हम, भारत के लोग…मतलब रोबो नहीं!

हर देश अपना अर्थ इस प्रस्तावना से शुरू करता है कि ….हम, अमेरिका के लोग…हम, आस्ट्रेलिया के लोग… हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण…। मतलब भू भाग विशेष के मानवों ने, उनकी मानव सभ्यता ने अपनी रचना, अपना राष्ट्र अपने इतिहास, संस्कार, इच्छा, इरादों में गुंथा हुआ है। सो, जब हम, भारत के लोग या हम अमेरिका के लोग, हम चीन के लोग के संदर्भ में विचार करना हैं तो यह जान लेना चाहिए कि जो राष्ट्र बने हुए हैं वे भूभाग विशेष के मानवों का, होमो सेपिंयंस वंशजों की आबादी रचना, मनोविज्ञान को लिए हुए है। भारत मतलब भारत के सवा सौ करोड़ लोगों का एक समूहजन्य शरीर। चीन है तो मतलब डेढ़ सौ करोड़ चीनियों का डीएनए लिए हुए एक शरीर।

अब शरीर जीवन जैसे जन्म की परिस्थितियों-परिवेश, वंशानुगत खास डीएनए, बचपन, लड़कपन, जवानी, प्रौढ़ता व बुढ़ापे की अवस्थाएं (हम सनातनी हिंदुओं के संदर्भ में तो जन्म-जन्मांतर, जन्म-पुनर्जन्म के पाप-पुण्य, अलग-अलग जीवों की योनियों का जीवन अनुभव भी) लिए होता है तो राष्ट्र का शरीर भी विशेष बुनावट, व्यवहार, परफॉरमेंस, स्वस्थता-अस्वस्थता, सफलता-असफलता, मनोविज्ञान, इच्छा-इरादा-सामर्थ्य लिए होता है।

सोचें कि हम जब अपने को दिखाने डॉक्टर के पास जाते हैं तो डॉक्टर अवस्था देख कर क्या पूछता है?क्या इस तरह नहीं कि क्या इतिहास है?क्या माता-पिता, पूर्वजों को भी डायबिटीज थी? क्या खाते हो, क्या पीते हो? कब से बीमार हो?फिर वह अलग-अलग उपकरणों के साथ शरीर की जांच-पड़ताल करने लगता है। उम्र, अवस्था अनुसार धड़कन, दिमाग, शरीर की क्षमताओं को जांचने लगता है और यदि शरीर के मनोविज्ञान याकि दिमागी समस्या (डिप्रेशन, डर, भय, भक्ति, वैराग्य, पागलपन, मंद बुद्धि आदि-आदि) के मनोरोगों का मामला हुआ तो डॉक्टर को इसे समझने के लिए कई-कई बैठक सीटिंग, क्लिनिकल परीक्षण या बिजली के झ़टके जैसे एक्सट्रीम उपाय भी करने होते हैं।

तभी यह बात गांठ बांधी जाए कि ‘हम, भारत के लोग…’ का राष्ट्र-राज्य एक राष्ट्रीय मनोविज्ञान, शारीरिक-बौद्धिक जीव रूप समान है! इस राष्ट्र-राज्य का जीवन इतिहास, पूर्वजों के डीएनए, उनसे चले आ रहे धर्म-कर्म, उनका अर्थ, काम, मोक्ष का अनुभव और व्यवस्थाएं लिए हुए है। भारत नाम का शरीर इतिहास के अनुभवों, पहलुओं की चुनौतियों और उनसे बने सवाल को वैसे ही लिए हुए हैं, जैसे चीन, अमेरिका, पाकिस्तान के अनुभवों ने इनकी बुनावट, राजनीतिक संस्कृति और राष्ट्र जीवन बनाया हुआ हैं। ये तीन देश तीन सभ्यताओं के प्रतीक हैं तो इनके समतुल्य भारत राष्ट्र-राज्य हिंदू सभ्यता का झंडाबरदार है। इन चार सभ्यताओं का परस्पर व्यवहार चार सभ्यताओं के समूहजन्य शरीर का एक दूसरे के प्रति आचरण है, एक-दूसरे से कंपीटिशन है। चारों ने इतिहास में हुए अनुभव में सोचते, समझते हुए अपनी रीति-नीति बनाई हुई है। अपने इरादे सोचे हुए हैं।

इस मानव शास्त्र, राष्ट्र शास्त्र को जो समझे होता है वह जीवन की चुनौतियों, वक्त की चुनौतियों का बेखौफी से सामना करता है। इतिहासकार आर्नल्ड टॉयनबी ने दुनिया की विभिन्न सभ्यताओं के बनने, उनके उत्थान-पतन का जो अध्ययन बताया है उसका निचोड़ है कि शरीर के भीतर की जर्जरता, मनोदशा (भय, डर, मुगालता, भक्ति, मूर्खता, अहंकार, बड़बोलापन, कठमुल्लापन आदि) देश, कौम, सभ्यता को खत्म करती है। देश और सभ्यता का टिकाऊपन उसकी जीवटता, उसकी जिंदादिली और प्रगतिशीलता पर निर्भर होता है। भीड़, सेना, टीमटाम, पांच ट्रिलियन की इकोनॉमी जैसे शब्दों याकि शक्ति-समृद्धि की बातों से वह मजबूती कतई नहीं बनती जो बाहरी और अंदरूनी चुनौतियों से निपटने के लिए हौसला बनवाने वाली होती है।

