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बनावटी कथानक का परिणाम

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vodafone idea bankrupt birla वोडफोन कंपनी बंद हुई तो उसकी कीमत आखिरकार हम-आप ही चुकाएंगे। लेकिन जब देश कृत्रिम कथानकों में बहता है, तो उसका यही नतीजा होता है। टेलीकॉम सेक्टर एक समय भारत का चमकता उद्योग था। आज वह निराशा की कहानी है। इस रूप में वह भारतीय अर्थव्यवस्था का वास्तविक प्रतिनिधि है।

दस साल पहले का नजारा याद कीजिए। देश भ्रष्टाचार मिटाने के मूड में था। तब ये किसी को सोचने की फुर्सत नहीं थी कि वो मूड स्वतःस्फूर्त बना, या उसे राजनीतिक मकसदों से एक खास विचारधारा से जुड़े समूहों ने कृत्रिम रूप से निर्मित किया। निशाने पर तत्कालीन यूपीए सरकार थी। उस पर पहला आरोप था कि उसने दूरसंचार के 2-जी स्पेक्ट्रम के आवंटन में घोटाला किया। अपना बचाव करने में ये सरकार और उससे जुड़ी पार्टियां इतनी अक्षम साबित हुईं कि देश ने मान लिया कि सचमुच ऐसा बड़ा भ्रष्टाचार हुआ है, जिससे देश को (जैसाकि तत्कालीन सीएजी ने बताया) एक लाख 76 हजार करोड़ रुपए का चूना लगा है।

माहौल ऐसा बना कि स्पेक्ट्रम आवंटन जैसा विशुद्ध रूप से कार्यपालिका के अधीन आने वाला नीतिगत फैसला न्यायिक दायरे में चला गया। सुप्रीम कोर्ट ने भी बहती गंगा में हाथ धोया और निर्देश दे दिया कि स्पेक्ट्रम का आवंटन नहीं, नीलामी होनी चाहिए। यह भी याद कर लीजिए कि उस समय टेलीकॉम क्षेत्र में अनगितन कंपनियों के बीच तीखी प्रतिस्पर्धा थी, जिसका लाभ उपभोक्ताओं को मिल रहा था। साथ ही हजारों नौकरियां पैदा हो रही थीं। अब वर्तमान में लौटते हैँ। इतने बड़े भारतीय में बची तीन प्राइवेट कंपनियों में एक- वोडाफोन अब ढहने के कगार पर है। देश के बड़े उद्योगपति कुमार मंगलम बिड़ला ने कंपनी की अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त होने का एलान कर दिया है।

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कह दिया है कि अगर पब्लिक सेक्टर उसे संभाल सके तो संभाले। वे अपने शेयर उसे ट्रांसफर कर देंगे। लेकिन जब पब्लिक सेक्टर की अपनी कंपनी बीएसएनएल भारी घाटे में है, तो ये सेक्टर भला वोडाफोन को कैसे संभालेगा। तो बाजार में सरकार की पसंदीददा कंपनी जियो का एकाधिकार कायम होने की स्थिति है। इससे भयभीत बची दो कंपनियों में से एक- एयरटेल ने साफ कहा है कि वोडाफोन का बंद होना अच्छी बात नहीं होगी। ताजा आंकड़ों के मुताबिक टेलीकॉम सेक्टर को बीते पांच वर्षों में नौ लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। अनुमान है कि वोडाफोन कंपनी बंद हुई, तो उससे बैंकों और सरकारी खजाने को एक लाख 60 करोड़ रुपए की क्षति होगी। कीमत आखिरकार हम-आप ही चुकाएंगे। लेकिन जब देश कृत्रिम कथानकों में बहता है, तो उसका यही नतीजा होता है। टेलीकॉम सेक्टर एक समय भारत का चमकता उद्योग था। आज वह निराशा की कहानी है। इस रूप में इसे भारतीय अर्थव्यवस्था का वास्तविक प्रतिनिधि कहा जा सकता है।

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