समझों इन सिक्ख किसानों की दरियादिली!

जब नवीनतम कृषि कानून को वापस लिए जाने की मांग को लेकर प्रदर्शन करने आए पंजाब व हरियाणा के किसानो को गुरूपर्व पर दिल्ली में लंगर आयोजित कर आम लोगों को खाना खिलाते देखा तो उनकी दिलदारी याद आ गई। सच कहूं तो मैंने दशको तक सिखों की रिपोर्टिंग करते हुए यह पाया कि उनका दिल बहुत बड़ा होता है व वे लोग अपना बड़ापन दिखाने में लोगों की मदद करने में कभी पीछे नहीं हटते हैं।

जरा सोचिए कि जो किसान अपना घर बार सब पीछे छोड़ कर सरदी के इस मौमस में ट्रैक्टरो पर रहने व खाने का इंतजाम करने के लिए दिल्ली आए थे वे लोग दूसरो की मेहमानवाजी कर रहे थे। वे न केवल अपना खाना बना रहे थे बल्कि यहां के लोगों का भी पेट भर रहे थे। मेहमानवाजी में सिखों का जवाब नहीं। मैंने खुद इसे कई बार अनुभव किया है।

जब मैं आतंकवादी नेता जरनैल सिंह भिंडरावाले का इंटरव्यू के लिए पहली बार उनके ठिकाने मेहता चौक गया तो दफ्तर में उनका इंटरव्यू लेने के बाद उन्होंने मेरे लिए खाना लाने का आदेश दिया। तब मैं काफी दुबला पतला था। मेरे साथी फोटोग्राफ सुभाष भारद्वाज भी मेरे जैसे ही थे। खाना लाए जाने पर उन्होंने हमारे लिए घी लाने का आदेश दिया व हम दोनों की दाल कटोरियो में घी डालते हुए कहा कि कभी घी खाया करो। वरना मौटे कैसे होंगे।

उन्होंने अपने हाथों से हमे खाना परोसा व हमें जबरन सामान्य भूख से ज्यादा खाना खिलाया। उनकी आवभगत देखकर मैं दंग रह गया क्योंकि उनकी छवि काफी खराब मानी जाती थी व आम इंसान उनसे घबराता था। फिर पंजाब में जब आपरेशन ब्लू स्टार में भिंडरावाले के मारे जाने के बाद वहां पहली बार विधानसभा चुनाव हुए तो वहां आतंकवाद अपनी चरम सीमा पर था। मैं इस दौरान कई बार वहां आता जाता रहा। वे मेरे तमाम आतंकवादियों के साथ अच्छे संबंध थे। वे लोग मुझे अपने कार्यक्रमों में अक्सर ले जाया करते थे व इनमें हिस्सा लेने वाला मैं अकेला गैर-सिख हुआ करता था।

शेर सिंह दुमछेड़ी के तो घर पर रहा करता था। वे लोग मेरी जमकर सेवा करते व अपने हाथों से खाना लाकर मुझे खिलाते थे। उन दिनों अमृतसर के निकट बरनाला इलाके में आतंकवाद अपनी चरम सीमा पर था। जब मैं मतदान वाले दिन वहां रिपोर्टिंग के लिए गया तो मैं रास्ता भूल गया। एक गांव से गुजरते समय मैंने रास्ते में एक किसान से रास्ता पूछा। वह गांव में भट्टी पर बैठा हुआ गुड़ बना रहा था। मेरे रास्ता पूछने पर उसने मुझे कार से उतर कर नीचे आने को कहा।

मुझे खाट पर बैठने के लिए कहने के बाद वह पास ही स्थित अपने घर गया। एक गिलास में दूध भरकर ले आया फिर उसने एक प्लेट में ताजा तैयार किया गया गरम-गरम गुड़ निकाल कर मुझे चखने के लिए कहा और पूछा कि क्या आपके लिए खाना लाऊं। उसकी यह मेहमानवाजी देखकर मैं दंग रह गया और मुझे लगा कि इतने अच्छे इस राज्य को किसी की नजर क्यों लग गई। जहां के लोग महज रास्ता पूछने पर अज्ञात लोगों की इतनी खातिर करते है तो उनका स्वभाव कितना अच्छा होगा।

