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Friday, May 14, 2021
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हिकमत, हिमाकत और हाकिम का हुक्म!

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शंकर शरणhttp://www.nayaindia.com
हिन्दी लेखक और राजनीति शास्त्र प्रोफेसर। जे.एन.यू., नई दिल्ली से सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी पर पीएच.डी.। महाराजा सायाजीराव विश्वविद्यालय, बड़ौदा में राजनीति शास्त्र के पूर्व-प्रोफेसर। ‘नया इंडिया’  एवं  ‘दैनिक जागरण’  के स्तंभ-लेखक। भारत के महान विचारकों, मनीषियों के लेखन का गहरा व बारीक अध्ययन। उनके विचारों की रोशनी में राष्ट्र, धर्म, समाज के सामने प्रस्तुत चुनौतियों और खतरों को समझना और उनकी जानकारी लोगों तक पहुंचाने के लिए लेखन का शगल।भारत पर कार्ल मार्क्स और मार्क्सवादी इतिहास लेखन, मुसलमानों की घर वापसी; गाँधी अहिंसा और राजनीति;  बुद्धिजीवियों की अफीम;  भारत में प्रचलित सेक्यूलरवाद; जिहादी आतंकवाद;  गाँधी के ब्रह्मचर्य प्रयोग;  आदि कई पुस्तकों के लेखक। प्रधान मंत्री द्वारा‘नचिकेता पुरस्कार’ (2003) तथा मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति द्वारा ‘नरेश मेहता सम्मान’(2005), आदि से सम्मानित।

वासिम रिजवी द्वारा कुरान की कुछ आयतों पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका 50 हजार रू. दंड के साथ खारिज हुई। बिना किसी टिप्पणी। मानो, याचिका ही हिमाकत थी! इस में न्यायपालिका के नजीर की भी उपेक्षा हुई। कुरान पर कलकत्ता हाई कोर्ट (1985), और दिल्ली मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट (1986) ने भी फैसले दिए हैं। हाई कोर्ट ने कुरान के बचाव में लिखा, जब कि मजिस्ट्रेट के फैसले के अनुसार ‘कुरान-मजीद के प्रति पूरे सम्मान के साथ उन आयतों का ध्यान पूर्वक अध्ययन दिखाता है कि वे सचमुच हानिकारक और घृणा सिखाती हैं; तथा मुसलमानों और अन्य समुदायों के बीच विभेद पैदा करती हैं।’ यह फैसला 31 जुलाई 1986 को आया था, और कोई प्रतिवाद नहीं हुआ। आखिर दिल्ली सरकार ने उस के खिलाफ अपील क्यों नहीं की?  न किसी मुस्लिम संगठन ने। यानी, उन्हें भी समस्या का अहसास हुआ।

तब आश्चर्य है कि सुप्रीम कोर्ट ने एक मुस्लिम की बात ऐसे सरसरी खारिज की। एक सुशिक्षित, बड़े पद पर रहा मुसलमान दूसरों से अधिक ही अपनी किताब को जानता है। फिर, शिकायत का नुक्ता सामाजिक था, इसलिए भी उस की उपेक्षा दुर्भाग्यपूर्ण है। विशेषकर क्योंकि इस्लाम जगजाहिर रूप से मजहब और राज्य, दीन व दौला, दोनों है। कुरान व सुन्ना के राजनीतिक हिस्सों से ही शरीयत, इस्लामी कानून बने है। अतः संजीदा सुनवाई का शैक्षिक महत्व भी होता।

जबकि इसी सुप्रीम कोर्ट ने हाल में ‘तीन तलाक’ मामले में खुद कुरान को पलट कर देखा था। वही करना इस मामले में भी उचित होता। रिजवी का निवेदन था कि कुरान की 26 आयतों का इस्तेमाल ‘आतंकवाद, हिंसा, जिहाद फैलाने में होता है।’ उसी से मुस्लिम युवा आतंकवादी बनाए जाते हैं, लाखों-लाख निर्दोषों की हत्याएं होती रही हैं। ये काल्पनिक बातें नहीं जिन की परख कठिन हो! कोर्ट देखती कि उन आयतों में क्या है? उन पर जानकारों की राय, और इतिहास क्या  है?

