बड़ी जीत के बावजूद - Naya India
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बड़ी जीत के बावजूद

पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजे को भारतीय जनता पार्टी के लिए एक झटका समझा जाएगा, तो सिर्फ इसलिए कि पार्टी ने जितनी ताकत झोंकी थी और अपनी प्रतिष्ठा जिस रूप में वहां दांव पर लगा दी थी, नतीजा उसके मुताबिक नहीं रहा। बल्कि उसने जो ध्रुवीकरण किया, उसका लाभ तृणमूल कांग्रेस को मिला। तमाम भाजपा विरोधी वोट उसके खेमे में चले गए और उसने लगातार तीसरी बार बड़ी जीत दर्ज कर ली। इस बार की जीत इसलिए और ज्यादा बड़ी लगती है, क्योंकि मुकाबले का धरातल समान नहीं था। यहां बात सिर्फ निर्वाचन आयोग की भाजपा समर्थक भूमिका की नहीं है। बल्कि पैसा और प्रचार के मामले में भी ममता बनर्जी का नरेंद्र मोदी- अमित शाह की जोड़ी से कोई मुकाबला नहीं है। हार- जीत से अलग होकर देखें तो भाजपा का प्रदर्शन बुरा नहीं है। उसने यहां भी दिखाया कि देश के ज्यादातर हिस्सों की तरह पश्चिम बंगाल में एक तिहाई से ज्यादा मतदाता उसके पक्ष में गोलबंद है।

दूसरी बात यह कि पिछले लोक सभा चुनाव की तुलना में महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली और बिहार में भाजपा गठबंधन के वोटों में जितनी गिरावट आई थी, उतनी पश्चिम बंगाल में नहीं आई। तो लिहाज से कहा जा सकता है कि मौजूदा महामारी और पिछले साल की आर्थिक तबाही के नतीजों से अपने समर्थक मतदाताओं के मूड को अलग रखने में वह कामयाब रही है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि भाजपा- आरएसएस की सांप्रदायिक गोलबंदी अभी भी टूटती नहीं दिखती। ये बात तब है, जब ममता बनर्जी के रूप में सामने साकार विकल्प था। अगर और भी बड़े परिदृश्य को सामने रखें, तो समझा यह जाएगा कि भाजपा-आरएसएस ने जो वैचारिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण किया है, उसका जवाबी ध्रुवीकरण चूंकि पश्चिम बंगाल में अधिक मजबूत साबित हुआ, इसलिए ममता बनर्जी की वापसी हो गई। इसमें बड़े पैमाने पर अल्पसंख्यक वोटों की मौजूदगी एक बड़ा पहलू है। दरअसल, इस जवाबी ध्रुवीकरण के कारण ही ममता बनर्जी के दस साल के शासनकाल की तमाम नाकामियां- यानी कहें कि एंटी इन्कबेंसी का फैक्टर बेमतलब हो गया। इसका खामियाजा कांग्रेस और लेफ्ट फ्रंट के गठबंधन को भुगतना पड़ा। दो दलों के बीच पूरे ध्रुवीकरण का अक्सर ऐसा ही नतीजा होता है। लेकिन ऐसी गोलबंदी से कोई नई सियासत नहीं निकलती। रेखांकित करने की बात यह है कि इस नतीजे के बावजूद देश उसी विमर्श में फंसा रहेगा, जिसकी वजह से ऐसी गोलबंदी मजबूत होती गई है।

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