veg gujarat non vegetarians गुजरात शाकाहारी? फालतू बात!
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गुजरात शाकाहारी? फालतू बात!

veg gujarat non vegetarians

गुजरात में भक्ति व सूफी दोनों ही आंदोलन का असर रहा है। हालांकि स्वामीनारायण आंदोलन के बाद राज्य में शाकाहारी लोगों की संख्या में इजाफा हुआ व महात्मा गांधी ने भी मांसाहार खासतौर पर अंडा न खाने की बात कही हुई है। उन्होंने मच्छीमारों को शाकाहारी बनाने की भी कोशिश की थी मगर वे सफल नहीं हुए। जैसे हम मांसाहार करने वाले जानवरों को भूसा व घास खाने के लिए बाध्य नहीं कर सकते वैसे ही मांसाहार करने वालों को शाकाहारी बना पाना बहुत मुश्किल है। हालांकि अब मांसाहार के काफी मंहगा होने के कारण ही लोग खुद शाकाहारी बनने के लिए मजबूर हो रहे हैं। veg gujarat non vegetarians

जब गुजरात के मुख्यमंत्री मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने अपने राज्य में शाकाहार पर जोर और शाकाहारी प्रदेश की बात कही तो मुझे बहुत अजीब लगा। हालांकि मैं मांसाहार बहुत पहले ही छोड़ चुका हूं। फिर भी मेरा मानना है कि कोई क्या खाता है व कैसे ईश्वर की प्रार्थना करता है यह अत्यंत निजी मामला है इसमें किसी को कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। जब मैं बहुत छोटा था व मेरे पिताजी अपने तबादले के बाद झांसी से कानपुर आए तब वहां सरकारी बंगलों की संख्या बहुत कम हुआ करती थी। मैं छोटा था पर बातचीत समझता था। मुझे याद है कि एक बार मेरे पिता ने घर में कहा कि यहां ज्यादातर मकान बाह्मणों के हैं जो कि हमें कायस्थ होने के कारण मकान नहीं दे रहे हैं क्योंकि उनका लगता है कि हम लोग मांस व अंडा खाते हैं। कुछ कसमें खाने के बाद हमें किराये पर घर तो मिल गया मगर सबको बता दिया गया कि घर में अंडा व मांस नहीं बनेगा। यह बात अलग रही कि हमारे मकान मालिक शुक्लाजी का बड़ा बेटा अक्सर हमारे घर आकर अंडा व आमलेट बनाने का अनुरोध करने लगा। हम उसे यह चीजें छुपाकर खिलाते थे।

फिर जब मेरी बेटी विधि का मैंने केजी में स्कूल दाखिला करवाया तो वह जैनियों का था। एक दिन जब स्कूल के खाने के डब्बे में पराठे ओर छोटे आलुओं की सब्जी दी तो उसकी डायरी में लिख कर आया कि मैं उसकी क्लास टीचर से तुरंत मिलूं। मैं अगले दिन उनसे मिलने गया तो उन्होंने कहा कि यह जैनियों का स्कूल है व हमारे यहां मांसाहार पर पूरी तरह से प्रतिबंध है। आपको बच्चे को खाने में अंडा आदि नहीं देना चाहिए।

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मैंने उन्हें बताया कि वे उबले अंडे नहीं बल्कि आलू है। बड़ी मुश्किल से उनकी समझ में यह बात आयी। मैंने मंगलवार व गुरुवार को पीना व मांसाहार करना बंद कर दिया। अब तो दोनों चीजों का त्याग किए हुए कई वर्ष बीत गए हैं। मैं नवरात्रि में व्रत रखा करता था व अन्न भी नहीं खाता। जब बंगालियों की पूजा के दौरान मीट मछली खाते देखा तो मुझे बहुत आश्चर्य हुआ। फिर दफ्तर में पाया कि बिहार के झा ब्राह्मण मछली खाते हैं। जब एक सहयोगी के पिता का श्राद्ध हुआ तो उन्होंने बताया कि हमारे यहां ब्राह्मणों के भोज के लिए पूरा बकरा बना था। फिर समझ आया कि खान—पान तो स्थानीय स्तर पर खाने पीने की चीजों की उपलब्धता के आधार पर तय होता है।

शाकाहार के कारण गुजरात में खानपान का धंधा कोविड के चलते पहले खास नहीं था। बंद था मगर हालत सामान्य होने के बाद तमाम रेस्टोरेंट में मांसाहार की रोकथाम को लेकर चिंता हुई है। राजकोट, भावनगर, अहमदाबाद, बड़ोदरा सरीखे शहरों के नगर निगम के नेता अपने शहरों को वेजीटेरियन घोषित कर वहां अंडा व कबाब बेचने वाली दुकानों को बंद करवाने पर उतर आए हैं। गुजरात के अहमदाबाद में धार्मिक स्थानों और सार्वजनिक मार्ग पर अंडे और नॉनवेज की रेहड़ी खड़ी रखने पर पाबंदी लगा दी गई है। अहमदाबाद में धार्मिक स्थानों और सार्वजनिक मार्ग पर अंडे और नॉनवेज की रेहड़ी खड़ी रखने पर पाबंदी लगी है। 16 नवंबर से यह निर्णय लागू करने का अहमदाबाद म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन ने फैसला लिया। इसके विवाद से   हालत इतने बिगड़े कि भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सी आर पाटिल ने अपने लोगों से कहना पड़ा कि राज्य में मांसाहार पर रोक नहीं है और लोगों को मनचाही चीज खाने का पूरा अधिकार है। गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल सफाई दे रहे है कि शाकाहारी और मांसाहारी का सवाल नहीं है लेकिन, स्टालों पर बेचा जा रहा भोजन हानिकारक नहीं होना चाहिए. साथ ही स्टालों को यातायात प्रवाह में बाधा नहीं डालनी चाहिए।