वस्तुतः कई देशों में वह चिंता है। कुछ पहले ऑस्ट्रिया में कुरान का सार्वजनिक वितरण प्रतिबंधित हुआ था। स्विटजरलैंड के सुरक्षा विभाग ने भी यही अनुशंसा की। एक बार लास एंजिलस में किसी संस्था द्वारा स्कूलों में वितरित की गई कुरान वापस कर ली गई थी। एक रूसी अदालत ने कुरान का कोई विशेष अनुवाद प्रतिबंधित किया। चीन में मुसलमानों को कुरान से दूर करने की कोशिश है। हर कहीं रिजवी की शिकायत से मिलते-जुलते कारण ही बताए गए।

बल्कि, पिछले साल तुर्की, सऊदी अरब, और ईराक में भी कुरान में सुधार की माँगें उठी। तुर्की में खबर मिली कि स्कूलों में छात्र कुरान पढ़कर इस्लाम से विमुख हो रहे हैं। सऊदी अरब में कुरान की परख करके समयानुकूल बनाने का सुझाव आया। सऊदी लेखक अहमद हाशिम के अनुसार प्रचलित कुरान खलीफा उस्मान ने तैयार कराया था, जिस ने कुरान के पिछले विभिन्न पाठ और मूल स्त्रोत भी नष्ट करवा दिए। यानी इस कुरान के निर्माण में ‘मानवीय हस्तक्षेप’ हुआ था। तब उसे अपरिवर्तनीय कहना भ्रामक है।

फिर, ठोस व्यवहार से भी रिजवी की शिकायत पुष्ट होती है। न्यूयॉर्क 9/11  की तबाही मचाने वाले मुहम्मद अट्टा ने लिखा था, कि ‘हमारे लिए यही काफी है कि कुरान की आयतें अल्लाह के शब्द हैं।’ अल कायदा सरदार ओसामा बिन लादेन ने सऊदी शासक किंग फहद को पत्र (11 जुलाई 1995) लिखा था कि ‘सारा झगड़ा इस्लाम से चलने या न चलने का’ है। उस ने बीस बार कुरान की आयतें उद्धृत कर धमकाया था: ‘हम अल्लाह के मजहब में विश्वास कायम करने और उन विश्वासों के लिए बदला लेंगे।’ सो, बिन लादेन ने दुनिया में जो आतंक मचाया, उस का मकसद सब को कुरान के अनुसार चलाना था।

यूरोप में सभी जिहादी प्रदर्शन प्रायः कुरान की आयतों के साथ होते हैं। बंगलादेश में जुलाई 2016 में जिहादियों ने बीस विदेशियों का गला रेत कर कत्ल किया। यही कह कर, कि कुरान नहीं जानने वाले कत्ल होने लायक हैं!

हालिया इस्लामी स्टेट के सारे काम घोषित रूप से ‘प्रोफेट मेथडोलॉजी’ से हैं। उस के झंडे पर कुरान के शब्द हैं। उस के सारे कारनामे कुरान व सुन्ना के नाम पर ही हुए। उसी तरह के तालिबान बरसों अफगानिस्तान के शासक रहे, और फिर हो सकते हैं! अतः यह कहना भगोड़ापन है कि दुनिया भर के मुस्लिम अपनी ही किताब नहीं समझते! जबकि गैर-मुस्लिमों द्वारा अध्ययन भी वही अर्थ बताते हैं।

यहाँ विश्व के महान विद्वानों, नेताओं के विचार तुलनीय हैं। जैसे, उमर खय्याम (11वीं सदी) ने कुरान को चुनौती देते लहजे में पूछा था कि  ‘ईश्वर ने एक लिजलिजे दिमाग वाले, भुखमरे, कट्टर गिरोह को ऐसा ज्ञान दे दिया जो और किसी को नहीं दिया?’

फ्रांसीसी दार्शनिक वोल्तेयर (18वीं सदी) ने लिखा कि ‘कुरान अटपटी किताब है जिस के हर पन्ने को पढ़कर सामान्य बुद्धि सिहर उठती है। जिस के नाम पर मुहम्मद ने अपने समाज को आग में झोंक दिया, पिताओं के सिर काटे, बेटियों का अपहरण किया, हारे लोगों को इस्लाम-या-मौत का विकल्प दिया। ऐसी बातें वही मान सकता है जिस में सारी प्राकृतिक चेतना लुप्त हो चुकी हो।’

ब्रिटिश इतिहासकार गिब्बन (18वीं सदी) के अनुसार ‘मुहम्मद सब को चुनौती देते थे कि कुरान के किसी पन्ने जैसी कोई चीज दिखाए! इस पर वैसे वज्रमूर्ख अरब ही विश्वास कर सकते थे जो मानवीय मेधा की महान कृतियों की तुलना करने में नितांत असमर्थ थे। कुरान की आयतें किसी दैवी स्त्रोत के बदले मुहम्मद की मनमर्जी, उन की नीतियों या कामनाओं को पूरा करने के लिए आती थी।’

