विधानसभा चुनाव के समय प्रदेश की chief minister mamata banerjee
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“खेला होबे” और सत्य

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विधानसभा चुनाव के समय प्रदेश की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ( chief minister mamata banerjee ) ने “लोकतंत्र बचाने” के नाम पर “खेला होबे” का नारा दिया था। क्या इस नारे का वास्तविक तात्पर्य चुनाव- परिणाम के बाद विरोधियों को सबक सिखाने से था? 2 मई के बाद से बंगाल में जो कुछ हो रहा है- क्या उसका संकेत मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा नंदीग्राम में 29 मार्च 2021 को दिए उस वक्तव्य में छिपा है, जिसमें उन्होंने कहा था, “…आने वाले दिनों में हम ही रहेंगे, तो देख लेंगे…।”

पश्चिम बंगाल में चुनाव बाद हिंसा का रूप बीभत्स है। यह कलकत्ता उच्च न्यायालय की टिप्पणी से पुन: स्पष्ट हो गया है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) द्वारा सौंपी गई प्रारंभिक रिपोर्ट पर अदालत ने 2 जुलाई को सख्त टिप्पणी करते हुए कहा, “प्रथम दृष्टया स्थापित होता है कि प.बंगाल में चुनाव के बाद हिंसा हुई थी, जबकि राज्य सरकार इससे इनकार करती रही। हिंसा में कई लोग मारे गए। कई लोगों को यौन हिंसा और गंभीर चोटों का सामना करना पड़ा।

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यहां तक कि नाबालिग बच्चियों को भी नहीं बख्शा गया, उनका भी क्रूरता से यौन शोषण किया गया है। संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया। लोगों को पड़ोसी राज्यों में पलायन हेतु मजबूर होना पड़ा।” विधानसभा चुनाव के समय प्रदेश की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने “लोकतंत्र बचाने” के नाम पर “खेला होबे” का नारा दिया था। क्या इस नारे का वास्तविक तात्पर्य चुनाव- परिणाम के बाद विरोधियों को सबक सिखाने से था? 2 मई के बाद से बंगाल में जो कुछ हो रहा है- क्या उसका संकेत मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा नंदीग्राम में 29 मार्च 2021 को दिए उस वक्तव्य में छिपा है, जिसमें उन्होंने कहा था, “…आने वाले दिनों में हम ही रहेंगे, तो देख लेंगे…।”

प.बंगाल की स्थिति कितनी गंभीर है, यह जांच में विघन डालने से स्पष्ट है। जब अदालती निर्देश पर एनएचआरसी का एक दल 29 जून को जादवपुर पहुंचा था, तब उनपर हमले का प्रयास हुआ। यहां दल को एक क्षेत्र में 40 से अधिक मकान क्षतिग्रस्त मिले हैं, जहां अब कोई नहीं रहता हैं। एक अंग्रेजी समाचार पत्र में प्रकाशित खबर के अनुसार, एनएचआरसी की प्रारंभिक रिपोर्ट में हिंसा में 41 निरपराधों की हत्या और 13 महिलाओं के बलात्कार का उल्लेख है। अदालत ने राज्य पुलिस को हिंसा के सभी मामलों को दर्ज करने का निर्देश दिया है।

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बकौल जांचदल सदस्य और एनएचआरसी उपाध्यक्ष आतिफ रशीद, प्रदेश में जितनी हिंसा हुई है, उसके सर्वाधिक शिकार दलित हैं। विडंबना है कि इसपर वह संगठन-दल चुप है, जो अक्सर संविधान निर्माता डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर के नाम पर अपने राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति करने में व्यस्त रहते है। क्या ऐसे संगठनों-दलों की इन दलितों से इसलिए सहानुभूति नहीं है, क्योंकि उन्होंने लोकतंत्र में अपने मताधिकार का प्रयोग करते हुए भाजपा को वोट दिया था?

