nayaindia Shiv Sena Congress relationship शिवसेना-कांग्रेस में क्या बढ़ेगा नाता?
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शिवसेना-कांग्रेस में क्या बढ़ेगा नाता?

हमारे देश में तमाम दलों की एकता बनती-बिगड़ती रहती है वह पारे के टुकड़ों की तरह होते हैं न तो अलग हट सकते हैं और न ज्यादा समय तक एक साथ एकजुट रह सकते हैं। हम विपक्षी दलों को एक होते व बिखरते देखते आए हैं। अब  2024 के आम चुनाव के मद्देनजर शिवसेना खुद को राष्ट्रीय स्तर पर लाने के लिए विपक्षी एकता बनाने के लिए कांग्रेस को साथ लाने की कोशिश में है। Shiv Sena Congress relationship

एक पुरानी कहावत है कि राजनीति में न तो कोई स्थायी दोस्त होता है और न कोई दुश्मन होता है। कब दो दुश्मन सत्ता हथियाने के लिए एक दूसरे के दोस्त बन जाए और कब दो जानी दुश्मन किसी अपने से बड़े दुश्मन को निपटाने के लिए साथ आ जाए, इसका पता नहीं चलता है। हाल में महाराष्ट्र की शिवसेना द्वारा कांग्रेस और एनसीपी से दोस्ती का हाथ बढ़ाने के साथ यह कहावत चरितार्थ है। शिवसेना सांसद संजय राउत ने दिल्ली आकर पहले राहुल गांधी से व फिर पार्टी की महासचिव प्रियंका गांधी से लंबी मुलाकातें की जिससे राजधानी के राजनीतिक गलियारों में तरह तरह की अटकलें लगाई जाने लगी।

यह कहा जा रहा है कि तृणमूल कांग्रेस की तरह शिवसेना भी राष्ट्रीय स्तर पर राजनीति करना चाहती है। हालांकि तृणमूल कांग्रेस केंद्रीय राजनीति में कांग्रेस को कम कर के आंक रही है वहीं शिवसेना ने दो टूक शब्दों में विपक्षी राजनीति में कांग्रेस की अंहमियत बताते हुए कह दिया है कि कांग्रेस के बिना भाजपा को टक्कर नहीं दी जा सकती है।

संजय राउत का यह कहना बहुत अहमियत रखता है कि उनकी पार्टी कांग्रेस के साथ उत्तर प्रदेश व गोवा के चुनाव में मिलकर लड़ना चाहती है। उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि भाजपा को इकलौता कोई भी दल हरा नहीं सकता है। उससे लड़ने के लिए  हिंदुत्व व राष्ट्रीयता का होना जरुरी है। इस मामले में शिवसेना भाजपा को जबरदस्त टकराव दे सकती है। अतः दोनों दल एक दूसरे की मदद करेंगे। यह मुलाकात कांग्रेस के लिए जीवनदायी साबित हुई है क्योंकि हाल ही में तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मुंबई में कहा था कि कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूपीए जैसा कोई एलायंस है ही नहीं। इसके जवाब में संजय राउत ने शिवसेना के अखबार सामना में लिखा कि आज यूपीए की बहुत जरुरत है। कांग्रेस का आज बहुत महत्व है क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर वही एकमात्र विपक्षी दल है।

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संजय राउत ‘सामना’ के संपादक होने के साथ महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के सबसे करीब व विश्वासपात्र है। उनकी आवाज को उद्धव ठाकरे की सोच समझा जाता है। इसके पीछे भले ही उनका उद्देश्य राष्ट्रीय स्तर पर राजनीति करना रहा हो मगर फिलहाल उनका उद्देश्य पिछले तीन सालों में महाराष्ट्र की सत्ता पर काबिज महाविकास अघाड़ी (एमवीए) गठबंधन को मजबूत बना कर कायम रखने का है। जब उसकी सरकार बनी थी तो तमाम लोगों का मानना था कि वह अल्पायु साबित होगी।

मगर वह तीन सालों से सत्ता में है और यह गठबंधन उतना ही मजबूत दिख रहा है। जितना की मजबूत 30 सालों से उसका व भाजपा का गठबंधन रहा है। याद दिलाना जरुरी है कि एमवीए गठबंधन में शामिल दलों में राज्य के अलग-अलग हिस्सों के प्रभाव का वोट है। उन्होंने कहा कि भाजपा का आरोप गलत है कि धर्मनिरपेक्ष दलों का यह गठबंधन हिंदुत्व के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि हम लोग हिंदुत्व के खिलाफ नहीं बल्कि भाजपा के हिंदुत्व के खिलाफ है जो कि हिंदुत्व से एकदम अलग है। इस गठबंधन में आपसी तनाव होने के बावजूद दलों को एक साथ रखते हुए सरकार चलाने में कामयाब रहे।