मांसाहार व शाकाहार का संघर्ष पुराना है। याद कराना जरुरी हो जाता है कि 2002 के सांप्रदायिकता दंगों के बाद 2005 में अहमदाबाद के एलिसब्रिज विधानसभा क्षेत्र के भाजपा विधायक भविन सेठ ने तत्कालीन गृह राज्य मंत्री व मौजूदा गृहमंत्री श्री अमित शाह के इशारे पर मांसाहार खाना बेचने वालों पर पाबंदी लगाने की बात शुरु की थी। ज्यादातर ठेले आईआईएम, अहमदाबाद के बाहर लगते थे। पढ़ने वाले छात्र रात को वहां आकर भोजन किया करते थे। याद रहे इस शहर में जैनियों का काफी प्रभाव है जो कि मांस-मदिरा का सेवन नहीं करते हैं और सत्ता में भी उनका विशेष स्थान रहा है। वहां बिना प्याज लहसून के इस्तेमाल से तैयार किया गया जैन पिज्जा व बड़ा पाव मिलने लगा था। इन चीजों के उपयोग के बिना बनाया गया स्वामीनाराण भोजन भी बेचा जाने लगा। हालांकि लोग अपने निजी खानपान में मांस मछली का छुपकर इस्तेमाल करते रहे है। पर सड़क के किनारे ढाबे शुद्ध शाकाहारी भोजन बेचने पर जोर देते हैं।

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राज्य के कई समाजशास्त्रियों का मानना है कि यह सोचना गलत है कि गुजरात शुरु से शाकाहारी राज्य रहा है। पर हां, वहा अधिक संख्या में लोग शाकाहारी है। 2014 में किए गए एक सर्वे में पाया गया था कि यहां के 40 फीसदी लोग मांसाहारी है। यह संख्या पंजाब और राजस्थान की तुलना में काफी ज्यादा है। मुसलमान व ईसाई, पारसी, आदिवासी व अनुसूचित जाति के लोग भी मांस भक्षण करते है। गुजरात 1250 किलोमीटर लंबी समुद्र समुद्र सीमा से घिरा हुआ है। तभी बढ़ी तादाद में ऐसे आदिवासी व मुछआरे हैं जिनका मुख्य भोजन मछली है। दक्षिण गुजरात का भोजन भी सूखे उत्तरी गुजरात से अलग है।

आजादी के पहले मुसलमान व अंग्रेज आए जिनके कारण राज्य में मांसाहार को बढ़ावा मिला। उनकी भाषा पर भी पारसी व उर्दू के शब्दों का प्रभाव पड़ा। अंग्रेजों के शासन के दौरान व्यापार करने वाले ब्राह्मण-बनिया काफी पढ़े लिखे होते थे। वे आम लोगों से अलग माने जाने लगे जो कि मांसाहार करते। वहां अलग अलग तरह के ऐसे वर्ग चौपारीदार, क्षत्रिय, बनिया व ब्राम्हण समाज बने जिसमें राजघराने में सलाहाकारों के रुप में काम करने वाले ब्रावे ह्मण व बनिया भी थे जो सब खाते पीते । वैसे ही जैसे कायस्थों ने मुगलों के साथ रह कर सीखा।

सन् 2016 में एक सर्वे में पाया गया कि राज्य में मांसाहारी लोगों की संख्या शाकाहारियों को काफी पीछे छोड़ चुकी है. ध्यान रहे जब नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने कभी भी मांसाहार व शाकाहारी के मुद्दे पर जोर नहीं दिया। पर अब भाजपा इस मामले को ठंडा करने की कोशिश कर रही है। भाजपा के नेताओं का मानना है कि कहीं कुछ लोगों के इस उन्माद के कारण हमारा वोट बैंक प्रभावित न हो जाए।

पूर्व मुख्यमंत्री विजय रुपाणी के गृहनगर राजकोट में वहां के मेयर व कुछ अन्य पार्टी नेताओं ने राजकोट को शाकाहारी बनाने के ऐलान कर पार्टी की नींद उड़ाई है। इनके अनुसार मांसाहार से आने वाली बदबू बच्चों व शाकाहारी लोगों का दिमाग खराब कर देती है। इस सबसे सड़कों के किनारे अंडे और मुरगे आदि बेचने वाले लोगों के धंधे पर काफी बुरा असर पड़ा है। बहरहाल  भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सी आर पाटिल ने प्रेस कान्फ्रेंस में कहा है कि प्रदेश में कोई भी मांसाहार बेचने के लिए स्वतंत्र है व हमने मांसाहार बेचने से रोकने के लिए कोई कानून नहीं बनाया है।  सभी मेयरो को यह बता दिया गया है कि वे मांसाहार बेचने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई न करे।

गुजरात में भक्ति व सूफी दोनों ही आंदोलन का असर रहा है। हालांकि स्वामीनारायण आंदोलन के बाद राज्य में शाकाहारी लोगों की संख्या में इजाफा हुआ व महात्मा गांधी ने भी मांसाहार खासतौर पर अंडा न खाने की बात कही हुई है। उन्होंने मच्छीमारों को शाकाहारी बनाने की भी कोशिश की थी मगर वे सफल नहीं हुए। जैसे हम मांसाहार करने वाले जानवरों को भूसा व घास खाने के लिए बाध्य नहीं कर सकते वैसे ही मांसाहार करने वालों को शाकाहारी बना पाना बहुत मुश्किल है। हालांकि अब मांसाहार के काफी मंहगा होने के कारण ही लोग खुद शाकाहारी बनने के लिए मजबूर हो रहे हैं।

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