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हिंसा का कौन दोषी?

ये बात बार-बार उचित ही दोहराई जाती है कि लोकतंत्र में हिंसा का कोई स्थान नहीं है। दरअसल, किसी सामाजिक या राजनीतिक व्यवस्था में हिंसा के लिए जगह नहीं होनी चाहिए। मतभेद कितने सद्भावपूर्ण ढंग से निपटाए जाते हैं, दरअसल, यही किसी समाज की सभ्यता को मापने की कसौटी होनी चाहिए। बहरहाल, यह आदर्श स्थिति है। भारत में चुनावी हिंसा अक्सर होती है। इसे नहीं होना चाहिए। लेकिन यह तभी संभव है, जब सभी संबंधित पक्ष अपनी जिम्मेदारी निभाएं। इस सिलसिले में जो दल जितना बड़ा है, और जिसे जनता ने जितनी बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है, उचित ही है कि उससे उतनी अधिक अपेक्षा रखी जाएगी। जाहिर है, आज की तारीख में यह दायित्व सबसे ज्यादा भारतीय जनता पार्टी को उठाना चाहिए। लेकिन पार्टी का हिंसा के प्रति क्या नजरिया है? फिलहाल, दो राज्यों में हुई चुनावी हिंसा चर्चा में है। पश्चिम बंगाल में विधान सभा चुनाव और उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव के बाद हिंसा की अनेक घटनाएं हुईं। लेकिन पश्चिम बंगाल के बारे में जितना सुना गया, उतना उप्र के बारे में नहीं सुना गया। कारण साफ है।

भाजपा और उसके समर्थक मीडिया ने जहां शोर मचाया, उसे लोगों ने ज्यादा सुना। लेकिन अगर मानदंड ऐसे दोहरे हों, तो फिर शोर की साख खत्म हो जाती है। या शोर ध्रुवीकरण का विषय बन जाता है। धुरी के दोनों ओर मौजूद लोग अपनी कहानियां सुनते और अपने ढंग से दोषी तय करते हैँ। यही इस मामले में भी हुआ है। भाजपा अगर पश्चिम बंगाल के बारे में झूठे प्रचार नहीं करती और देश की सत्ताधारी पार्टी के रूप में दोनों राज्यों के प्रति समान नजरिया अपनाती, तो वह इस बारे में आम सहमति बना सकती थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। एक मिसाल पर गौर करेँ। भाजपा की ओर से इंडिया समूह के एक पत्रकार अभ्रो बनर्जी की तस्वीर के साथ सोशल मीडिया पर डाली गई एक पोस्ट में उसे कूचबिहार जिले के शीतलकुची में हिंसा में मृत मानिक मैत्र बताया गया। उस पत्रकार ने जब इसे फर्जी बताते हुए अपने जिंदा होने का दावा किया तो उस पोस्ट को डिलीट कर दिया गया। इस तरह की कई मिसालेँ हैँ। तो ये सवाल उठना लाजिमी था कि पश्चिम बंगाल में वास्तव में क्या हो रहा है और इसके पीछे किसके अदृश्य हाथ हैं? जाहिर है, ये बातें स्पष्ट होनी चाहिए थी। दुर्भाग्य से ऐसा होने की कोई उम्मीद नहीं है।

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