फालतू का जातिवादी रंग

जब मैंने पुलिस वालों की हत्या के बाद अपराधी विकास दुबे के एनकाउंटर में मारे जाने की खबर पढ़ी तो मुझे लग रहा था कि उसके ब्राह्मण होने के कारण जातिवाद बाहुल्य हमारे देश में बहुत जल्दी ठाकुर बनाम ब्राह्मण के बीच जल्द विवाद पर सोशल मीडिया में चख-चख शुरू हो जाएगी। और वहीं हुआ। पहले किसी ने सोशल मीडिया पर भेजा कि सावन के महीने में एक ब्रह्म हत्या हुई है। एक बुजुर्ग ब्राह्मण ने बताया कि पंडित सही कहते थे यह सब रामराज्य से ही चला आ रहा है। जब राम लंका में रावण का वध कर वापस अयोध्या लौटे तो उन्हें पंडितो ने बताया कि ब्राह्मणों को मारकर उन्होंने ब्रह्म हत्या की है इसलिए उन्हे एक विशेष यज्ञ करना होगा।

राम ने यज्ञ की तैयारी की मगर समस्या यह थी कि कोई भी ब्राह्मण यह यज्ञ करने के लिए तैयार नहीं था। अतः उन्होंने हनुमानजी से कहा कि देश में जहां भी ब्राह्मण मिले वे उनको मनाकर यज्ञ करवाने के लिए ले आए। हनुमानजी कुछ ब्राह्मणों को लालच देकर अपने साथ ले आए। उनको दक्षिणा के रूप में रामचंद्र ने भारी जमीन जायदाद व रूपया पैसा दिया। और वे लोग अयोध्या के ही सरयू की नदी के पास बस गए। बाद में इन लोगों को सरयूपारी कहा जाने लगा। उनसे बाकि ब्राह्मण समाज ने दूरी रखी।पर हकीकत है कि पूजा-पाठ करने वाले आज भी वे ही ज्यादा है और अयोध्या इनका केंद्र हैं।

मेरा पूरा जीवन ब्राह्मणों के बीच बीता है। मैं उस उत्तर प्रदेश का रहने वाला हूं जहां देश में ब्राह्मणों की संख्या सबसे ज्यादा है। कानपुर का तो कहना ही क्या वहां आपके पड़ोसी, चायवाला, दुकानदार हलवाई से लेकर टैंपो चालक तक सभी ब्राह्मण थे। मेरे सारे मित्र ब्राह्मण ही है। मेरी पत्नी भी ब्राह्मण है। मेरा मानना है कि वे लोग बहुत समझदार व विद्वान होते हैं। हमारे स्कूल का नाम उन्ही से था। सारे अध्यापक ब्राह्मण ही थे व हम जब छोटे थे तब उनके पैर छूकर उनकी वंदना करते थे। स्कूल में शुक्लाजी, दीक्षितजी, भारद्वाजजी, त्रिपाठीजी आदि हमें पढ़ाते थे। कानपुर के आस-पास तो शुक्लागंज, चौबेपुर आदि स्थान तक ब्राह्मणों के सरनेमों पर ही आधारित है। जब विकास दुबे एनकाउंटर में मारा गया तब मुझे लगा कि बहुत जल्दी ही मामलाजातिवाद की और ले जाएगा। जब मेरे पिताजी 1960 में झांसी से तबादले के कारण कानपुर आए तो हम ब्राहण बहुल मुहल्ले में मकान किराए पर लेकर रहने लगे थे। वहां के 90 फीसदी मकान मालिक ब्राह्मण थे। हमारे कायस्थ होने के कारण सब लोग यह कहकर मकान किराए पर देने को मना करते थे कि हम लोग मांस खाते हैं। हमने वहां रहते हुए कभी मांस नहीं खाया। हालांकि बचपन में एक दिन मकान मालिक का बेटा हमसे मांस खिलाने की जिद करने लगा। हम लोग मांस तो दूर रहा अंडा तक नहीं खाते थे। फिर बड़ा हुआ तो पता चला कि ब्राह्मण तो वहां के नेताओं के लिए सिर्फ एक जाति हीं नहीं वोट बैंक भी है।

पहले बहनजी मायावती जब दलितो पर केंद्रित राजनीति करती थी तब ब्राह्मण समेत तमाम ऊंची जातियो को यह कहते हुए गाली देती थी कि तिलक (ब्राह्मण), तराजू (बनिया) और तलवार (राजपूत) इनको मारो जूते चार।
मगर जब केवल दलित वोटो के बूते उन्हें लगा कि वे सत्ता में नहीं आ सकती है तो उन्होंने सतीश मिश्रा को अपनी पार्टी का महासचिव बनाने के साथ ही यह नारा दिया कि ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी बढ़ता जाएगा। उन्हें इसका लाभ भी हुआ और वे ज्यादा सीटें हासिल करके मुख्यमंत्री बनी। अब विकास दुबे के हत्या को जातीय रूप दिया जाने लगा है। एक ने भेजा है कि एक ठाकुर शासक ने एक ब्राह्मण की ब्रह्महत्या करवा दी है। वे यह भूल जाते हैं कि आम ब्राह्मण ही नहीं हर नागरिक विकास दुबे को ब्राह्मण नहीं अपराधी मानता था और मानता है। सच तो यह है कि उसने जिन आठ पुलिस वालो को अपना निशाना बनाया उनमें ज्यादातर ब्राह्मण ही थे व एक ब्राह्मण पुलिस वाले की मुखबरी के कारण ही उसने यह करतूत की थी। योगी के सत्ता में आने के बाद कहां-कहां कितने ब्राह्मण मारे गए इसका रिकार्ड भी भेजा जाने लगा है। मायावती ने तो अपनी आदत के मुताबिक इस घटना का पूरा लाभ उठाने के लिए बयान तक दे दिया है कि राज्य की भाजपा योगी सरकार का ब्राह्मण विरोधी है।

याद रखिए विकास दुबे पहले बसपा में ही था। वह बहनजी के काफी निकट माना जाता था। सच तो यह है कि बसपा में कांशीराम भी कभी ब्राह्मण विरोधी थे। एक बार दिल्ली की रैली में आए कुछ लोगों ने एक महिला पत्रकार को छेडा था। हम उसे लेकर कांशीराम के पास गए व सारी बात बताई। इस पर कांशीराम ने उसकी जाति व नाम पूछा व हुए कहा कि हमारे कार्यकर्ताओं ने तुम्हें सिर्फ छेड़ा है। मैं तो उन लोगों से बहुत कुछ कहता हूं। उस महिला पत्रकार व हम सभी लोग उनकी बात सुनकर चुप रह गए। यह यह ध्यान दिलाना जरूरी हो जाता है कि विकास ने जिस राज्यमंत्री संतोष शुक्ला की थाने में हत्या की थी वह भी ब्राह्मण ही था। अपराधी किसी जाति विशेष के नहीं हैं और हर मामले को जाति में नहीं तौलना चाहिए।

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