कोरोना से पश्चिम परेशान

आमतौर पर चीन के प्रति कड़ा और आलोचनात्मक रुख रखने वाले पश्चिमी मीडिया में इन दिनों हिचक के साथ ही, लेकिन यह स्वीकार किया जा रहा है कि कोरोना महामारी और उसके आर्थिक प्रभाव से निपटने में चीन अपने को पश्चिमी देशों से बेहतर साबित किया है। मसलन, सीएनएन की एक रिपोर्ट में कहा गया कि चीन ने यह दिखाया कि ऐसे हालात में लॉकडाउन महज पहला कदम है। उसके साथ अगर दूसरे जरूरी कदम नहीं उठाए गए, तो पहला कदम बेअसर हो जाएगा। चीन ने बीमारी को नियंत्रित करने और उसके आर्थिक प्रभावों को सीमित रखने के बेहतरीन कदम उठाए। जबकि इसमें यूरोपीय देश और अमेरिका नाकाम रहे। नतीजा है कि चीन अब तेजी से आगे बढ़ रहा है, जबकि पश्चिमी देश अब भी महामारी को झेल रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का भी कहना है कि इस साल वृद्धि दर्ज करने वाली अर्थव्यवस्थाओं में चीन अकेला प्रमुख देश हो सकता है। यानी बाकी सभी देशों की अर्थव्यवस्थाएं सिकुड़ेंगी।

इस वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही में चीन की विकास दर 4.9 फीसदी रही, जबकि इससे पहले की तिमाही में यह 3.2 फीसदी थी। कुल मिला कर अब चीन महामारी से पहले वाले स्तर पर पहुंच गया है। चीन के खुदरा व्यापार में पूर्वानुमानों से ज्यादा 3.3 फीसदी की वृद्धि हुई है। चीन के लोग दुकानों और रेस्तरां में लौटने लगे हैं। सैलानियों ने भी सफर शुरू कर दिए हैं। सितंबर में औद्योगिक उत्पादन भी साल दर साल के हिसाब से 6.9 फीसदी बढ़ गया। चीन की सरकार ने वायरस से निपटने के उपायों, लाखों लोगों को प्रायोगिक वैक्सीन देने जैसे कदमों को इसका श्रेय दिया है। हालांकि अर्थव्यवस्था की मजबूती के बावजूद नौकरियों की कमी और वायरस के दोबारा उभार को लेकर देश में आशंकाएं बनी हुई हैं। फिर भी अर्थशास्त्रियों कहना है कि चीन ने कठोर लॉकडाउन, बड़ी संख्या में टेस्ट, आबादी की निगरानी और आर्थिक पैकेजों से अपने को कोरोना के दुष्प्रभावों से काफी हद तक बचा लिया है। सितंबर में चीन की शहरी बेरोजगारी की दर में 5.4 फीसदी की कमी आई है। इसी महीने साल में पहली बार अचल संपत्ति में निवेश पॉजिटिव हुआ है। इस बीच यूरोप में कोरोना संक्रमण का दूसरा दौर आ गया है, जबकि अमेरिका अभी पहले ही दौर से नहीं निकला है। जाहिर है, इन देशों में इन दिनों मायूसी का माहौल है।

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