यह बात शरीर जीवन पर लागू है और राष्ट्र जीवन पर भी लागू है। शरीर में जीव कोष जर्जर, बिखरे हुए, फफोलों-गांठों वाले हैं और ऊपर के दिखावे में अमीरी, ठाठ-बाट, ग्लैमर-फोटो शूट के दस तरह के लटके-झटके भले हों लेकिन जब वक्त आया तो शरीर सीधे आईसीयू में भर्ती याकि खानाबदोश दुस्साहसी हजार घुड़सवार खैबर पार से दिल्ली आए नहीं कि पूरा हिंदुस्तान गुलाम!
इस बात को जरा सन 672 में मोहम्मद बिन कासिम के हमले से लेकर 1947 के बारह सौ साल के भारत इतिहास पर तौलें! मैं यहां ईसा पूर्व सन 320 के सिकंदर के हमले में नहीं जा रहा हूं, अन्यथा 23 सौ सालों के हूण, कुश, यूनानियों सबके आने और उनकी चुनौती के आगे हम लोगों का भरभरा कर ढहना विचारेंगे तो समझ ही नहीं पड़ेगा कि हम क्या है! लगेगा सभ्यता नहीं, बल्कि हम लोग, हमारा हिंदुस्तान तो सभ्यताओं का चरागाह है, जिसमें खानबादोश आते थे और तूफान की रफ्तार से हिंदू राजाओं के झंडों को उड़ा देते थे।

क्यों? मोटी बात हम बेखबर और वे खबरदार। हम झूठ में जीने वाले और वे सत्य में जीने वाले। यूनान का राजा खबर रखता था कि भारत विशाल है लेकिन खोखला है। चीन-मंगोलिया से चला चंगेज खान और उसके घुड़सवार जानते थे कि भारत लूटने लायक है। पश्चिम और मध्य एशिया के हमलावर जानते थे कि हिंदुस्तान मतलब बेसुधी, मुगालतों के हाइबरनेशन में सोया हुआ वह देश, जहां जीने का मोल जैसे-तैसे जीना है। जहां जीवन दर्शन कछुआई है। ऐसे ही जब सात समंदर पार से अंग्रेज गोरे व्यापारियों ने भारत और जहांगीर के दरबार को जाना कि कितना आसान है इस सभ्यता को गुलाम बना सकना तो वे आए और पलक झपते हम महारानी के गुलाम हो गए!
लब्बोलुआब हमारा अपने अंधविश्वास, अपनी खामोख्याली में जीना है। तभी हमने दूसरों को, दूसरे देशों को नहीं जाना, उन्हें नहीं समझा और हम याकि दक्षिण एशिया का होमो सेपियन अपनी ही गुफा, अपने ही कुएं का आदी हो गया। बरगद बन गया, कछुआ बन गया, अयोद्धा हो गया। परंपरा, सुरक्षा, और स्थायित्व में वह होमो सेपियंस की बुनियादी शिकारी तासीर को ही खो बैठा। और ऐसा होना गजब है।

पर उस पर बाद में। मसला फैल रहा है। आज के शुरूआती बिंदु पर लौटें। हम, भारत के लोग… हम, चीन के लोग…. हम अमेरिका के लोग, हम पाकिस्तान के लोग…की प्रस्तावना में शब्दों की एकरूपता के बावजूद हर कौम की अलग-अलग इच्छाएं, प्रेरणाएं, चुनौतियां हैं। सबकी अलग-अलग इतिहासजन्य, भावनाजन्य, बुद्धिजन्य प्रोग्रामिंग, कोडिंग हुई पड़ी है। देशों को समझना मतलब उनकी बुनावट व कोडिग को समझना है। हम भारत के लोग… हम, चीन के लोग…. हम अमेरिका के लोग, हम पाकिस्तान के लोग…. ये सब कोई मशीन रोबोट नहीं हैं, जिनमें मानवशास्त्र ने एक जैसी प्रोग्रामिंग बूझ कर यह कहा हुआ हो कि सभी एक जैसे हैं! नहीं, कतई नहीं। यह संभव भी नहीं है। यदि ऐसा होता तो इंसान अभी भी भेड़-बकरी-जानवर और चिंपांजी की अवस्था में जी रहा होता। न तो होमो सेपियंस, आदि मानव इथियोपिया की गुफा, जंगल से निकला हुआ होता और न आज की दुनिया, पृथ्वी बनी हुई होती! तो अगला सवाल है कि वह क्या प्रक्रिया थी, जिसने आदि मानव के उद्यम में अलग-अलग सभ्यताएं बनी। एक प्रोग्रामिंग नहीं बल्कि अलग-अलग प्रोग्रामिंग में अलग-अलग सभ्यताएं बनी।!(जारी)

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