बात केवल एनएचआरसी तक सीमित नहीं है। सिक्किम के पूर्व मुख्य न्यायाधीश प्रमोद कोहली के नेतृत्व में पांच सदस्यीय फैक्ट फाइडिंग कमेटी ने प.बंगाल का दौरा करने के बाद अपनी रिपोर्ट केंद्रीय गृहराज्य मंत्री जी. किशन रेड्डी को सौंपी थी। उसके अनुसार, चुनाव के बाद सुनियोजित ढंग से रोहिंग्याओं और बांग्लादेशी घुसपैठियों की मदद से हिंसा को अंजाम दिया गया। उनकी रिपोर्ट में 15 हजार हिंसक घटनाओं में 25 मौत और लगभग 200 महिलाओं से बलात्कार का उल्लेख है।

बकौल फैक्ट फाइडिंग कमेटी रिपोर्ट, हिंसा के कारण लोग अपने घरों को छोड़कर असम, ओडिशा और झारखंड में रहने को मजबूर है। पलायन कर चुके लोगों को उनके घर पर वापस नहीं आने दिया जा रहा है। इससे कई जिलों में एक मजहब विशेष के लोगों की संख्या एकाएक अधिक हो गई है। इससे पहले बुद्धिजीवियों-शिक्षाविदों के अन्य एक संगठन ने भी अपनी ‘2021 में बंगाल में खेला’ नामक रिपोर्ट केंद्रीय गृह मंत्रालय को सौंपी थी।

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भले ही ममता सरकार प्रदेश में किसी भी “राजनीतिक हिंसा” से इनकार कर रही हो, किंतु उसके दावों की पोल राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की रिपोर्ट खोल देती है। उसके अनुसार, 10 जून तक हिंसा संबंधित 3,243 शिकायतों को पुलिस अधीक्षकों और थानों को भेजी गई थी। कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा निर्देशित एनएचआरसी की जांच रोकने के प्रयास हेतु दाखिल पुनर्विचार याचिका भी तृणमूल सरकार की बौखलाहट का प्रतीक है।

chief minister mamata banerjee : हिंसा को लेकर प्रदेश के राज्यपाल जगदीप धनखड़ कई अवसरों पर अपनी चिंता व्यक्त कर चुके है। उनके अनुसार, “यह हिंसा मानवता को शर्मसार कर रही है। राज्य पुलिस बर्बरता में शामिल लोगों को प्रोत्साहित कर रही है। ये सब लोकतंत्र में वोट देने की ‘हिम्मत’ करने वाले विरोधियों को ‘सजा’ और ‘अनुशासित’ करने के लिए किया जा रहा है।” प.बंगाल के राजनीतिक रक्तपात पर समाज का वह वर्ग (उदारवादी-प्रगतिशील सहित) भी चुप है, जो अक्सर भीड़ द्वारा किसी की हत्या पर “असहिष्णुता” का राग अलापते देखे जाते है- अखलाक-जुनैद हत्याकांड इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। संभवत: यह कुनबा बंगाल की राजनीतिक हिंसा पर इसलिए मौन है, क्योंकि उनके नैरेटिव में शायद भाजपा-राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) समर्थक पर हमला, उनकी हत्या या उनसे दुष्कर्म- लोकतंत्र को “सुरक्षित-मजबूत” करता है।

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आखिर प.बंगाल का राजनीतिक चरित्र- हिंसा और वैचारिक असहिष्णुता से क्यों भरा हुआ है? स्वतंत्र भारत में चुनाव के समय बहुत थोड़ी मात्रा में हिंसा की खबरें आती रही है। किंतु प.बंगाल के साथ केरल का इतिहास चुनाव और सामान्य दिनों में “राजनीतिक रक्तपात”, “दूसरे विचार के प्रति असहिष्णु” और “विरोधियों को शत्रु मानने” संबंधित चिंतन के कारण सर्वाधिक दागदार है। इस विकृति की जड़ें वामपंथी दर्शन में मिलती है, जो वर्षों पहले इन दोनों राज्यों के जीवन में इतना भीतर तक रिस चुका है कि शेष भारत की भांति यहां “राजनीतिक संवाद” के बजाय विरोधी की हत्या “पसंदीदा उपक्रम” बन गया है।