शिवसेना के सत्ता गठबंधन में कांग्रेस शामिल है। उन्हें  पता था कि कांग्रेस नेतृत्व ने अपने मन से यह कदम उठाया है। वह शिवसेना को सांप्रदायिक मानते आये हैं। उनका दिल्ली में कांग्रेस के नेताओं से मिलना यह दिखाता है कि शिवसेना राजनीति में कांग्रेस के साथ बेहतर संबंध बनाना चाहती हैं। इससे पहले संजय राउत ने मुख्यमंत्री के बेटे आदित्य को महाराष्ट्र में शिवसेना के सत्ता में आने के बाद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात करवाई थी। इस मुलाकात को सौजन्यपूर्वक की गई मुलाकात कहा गया था। पिछले साल आदित्य ठाकरे ने दो बार राहुल गांधी से मुलाकात की हैं पिछले साल अगस्त व मई माह में मुलाकातें हुई थी। इस बारे में पूछे जाने पर कहा था कि देश में सारी ताकत एक ही हाथ में सिमटती जा रही है। हमें संविधान का संघीय ढांचा बचाने की जरुरत है।

गांधी परिवार से निकटता बढ़ाने के लिए संजय राउत राहुल गांधी को महाराष्ट्र आकर मुख्यमंत्री से मुलाकात का न्यौता दे चुके हैं। अब उनका मानना है कि अगले लोकसभा चुनाव से पहले देश में एक मजबूत विपक्षी गठबंधन होना चाहिए। उनकी तमाम बातें कांग्रेस पर किए जा रहे ममता बनर्जी के हमले के जवाब के रुप में देखी जा रही है। हाल ही में कांग्रेस की ओर से इसका प्रत्युत्तर तब देखने में आया जबकि राहुल गांधी के करीबी महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस के नेता नाना पटोले ने शरद पवार से मुलाकात करने के बाद कहा कि एमवीए का रिमोट कंट्रोल तो उनके हाथों में है। इससे यह लगा कि इस सरकार को कोई खतरा नहीं है व अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा कर सकेगी।

 वहीं शरद पवार का कहना था कि अगर किसी दिन शिवसेना का कोई नेता प्रधानमंत्री बनता है तो उन्हें बहुत खुशी होगी। यहां यह याद दिला दे कि दादर-नगर हवेली में लोकसभा उपचुनाव जीतने के बाद शिवसेना का आत्म विश्वास काफी बढ़ गया है। महाराष्ट्र के बाहर मिली यह पहली चुनावी जीत थी। इससे उसके नेता व कार्यकर्ता बहुत उत्साहित है। वे चाहते हैं कि उनका दल महाराष्ट्र के बाहर भी अपनी जड़े मजबूत करे। शिव सेना को भी कांग्रेस में अपना राजनीतिक भविष्य नजर आता है। शिवसेना का मानना है कि कांग्रेस अनेक राज्यों में मौजूद हैं व उससे मिलकर भाजपा को जोरदार टक्कर दी जा सकती है।

हमारे देश में तमाम दलों की एकता बनती-बिगड़ती रहती है वह पारे के टुकड़ों की तरह होते हैं न तो अलग हट सकते हैं और न ज्यादा समय तक एक साथ एकजुट रह सकते हैं। हम विपक्षी दलों को एक होते व बिखरते देखते आए हैं। अब  2024 के आम चुनाव के मद्देनजर शिवसेना खुद को राष्ट्रीय स्तर पर लाने के लिए विपक्षी एकता बनाने के लिए कांग्रेस को साथ लाने की कोशिश में है। उन्होंने शिवसेना के स्थापना दिवस पर 2020 में इसका संदेश देते हुए कहा था कि अब मुझे पार्टी में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी भूमिका अदा करनी है। उन्होंने कहा उस दिन उन्हें बहुत खुशी होगी कि जिस दिन कोई शिवसैनिक इस देश का प्रधानमंत्री बनेगा। जवाब में राउत ने कहा कि आप महाराष्ट्र को बहुत अच्छी तरह से शासन दे रहे हैं। अब अगर देश को नेतृत्व देना है तो और जगह लड़ना होगा। इससे पहले जब शिवसेना ने उत्तरप्रदेश, बिहार व गोवा में विधानसभा चुनाव लड़े थे तो उसे हर जगह असफलता मिली। इसलिए उसे इअहसास हो गया है कि कांग्रेस की पतली हालत देख कर वह उसे तमाम राज्यों में उसे अपना अच्छा राजनीतिक साथी बना सकती है।

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