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Wednesday, May 12, 2021
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कहां गलत हुई भाजपा की रणनीति?

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अजीत द्विवेदीhttp://www.nayaindia.com
पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजों के बाद सोशल मीडिया में एक मजाक की खूब चर्चा है कि तृणमूल कांग्रेस राज्य की सभी 292 सीटों पर चुनाव जीत गई, 214 सीटों पर उसके उम्मीदवार दो पत्तियों के निशान पर जीते और बाकी कमल के फूल के निशान पर। यह बात भले मजाक में कही जा रही है पर यह भाजपा की सबसे बड़ी रणनीतिक भूल को दिखाती है। असल में भाजपा ने  पश्चिम बंगाल में सबसे बड़ी रणनीतिक गलती यही की थी कि तृणमूल कांग्रेस के लोगों के सहारे ही ममता बनर्जी को चुनौती दी थी।  तृणमूल कांग्रेस के पुराने लोग भाजपा की रणनीति भी बना रहे थे और चुनाव भी लड़ रहे थे। भाजपा के नेताओं के जिम्मे सिर्फ प्रचार का काम था। प्रधानमंत्री से लेकर केंद्रीय गृह मंत्री और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष से लेकर राज्यों के मुख्यमंत्री तक सब प्रचार में लगे थे और जमीन पर तृणमूल कांग्रेस, कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियों से आए नेता चुनाव लड़ रहे थे।

सो, पहली रणनीतिक गलती यह थी कि दूसरी पार्टियों से आए नेताओं के सहारे भाजपा चुनाव लड़ने उतरी। दूसरे राज्यों में भी भाजपा विपक्षी पार्टियों को तोड़ कर उनके नेताओं को भाजपा में शामिल कराती रही है पर उसका एक निश्चित अनुपात होता है। दाल में नमक के बराबर बाहर का नेता चल सकता है, आप पूरी दाल बाहर के नेताओं से नहीं बना सकते हैं। भाजपा ने मुकुल रॉय परिवार, शुभेंदु अधिकारी परिवार, अर्जुन सिंह परिवार आदि के सहारे पश्चिम बंगाल में ममता को मात देने का प्रयास किया था। इस रणनीति का फेल होना पहले दिन ही तय था क्योंकि पहले दिन से भाजपा के अपने लोगों ने खास कर जिला और प्रखंड स्तर के कार्यकर्ताओं ने इनका विरोध शुरू कर दिया क्योंकि वे दशकों से इन्हीं लोगों के खिलाफ लड़ते रहे थे। दूसरे, तृणमूल कांग्रेस से कई-कई बार विधायक रहे नेताओं के खिलाफ जमीनी स्तर पर मजबूत एंटी इन्कंबैंसी थी, जो चुनाव चिन्ह बदल देने से खत्म नहीं होने वाली थी।

दूसरी रणनीतिक गलती चुनाव प्रचार में जरूरत से ज्यादा बाहरी नेताओं का चेहरा दिखाना था। भाजपा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, भाजपा के प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय और केंद्र सरकार के दर्जनों मंत्रियों के जरिए प्रचार किया। इस एक रणनीतिक भूल के दो पहलू हैं। सबसे पहले तो भाजपा को समझना चाहिए था कि मोदी, शाह और योगी का चेहरा हर राज्य में चुनाव जिताने में सक्षम नहीं है। कई राज्यों में इसकी परीक्षा हो चुकी है। चूंकि इन चेहरों का ओवर एक्सपोजर हो चुका है इसलिए ये नेता एक किस्म का अलगाव या दूरी पैदा करते हैं- आम मतदाताओं में भी। दूसरा पहलू यह है कि पश्चिम बंगाल अपनी भाषा और अस्मिता को लेकर बहुत सजग राज्य है। यह हिंदी पट्टी के दूसरे राज्यों की तरह नहीं है, जहां उप राष्ट्रीयता कोई मुद्दा नहीं है। बंगाल में उप राष्ट्रीयता की मजबूत धारणा है। वहां के लोग बंगाली पहले हैं और भारतीय उसके बाद। ऐसे राज्य में सिर्फ बाहरी नेता, चाहे वह कितना भी लोकप्रिय क्यों न हो, उसका प्रचार करना, कोई समझदारी का काम नहीं था।

नरेंद्र मोदी, अमित शाह और योगी आदित्यनाथ के प्रचार के सहारे भाजपा का प्रयास ध्रुवीकरण सुनिश्चित करना था। हो सकता है कि इसमें उसे कुछ सफलता मिली हो पर भाजपा के नेता यह भूल गए कि ये चेहरे सिर्फ कट्टर हिंदुत्व के प्रतीक चेहरे ही नहीं हैं, बल्कि एक विफल प्रशासन के प्रतीक चेहरे भी हैं, खास कर कोरोना वायरस के प्रबंधन में विफलता का प्रतीक हैं। देश में कोरोना वायरस का संक्रमण भयावह होता जा रहा है तो उसका कारण केंद्र सरकार की अदूरदर्शिता और उसकी विफलता है। उत्तर प्रदेश में आज अगर अराजकता के हालात हैं तो उसका प्रतीक चेहरा योगी आदित्यनाथ हैं। भाजपा शायद यह भूल गई कि कोई भी चुनाव सिर्फ भावनात्मक मुद्दों पर नहीं लड़ा जाता है। हर चुनाव किसी न किसी मात्रा में गवर्नेंस के मुद्दे पर भी लड़ा जाता है। इस लिहाज से भी भाजपा की ओवर एक्सपोज्ड चेहरों के प्रचार के दम पर लड़ने की रणनीति विफल हुई।