मार्क्सवादी राजनीति के केंद्रबिंदु में हिंसा है। दशकों पहले वामपंथियों ने योजनाबद्ध तरीके से केरल-प.बंगाल में स्थानीय गुंडो और अराजक तत्वों को संरक्षण दिया और फिर उन्हीं के माध्यम से दोनों प्रदेश में आरएसएस, भाजपा सहित अन्य राष्ट्रवादी संगठनों और उसके कार्यकर्ताओं को नियंत्रित या प्रताड़ित करना प्रारंभ कर दिया। तब से लेकर केरल और प.बंगाल में राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ हिंसक गतिविधियों को बढ़ावा मिल रहा है। राजनीतिक हिंसा की भयावहता का अनुमान इस बात से लगा सकते है कि प.बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने स्वीकार किया था कि 1977-96 के बीच 28 हजार से अधिक राजनीतिक हत्याएं हुई थी। सच तो यह है कि अधिकांश विरोधियों की हत्या विचारधारा के नाम पर हुई है, जो प.बंगाल में वामपंथियों के हाशिए पर चले जाने के बाद भी जारी है।

वामपंथियों की 34 वर्षीय वैचारिक-राजनीतिक असहिष्णुता से छुटकारा पाने हेतु प.बंगाल की जनता वर्ष 2011 से लगातार तृणमूल कांग्रेस पर विश्वास कर रही है। प्रारंभ में लोगों को प.बंगाल की स्थिति में परिवर्तन की आशा थी कि वामपंथियों से मुक्ति के बाद प्रदेश में गुंडों के बजाय कानून-लोकतंत्र का शासन होगा, परंतु 10 वर्षों में यह स्थिति पहले अधिक रक्तरंजित और हिंदू विरोधी हो गई। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि वामपंथी शासन में जो आपराधिक मानसिकता से ग्रस्त लोग मार्क्सवादी केंचुली पहनकर घूमा करते थे, वे रातोंरात तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता और स्थानीय नेता बन गए और उन्होंने विरोधियों को मौत के घाट उतारना जारी रखा। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार, वर्ष 2015 में प.बंगाल में राजनीतिक कारणों से 184 लोगों की हत्या हुई थी, वह 2016 में बढ़कर 205 हो गई। आरोप है कि चुनाव से पहले भी प्रदेश में 100 से अधिक भाजपा/आरएसएस समर्थकों की हत्या हो चुकी है। मुझे कोई संदेह नहीं कि यदि इस बार भाजपा प.बंगाल में सत्तासीन होती, तो वह काडर भाजपा का झंडा थामकर पार्टी के सनातनी-राष्ट्रवादी चरित्र के प्रतिकूल और वामपंथ जनित हिंसक-असहिष्णु आचरण के अनुकूल ही बर्ताव करता।

यदि कुछ अपवादों को छोड़कर भारत के राजनीतिक और सार्वजनिक जीवन में बहुलतावाद अनादिकाल से जीवंत और अक्षुण्ण है, तो इसका श्रेय इस भूखंड के हिंदू चरित्र और सनातन चिंतन, जिसे हम “हिंदुत्व” नाम से भी परिभाषित करते है- उसे जाता है। 1947 में देश का विभाजन इस्लाम के आधार पर हुआ था। कोई आश्चर्य नहीं कि तब पाकिस्तान ने स्वयं को इस्लामी राष्ट्र घोषित कर लिया, तो हिंदू बहुल शेष भारत ने अपनी मूल परंपरा के अनुसार, संविधान में पंथनिरपेक्ष व्यवस्था को अंगीकार किया। स्पष्ट है कि जहां-जहां हिंदू परंपराओं-मूल्यों का ह्रास हुआ, वहां बहुलतावाद-लोकतंत्र या तो सिकुड़ गया या फिर समाप्त हो गया। पाकिस्तान और कश्मीर- इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। इस दिशा में अब प.बंगाल को धकेला जा रहा है। chief minister mamata banerjee

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