मैं कानपुर उत्तर प्रदेश से हूं। हमारे राज्य समेत उत्तर भारत के ज्यादातर शहरो व राज्यो में खाने के लिए तीन चार सब्जियां व दाले बनती हैं। मगर पंजाब में एक सब्जी दाल जैसे भठूरे या मक्के की रोटी को साग के साथ खाया जाता है। साथ में जमकर लस्सी पी जाती है। वहां का खाना व्यंजनों की संख्या कम होने के बावजूद बहुत स्वादिष्ट व विटामिनो से संपन्न होता है। खाने खिलाने में पंजाबियो का तो जवाब ही नहीं होता है।

दिल्ली आने पर मैंने जाना कि अगर आप किसी को खाने पर आमंत्रित करे तो उसे दारू पिलाना व नॉनवेज खिलाना नहीं भूले वरना आपका खाने व न्यौता नहीं माना जाएगा। एक बार जब मैंने किसी को खाने पर आमंत्रित करते हुए पूछा कि आप वेज (शाकाहारी) है या नॉनवेज (मांसाहारी)। तो उसने छूटते ही कहा कि मैं वेज भी खा लेता हूं। मतलब साफ था कि वे नॉनवेज ज्यादा पसंद करता था।

उन दिनों मैं भी काफी खाता-पीता था। आजकल मैं लगभग सूफी हो गया हूं। शराब की महक मुझे नहीं भाती है और न ही मांसाहार खाना मुझे अच्छा लगता है। पहले तो मैं इसका दीवाना था। अब कई बार लगता है कि इस शौक के चलते तो मैंने कई बार इंतहा कर दी। एक बार जब मैं पंजाब के विधानसभा चुनाव कवर करने के लिए गया हुआ था तो मैंने अमृतसर स्थित अमृतसर इंटरनेशनल होटल में एक कमरा लेकर डेरा डाला हुआ था। वहां अक्सर आतंकवादी मुझसे मिलने आया करते थे। एक बार शाम को मेरी रिपोर्ट फैक्स करवाने के लिए आए आतंकवादी ने अपने स्वभाव के तहत मुझे कहा कि क्या सेवा करूं। मैंने उससे कहा कि आज मतदान के कारण काफी थक गया हूं। सारी शराब की दुकाने बंद हैं। पुरानी भी खत्म कर चुका हूं। अगर बोतल का इंतजाम हो जाए तो बहुत अच्छा रहता।

उसने अपने कान पकड़ते हुए कहा कि मैंने तो अमृत छक रखा है। मैं तो इसे हाथ भी नहीं लगा सकता हूं। मैंने उसे पैसे पकड़ाते हुए कहा कि आपसे बोतल छूने को कौन कह रहा है। आप अपने किसी चेले के जरिए इसे भिजवा दीजिए। वह चला गया और कुछ देर बार एक घबराए हुए व्यक्ति को लेकर हमारे पास पाया। उस आदमी के एक हाथ में बोतल व दूसरे में तंदूरी मुर्गा व नमकीन था। उसने सामान के साथ-साथ हमें पैसे भी वापस करने चाहे।

मेरे मना करने पर बोला जी मैं तो व्यापारी हूं। वीरजी हमारे मेहमान हैं व अगर उनके आप उनके मेहमान है हम आपसे पैसे लेना तो दूर रहा ऐसा करने की बात तक सोच नहीं सकते हैं। यह कहकर वे दोनों वहां से चले गए। शायद यही कारण है कि हम लोग इन राज्यों के किसानों को अपना अन्नदाता कहते आए हैं। आज जब अन्नदाताओं के कृषि कानून के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए देखता हूं तो बहुत दुख होता है। काश हमारी सरकार उनकी समस्या को दूर कर उन्हें जल्दी से जल्दी खुश कर पाती।

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