जर्मन दार्शनिक शॉपेनहावर (19वीं सदी) के अनुसार कुरान ‘अत्यंत हीन पुस्तक है जिस से केवल रक्तरंजित युद्धों व दूर-दूर कब्जे-विस्तार की ही प्रेरणा मिली है। इस में मुझे एक भी मूल्यवान विचार नहीं मिला।’

प्रसिद्ध राजनीतिक चिंतक अलेक्सिस दे तॉकविल (19वीं सदी) ने ‘कुरान का बार-बार अध्ययन किया’ और पाया कि ‘मुहम्मदी मजहब जितना खतरनाक मानवता के लिए शायद ही कोई और रिलीजन है।’

चार बार ब्रिटेन के प्रधान मंत्री रहे ग्लैडस्टोन (19वीं सदी) ने कहा था कि ‘जब तक कुरान रहेगी, दुनिया में शान्ति नहीं हो सकती’। महान अमेरिकी लेखक मार्क ट्वेन (19-20वीं सदी) के अनुसार ‘कुरान का परीक्षण करने पर मुझे निसंस्देह यही लगा कि मजहबी मामलों में हरेक मुसलमान पागल है।’

तुर्की के महान नेता मुस्तफा कमाल पाशा (20वीं सदी) ने इस्लाम को ‘एक अनैतिक अरब का मतवाद’ कहा था ‘जो आधुनिक राज्य के लिए अनुपयुक्त है’।  महर्षि दयानन्द सरस्वती (19वीं सदी) के अनुसार कुरान किसी हाल में ईश्वर या किसी जानकार मनुष्य की भी रचना नहीं हो सकती। स्वामी विवेकानन्द, श्रीअरविन्द, राम स्वरूप, जैसे अनेक महान भारतीय ज्ञानियों के विचार भी उसी तरह के हैं। उपर्युक्त सभी उदाहरण भर है। ऐसे और असंख्य आकलन हैं।

तो क्या वे सारे महापुरुष गलत हैं? जबकि आज भी अनेक जिम्मेदार लोगों की वही राय है। दो महीने पहले ग्रीस के आर्कबिशप लेरोनियस द्वितीय ने टी.वी. व्याख्यान में कहा कि इस्लाम ‘रिलीजियन नहीं बल्कि राजनीतिक दल और राजनीतिक लक्ष्य है और इस के अनुयायी युद्ध लड़ने वाले लोग हैं।’

इस की पुष्टि बड़े-बड़े मुस्लिम नेता करते रहते हैं। पिछले ही साल मलेशिया के पूर्व-राष्ट्रपति महाथिर मुहम्मद ने ‘लाखों-लाख फ्रांसीसियों को मार डालने’ जैसी बात कहकर खूब दलीलें दीं! तुर्की राष्ट्रपति एरदोगान मुसलमानों को ‘फौजी’, मस्जिदों को ‘बैरक’,  मस्जिद की मीनारों को ‘संगीन’ की संज्ञा देते हैं। पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने जिहाद को ‘विदेश-नीति का अंग’ बताया। लेकिन जिहाद का मतलब और हुक्म किस किताब में है? केवल कुरान और सुन्ना में।

दरअसल, कुरान से आयतें हटाना जरूरी भी नहीं। केवल मान लें कि ऐसी चीजें उस में हैं, जो गलत और हानिकारक हैं। यहूदी, ईसाई समुदाय अपनी पवित्र पुस्तकों के बारे में यह कर चुके। अमेरिकी बिशप और हार्वर्ड विश्वविद्यालय में शिक्षक जॉन स्पॉन्ग ने ‘द सिन्स ऑफ स्क्रिपचर’ (पवित्र पुस्तक के पाप) नामक पूरी पुस्तक लिखी कि बाइबिल, ओल्ड टेस्टामेंट में लिखी कई बातें हिंसात्मक हैं।

यदि मुसलमान भी अपनी पुस्तक की यह कमी मान लें तो बड़ी हिकमत की बात होगी। तभी उन्हें  विवेकशील सोच-विचार का मार्ग खुलेगा। दूसरों के साथ सहज संबंध बनना शुरू होगा। संभवतः वासिम रिजवी ने यही प्रयास किया था। अच्छा हो, हमारे हाकिम अपने हुक्म पर पुनर्विचार कर रिजवी को दिया गया दंड निरस्त करें।

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साभार - ऐसे भी जाने सत्य

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