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रूसी वैक्सीन की बुकिंग नहीं हो रही

कई साल पहले मैंने हॉलीवुड में बनी एक विदेशी फिल्म देखी थी। इसमें दिखाया गया था कि भारत समेत दुनिया भर के तमाम वैज्ञानिक पृथ्वी पर महाकाल का प्रकोप पड़ने की भविष्यवाणी करते हैं जिसमें सबकुछ बाढ़ व पानी के कारण नष्ट हो जाने की आशंका थी। ऐसे मामलों में सबसे आगे अमेरिका आता है और वह दुनियाभर के राष्ट्राध्यक्षों से संपर्क कर उन्हें एक विशेष विमान के जरिए बचाने का प्रस्ताव रखता है। अमेरिका चीन की मदद से एक सस्ता विमान तैयार करवाता है।

वहां भी प्रलय आने की स्थिति में हजारों की तादाद में लोग पृथ्वी से काफी दूर कुछ दिनों तक सामान्य होने तक सुरक्षित रह सकते थे व उनके लिए इस विमान में रहने व खाने-पीने का भी प्रबंध किया था। दुनियाभर के राष्ट्रध्यक्ष व पैसे वाले लोग अपने परिवार समेत खुद को बचाने के लिए बहुत ऊंची दर पर इस विमान में अपनी यात्रा की बुकिंग करवाने लगते हैं।

जब हाल ही में मैंने कोविड का ईलाज ढूंढने के लिए तैयार की जा रही एक प्रस्तावित वैक्सीन के बारे में खबर पढ़ी तो मुझे वह बात याद हो आई। कोविड संबंधी खबरों के मुताबिक दुनिया के सबसे अमीर व संपन्न विकासशील देश अमेरिका ने कम-से-कम छह बड़ी दवा बनाने वाली फार्मा कंपनियेां के साथ अनुबंध किया है। वे कोविड का मुकबला करने के लिए जो वैक्सीन तैयार कर रही है अगर वे ऐसा करने में सफल रही तो अमेरिका अपने लोगों के लिए इन कंपनियेां से इस वैक्सीन के आठ करोड़ डोज खरीदेगा।

यह मात्रा अमेरिका में हर नागरिक को वैक्सीन के डोज लगाए जाने के लिए होने वाली जरूरत की मात्रा से कहीं ज्यादा है। ये कंपनियां सबसे पहले अपनी वैक्सीन अमेरिका को बेचेंगी। इसी तरह से ब्रिटेन ने भ वैक्सीन तैयार करने वाली तमाम कंपनियों से उनके सफल हो जाने पर 3.40 करोड़ डोज खरीदने के लिए अनुबंध किया है जो कि उनके अपने नागरिको के लिए होने वाली जरूरत से कहीं ज्यादा है।

आमतौर पर इस वैक्सीन को हर व्यक्ति को पांच डोज लगाए जाने की जरूरत बताई जा रही है। यूरोपीय युनियन समेत तमाम यूरोपीय देशों, यहां तक कि अमेरिका के पड़ोसी मेक्सिको ने भी तमाम कंपनियों से उनकी वैक्सीन तैयार करने की सफलता मिलने से पहले ही बड़ी तादाद में उनके डोज खरीदने के लिए समझौता कर लिया है। ऐसा लगता है कि इसके लिए तेजी से दुनिया भर में कोरोना की वैक्सीन तैयार करने के लिए काम चल रहा है। वह अगले साल की शुरुआत तक आए।

हालांकि रूस व चीन ने भी कोविड वैक्सीन विकसित कर लेने का दावा किया है। उधर भारत में चिकित्सा क्षेत्र में विश्वसनीयता वाले बाबा रामदेव ने सबसे पहले कोरोना वायरस की दवा कोरोलीना विकसित करने का दावा किया और बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस भी की। मगर इन दावों और उत्पादों को दुनिया न विश्वसनीयता से नहीं लिया है।

जब विश्वश्नीयता पैदा करने की कोशिश में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अपनी सगी बेटी को टीका दिए जाने का दावा व तस्वीरे सार्वजनिक की तो उस पर प्रतिक्रिया करते हुए एक भारतीय जाट डाक्टर ने कहा कि हमारे यहां एक कहावत बहुत प्रचलित है कि जाट मरा तब जानिए, जब तेरहवीं हो जाए। पहले इस देश में किसी नागरिक पर इस वैक्सीन का सकरात्मक प्रभाव पढ़ने की खबर मिले, उसके बाद से दुनिया उनके दावों पर विश्वास करेगी।

इसलिए दुनिया का कोई भी देश रूस से वैक्सीन खरीदने और बाबा रामदेव की दवा खरीदने के अनुबंध तो दूर रहा, उस संबंध में बात तक नहीं कर रहा है। वहीं जिन देशों की फार्मा कंपनियेां पर दुनिया को विश्वास है उनसे दवा खरीदने के लिए देशों ने एडवांस बुकिंग शुरू कर दी है। इससे पुरी दुनिया में एक बड़ा खतरा यह पैदा हो गया है कि कहीं यह वैक्सीन काफी महंगी होकर गरीब व विकासशील देशों की परिधि से बाहर न निकल जाए। क्या आज आम आदमी व आम देश इन्हें हासिल कर इस रोग से जूझ सकने में सफल हो सकेंगे?

अमीर देशों के इस कदम के कारण दुनिया के बड़े भू-भाग पर रहने वाले लोग इस वैक्सीन के इस्तेमाल से वंचित रह जाएंगे। मजेदार बात यह है कि दुनिया में कोविड के हालात इतने खराब है कि तमाम देशों ने तमाम दवा कंपनियों द्वारा तैयार की जाने वाली वैक्सीन की सफलता का प्रमाण मिलने से पहले ही उनको अरबों डालर एडवांस में थमा कर दवा खरीदने के सौदे व अनुबंध कर लिए हैं। अभी तक इन पर मानवीय प्रयोग ही चल रहे हैं।

इन कंपनियों ने यह तक तय नहीं किया है कि वे किस दर व दाम पर इन्हें खरीदने वाले देश को बेचेंगे? होना तो यह चाहिए था कि दुनिया में इस बात पर एक राय आम हो जाती कि कोविड का ईलाज करने वाले डाक्टरो, मेडिकल के कर्मचारियों  को सबसे पहले यह वैक्सीन उपलब्ध करवाई जाएगी। उसके बाद बुजुर्ग लोगों व गर्भवती महिलाओं को वैक्सीन दिए जाने की प्राथमिकता दी जानी चाहिए थी ताकि वे कोविड का शिकार बनने से बच सके।

अमेरिका में नवंबर माह में राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति पद के चुनाव होने हैं। वहां की मौजूदा ट्रंप सरकार नस्लवाद के आरोपेां व दुनिया में सबसे ज्यादा कोविड के कारण होने वाली मौतो की संख्या से परेशान है। उनकी तरह दुनिया, हर देश अपने देशों की जनता पर यह असर डालना चाहता है कि उसकी सरकार जनता के स्वास्थ्य को लेकर कितनी चिंतित है। वे वैक्सीन उपलब्ध कराने में किसी से पीछे नहीं है। वे इस वैक्सीन के विकसित किए जाने का श्रेय लेने का भी प्रयास करेंगे। यही वजह है कि इस वैक्सीन का परीक्षण पूरा हुए बिना ही चीन ने अपने देश में सैनिको को इसका डोज देना शुरू कर दिया व रूस ने तो इसकी इंतहा करते हुए राष्ट्रपति ने अपनी बेटी को ही डोज दे दिया। हालांकि अभी तक इस मानसिकता को लेकर सबके मन में शक है।

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