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Wednesday, May 12, 2021
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मोदी की टक्कर में अब ममता

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वेद प्रताप वैदिकhttp://www.nayaindia.com
हिंदी के सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले पत्रकार। हिंदी के लिए आंदोलन करने और अंग्रेजी के मठों और गढ़ों में उसे उसका सम्मान दिलाने, स्थापित करने वाले वाले अग्रणी पत्रकार। लेखन और अनुभव इतना व्यापक कि विचार की हिंदी पत्रकारिता के पर्याय बन गए। कन्नड़ भाषी एचडी देवगौड़ा प्रधानमंत्री बने उन्हें भी हिंदी सिखाने की जिम्मेदारी डॉक्टर वैदिक ने निभाई। डॉक्टर वैदिक ने हिंदी को साहित्य, समाज और हिंदी पट्टी की राजनीति की भाषा से निकाल कर राजनय और कूटनीति की भाषा भी बनाई। ‘नई दुनिया’ इंदौर से पत्रकारिता की शुरुआत और फिर दिल्ली में ‘नवभारत टाइम्स’ से लेकर ‘भाषा’ के संपादक तक का बेमिसाल सफर।

पांच अहिंदीभाषी राज्यों में हुए ये चुनाव थे तो प्रांतीय लेकिन इन्हें राष्ट्रीय स्वरुप देने का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को है। भाजपा के जितने नेता अकेले पश्चिम बंगाल में डटे रहे, आज तक किसी भी प्रांतीय चुनाव में राष्ट्रीय स्तर के इतने नेता कभी नहीं डटे। इसलिए अब इसके नतीजों का असर भी राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ना अवश्यम्भावी है। ममता बेनर्जी अब नरेंद्र मोदी के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाएंगी। अभी तक मोदी की टक्कर का एक भी नेता विपक्ष में उभर नहीं पाया था। दो पार्टियां अखिल भारतीय हैं। एक कांग्रेस और दूसरी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी। कम्युनिस्ट पार्टी सिर्फ केरल में है। वह मलयाली उपराष्ट्रवाद का ज्यादा, मार्क्सवाद का कम प्रतिनिधित्व करती है। वह मोदी को कोई चुनौती नहीं दे सकती। हाँ, कांग्रेस जरुर एक अखिल भारतीय पार्टी है और इन पांच राज्यों के चुनाव में बंगाल के अलावा सर्वत्र वह अस्तित्ववान है लेकिन उसके पास प्रांतीय नेता तो हैं लेकिन उसके पास ऐसे अखिल भारतीय नेता का अभाव है, जो मोदी को चुनौती दे सके। कांग्रेस में अनेक अत्यंत अनुभवी और दक्ष नेता हैं, जो मोदी पर भारी पड़ सकते हैं लेकिन कांग्रेस का माँ-बेटा नेतृत्व उन्हें आगे नहीं आने देगा।

आज भी देश के लगभग हर जिले में कांग्रेस का संगठन है लेकिन उसकी हैसियत अब प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की एक शाखा से ज्यादा नहीं है। ऐसी हालत में प. बंगाल के चुनाव ने ममता बेनर्जी को लाकर मोदी की टक्कर में खड़ा कर दिया है। ममता के समर्थन में कांग्रेस और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता सामने नहीं आए और उन्होंने तृणमूल कांग्रेस के विरोध में अपने उम्मीदवार भी खड़े किए थे लेकिन देश की लगभग सभी प्रांतीय पार्टियों के नेता ममता को जिताने के लिए बंगाल गए थे। हालांकि ममता नंदीग्राम में खुद हार गई हैं लेकिन पूरे बंगाल में वे विजय पताका फहरा रही हैं। अब ममता को अखिल भारतीय नेता मानने में उन्हें ज्यादा दिक्कत नहीं होगी। हो सकता है कि कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियां भी इस उदीयमान गठबंधन में शामिल हो जाएं। फिर भी हो सकता है कि इस गठबंधन को किसी जयप्रकाश नारायण की जरुरत हो, हालांकि नरेंद्र मोदी की हैसियत इंदिरा गांधी-जैसी नहीं है लेकिन यह भी सत्य है कि आज नरेंद्र मोदी की हालत वैसी भी नहीं हुई है, जैसी कि 1977 में इंदिरा गांधी की हो गई थी। कोरोना की बदहाली ने केंद्र सरकार के प्रति व्यापक असंतोष जरुर पैदा कर दिया है लेकिन देश की जनता मोदी के मुकाबले ममता को स्वीकार तभी करेगी, जबकि ममता बंगाली उपराष्ट्रवाद से ऊपर उठेंगी और वे देश के अन्य खुर्राट नेताओं के साथ ताल-मेल बिठाने की कला में प्रवीणता हासिल कर लेंगी।

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