजिज के एक दल ने आंकड़े जारी करते हुए कहा कि कोविड मरीजों को यह दवा दिए जाने पर उन्हें ठीक करने में सफलता मिली है। जो मरीज पहले 15 दिन में ठीक हो रहे थे वे केवल 11 दिनों में इस दवा के इस्तेमाल के कारण ठीक हो गए। भारत में भी ड्रग कंट्रोलर जनरल आफ इंडिया ने यह दवा दिए जाने पर अपनी सहमति जता दी है।

अब बड़ी तादाद में कोरोना के मरीजों को यह दवा दी जा रही है। इस दवा का निर्माण अमेरिका की गिलीयड साइसेंस नामक कंपनी कर रही है। वहां इस दवा की कीमत सामान्य है जबकि भारत में इसकी जमकर कालाबाजारी हो रही है व यह दवा 10,000 से लेकर 60,000 प्रति वाइल की दर से बिक रही है। हाल ही में इसके अमरीकी निर्माता ने भारत व पाकिस्तान की  सिप्ला, हेटेरो और जुबिलेंट आदि कंपनियों को यह दवा अपने देश में बनाने व बेचने की अनुमति दी है।

इस दवा में करीब 25 तरह का कच्चा माल लगता है। उसे बनाने के लिए 25 रासायनिक चरणों से गुजरना पड़ता है। अभी तक इसे अमेरिका में तैयार किया जा रहा था। पिछले दिनों 2 फरवरी को अपने पास बनाया हुआ रेमडीसीवर का 20 किलोग्राम पाउडर दवा बनाने के लिए केलीफोर्निया भेज दिया था ताकि उसे इंजेक्शन में भरा जा सके। इसके साथ ही उसका ज्यादा कच्चा माल तैयार करना शुरु कर दिया। यह कंपनी इसे वेकलुरी के नाम से बेचती है।

आपात स्थिति में अमेरिका व भारत के मरीजों को दिए जाने की सरकारी मंजूरी दे दी है। अब जापान व योरोपीय यूनियन के देशों में इसके प्रभाव को देखते हुए आपात स्थिति में इसके इस्तेमाल की मंजूरी दे दी। इसका असर यह हुआ कि इस दवा की मांग तेजी से बढ़ने लगी व उसकी आपूर्ति कम हो गई। हालांकि इसके इस्तेमाल के कारण अलसर, लीवर के प्रभावित होने के मामले प्रकाश में आए। बाद में रक्तचाप व उल्टी आने की भी शिकायतें मिली हैं। इसे वायरल रोगों के लिए प्रभावी पाया गया है।

गिलीयड कंपनी ने इबोला व हेपीटाइटिस सी वायरस का इलाज ढूंढने के लिए इसकी खोज की। बाद में इस कंपनी ने इस दवा को बनाने के लिए अपना पेंटेट करवा लिया। अब यह दवा भारत में भी सही दामों पर मिल सकेंगी। हमारे अस्पताल इंजेक्शन का इस्तेमाल कर सेंट्रल ड्रग्स स्टेडर्ड कंट्रोल आर्गेनाइजेशन ने इसे अभी आपात स्थिति में ही इस्तेमाल किए जाने की इजाजत दी है।

गिलीयड कंपनी के मुताबिक लाइसेंसी समझौते के तहत इस करार में शामिल कंपनियों के पास गिलियड से रेमडीसीवर बनाने की प्रक्रिया की तकनीक ट्रांसफर करने का अधिकार होगा। जिससे उत्पादन में तेजी लायी जा सकेगी। यह कंपनी जिनेटिक प्रोडक्ट बनाएगी। उन्हें उसका दाम तय करने का अधिकार होगा। जब तक विश्व स्वास्थ्य संगठन कोविड-19 को सार्वजनिक स्वास्थ आपातकाल की समाप्ति की घोषणा नहीं कर देता है तब तक लाइसेंस रायल्टी मुफ्त रहेगी या जब तक कोरोना महामारी को रोकने के लिए रेमडेसिवीर के बजाय आप किसी दवाई या वैक्सीन के बनाए जाने की अनुमति नहीं मिल जाती है। गर्भवती महिलाएं व स्तनपान कराने वाली मां तथा 12 साल से कम उम्र के बच्चों को यह दवा दिए जाने पर रोक है।

भारत की हेटरो ग्रुप ने इस दवा की कीमत 5400 रुपए तक रखी है। सिपला ने 4000 रुपए रखी है। हम भारतीय लोग आम आदमी की मजबूरी का फायदा उठा कर उसकी मजबूरी की कीमत वसूलने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिका जैसे देश में रेमडेसिवीर नामक दवा बनाने वाली कंपनी ने दुनिया भर में कोविड-19 महामारी को देखते हुए भारत समेत तमाम देश की कंपनियों से इस दवा की जेनरिक दवा तैयार करने की जानकारी देने के बदल में कोई रायलटी या लाइसेंस फीस नहीं वसूली है।

हमारे देश में अस्पताल व केमिस्ट इस दवा की कालाबाजारी कर रहे हैं। यह देख कर मुझे एक घटना याद आ जाती है। मैं अपने बेटे के बचपन में उसके कपड़े करोलबाग में राजू नामक एक दुकानदार से खरीदता था। वह काफी मिलनसार था। उससे दोस्ती हो गई। एक बार मैंने उससे पूछा कि राजू यह बता कि बच्चों के कपड़े बड़ों के कपड़ो की तुलना में इतने मंहगे क्यों आते हैं तो उसने कहा कि इसके निर्माता व विक्रेता को पता होता है कि मां-बाप बच्चों का मन रखने के लिए उन्हें जरुर खरीदेंगे। आज हमारे देश में यह काम हर क्षेत्र में हो रहा है। कंपनी के द्वारा इनके दाम कम कर देने के बाद भी यह सही कीमत पर उपलब्ध होंगे मुझे संदेह नजर आता है। जब तक कोविड-19 के वायरस का इलाज करनेवाला टीका नहीं ढूंढ लिया जाता तब तक रेमडेसिवीर का इस्तेमाल रामबाण के तरह होता रहेगा। भारत समेत दुनिया के अनेक देशों में इसकी कालाबाजारी जारी रहेगी, इसको कहते हैं कि हींग लगे न फिटकरी मगर रंग चोखा का चोखा।

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