तीसरी रणनीतिक गलती यह हुई कि भाजपा ने ममता बनर्जी के मुकाबले कोई चेहरा पेश नहीं किया। भाजपा के नेता शुरू में तो इस प्रयास में लगे रहे कि किसी तरह से सौरव गांगुली पार्टी में शामिल हो जाएं तो उनको मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित कर दिया जाए। लेकिन जब इसमें कामयाबी नहीं मिली तो भाजपा ने बिना चेहरे के लड़ने का फैसला किया। इसके पीछे भाजपा की यह भी सोच थी कि वह दिलीप घोष और मुकुल रॉय से लेकर स्वप्न दासगुप्ता और शुभेंदु अधिकारी जैसे अनेक नेताओं को अलग अलग क्षेत्रों में मुख्यमंत्री पद का दावेदार बता सकती थी। यह इतनी बचकानी रणनीति थी कि इसे सहज रूप से आम मतदाता समझ गया।

चौथी रणनीतिक गलती आमने-सामने का चुनाव बनवाने की हुई। भाजपा ने यह गलती दिल्ली में की थी इसलिए इसे दोहराया नहीं जाना चाहिए था। दिल्ली में दिसंबर 2013 के चुनाव में कांग्रेस एक ताकत थी तो अरविंद केजरीवाल की तमाम लोकप्रियता के बावजूद भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। लेकिन नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद 2015 के चुनाव में समूचा फोकस केजरीवाल के ऊपर बना दिया तो आमने-सामने के चुनाव में केजरीवाल की पार्टी 70 में से 67 सीट जीत गई। पांच साल बाद 2020 के चुनाव में भी यही हुआ। इसी गलती को भाजपा ने बंगाल में दोहराया। उसने कांग्रेस, लेफ्ट और आईएसएफ के गठबंधन की आलोचना करने तक की जरूरत नहीं समझी। पूरा फोकस सिर्फ ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के ऊपर रहा। इसलिए अल्पसंख्यक वोट में कोई कंफ्यूजन नहीं रह गया कि भाजपा को हराने के लिए किसको वोट करना है। इस आमने-सामने की लड़ाई का नतीजा है कि कांग्रेस, लेफ्ट और आईएसएफ का मोर्चा पूरी तरह से फेल हुआ। उसे 10 फीसदी वोट भी नहीं मिल पाए।

पांचवीं रणनीतिक गलती ममता बनर्जी के ऊपर निजी हमले की थी। पता नहीं क्यों मोदी और शाह ने चुनाव को इतना पर्सनलाइज्ड किया! उन्होंने या तो अपने ऊपर फोकस रखा या ममता बनर्जी के ऊपर। इसे मुद्दों या जमीनी हकीकतों की बजाय व्यक्तित्व के टकराव का मुद्दा बना दिया। इस रणनीतिक गलती के भी दो पहलू हैं। पहला तो यह कि ममता बनर्जी महिला हैं। देश की इकलौती महिला मुख्यमंत्री हैं और उनकी पार्टी ने उनको बंगाल की बेटी बना कर चुनाव प्रचार किया था। सो, ममता को मौका मिल गया कि वे बंगाल की बेटी बनाम दो गुजराती का मुद्दा बना सकें। इससे ममता को अस्मिता की राजनीति चमकाने का मौका मिला। दूसरा पहलू यह है कि वे प्रचार शुरू होने के साथ ही व्हील चेयर पर बैठ गई थीं। सो, चोटिल महिला पर देश के प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के निजी हमले से उनको विक्टिम कार्ड खेलने में आसानी हुई। इससे आम मतदाताओं की सहानुभूति तो उनके प्रति बढ़ी ही, महिलाओं के मन में यह बात बैठ गई कि एक महिला को निशाना बनाया जा रहा है। सो, थ्री एम यानी ममता, महिला और मुस्लिम का फैक्टर अहम हो गया।

छठी रणनीतिक गलती परिवार को निशाना बनाने की थी। ऐन चुनाव के बीच ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी की पत्नी को सीबीआई की नोटिस ने बड़ा असर किया। ममता ने इस मौके को लपका, वे अभिषेक के घर गईं और सीबीआई के आने से पहले उनकी छोटी सी बेटी को लेकर वहां से निकलीं। छोटी सी बच्ची को घर से लेकर निकलने की तस्वीर और वीडियो ने बंगाल के मध्य वर्ग और आम लोगों के बीच जादू सा असर किया। यह मैसेज गया कि मोदी और शाह सीबीआई, ईडी और आय कर विभाग के जरिए ममता के परिवार को परेशान कर रहे हैं। बहरहाल, इनके अलावा भी कई रणनीतिक गलतियां हैं- आठ चरण में चुनाव कराना, कोरोना वायरस के संक्रमण के बीच बड़ी बड़ी रैलियां करना, अपनी प्रतिबद्ध मीडिया से उन रैलियों की कवरेज कराना, चुनाव आयोग का एकतरफा फैसले करना आदि। लेकिन बुनियादी रूप से छह बड़ी रणनीतिक गलतियां थीं, जिसने भाजपा की उम्मीदों पर पानी फेर दिया।

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