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दुनिया का क्या है भारत नजरिया? विश्व में भारत पहचान क्या? क्या बन रही होगी भारत आइडेंटिटी?

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ये सवाल नरेंद्र मोदी और गौतम अदानी की वजह से आज प्रासंगिक है? भारत में जो हुआ है और जो होता हुआ है उस सबमें भारत को ले कर दुनिया क्या सोच रही होगी? वह जैसे सोचती आई है, वह सोच कुछ बदली होगी, सुधरी होगी या पहले की तरह जस का तस माना जा रहा होगा कि भारत तो ऐसा ही है? सचमुच बुद्धिधारी हर भारतीय को सोचना-बूझना चाहिए कि पृथ्वी पर 21वीं सदी के सन् 2023 में दुनिया के आईने में भारत क्या है? इसकी जरूरत दो कारणों से है। एक वजह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर बीबीसी की दो हिस्सों की डाक्यूमेंट्री और दूसरी वजह खरबपति गौतम अदानी को हिंडनबर्ग द्वारा कॉरपोरेट इतिहास का सबसे बड़ा ठग करार देना है। भारत में हम भले न मानें लेकिन बीबीसी और हिंडनबर्ग दोनों की दुनिया में साख है। इसलिए भारत के लोगों द्वारा इन दोनों को झूठा बताना-मानना दुनिया की निगाह में भारत का झूठा होना है!

सोचें, याद करें नरेंद्र मोदी और गौतम अदानी जब विश्व सुर्खियों में उभरे, वैश्विक सुर्खियों के सुपरस्टार हुए तो दुनिया ने दोनों को कितना सिर आंखों बैठाया था। भारत में नएपन, भारत के अच्छे-सच्चे-समझदार-पुरुषार्थी बनने के सपने दुनिया ने भी देखे।

लेकिन मोदी-अदानी की हमप्याला-हमनिवाला महत्वाकांक्षाओं के कोई नौ साला सफर के बाद अब दुनिया में भारत विचार क्या है? जरा कल्पना करें कि इस साल जी-20 ग्रुप की दिल्ली बैठक के लिए दुनिया के आला देशों के 20 राष्ट्राध्यक्ष जब भारत आएंगे तो उनके अफसर व खासकर विदेश मंत्रालय उन्हें कैसी भारत ब्रीफिंग देते हुए होंगे? वह ब्रीफिंग, जहां भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर होगी तो भारत की आर्थिकी के चेहरे गौतम अदानी पर भी होगी। विदेशी राष्ट्राध्यक्ष मोदी के प्रोफाईल में बीबीसी की फिल्म देख सकते हैं तो हिंडनबर्ग रिपोर्ट के बाद गौतम अदानी को बचाने की लीपापोती की ब्रीफिंग भी होगी। क्योंकि हर विदेशी को भारत यात्रा में सत्यता से भारत पर सोचना है और अपनी रीति-नीति बनानी है।

मतलब यह कि समसामयिक दुनिया यदि मोदी और अदानी के चेहरों की सुर्खियां लिए हुए है तो उन्हीं पर आने वाले महीनों में भारत के चरित्र, साख और भारतीयों की ईमानदारी, समझदारी, सत्यता की पड़ताल भी है। भारत को रियलिटी के आईने में समझना है।

यों मेरा मानना है कि विश्व में भारत की पहचान, भारत की आइडेंटिटी का मसला इतिहास के बहुत लंबे-चौड़े काल खंड से जुड़ा गंभीर मसला है। इसलिए नरेंद्र मोदी के राज में दुनिया ने भारत पर क्या राय बनाई इसका विशेष मतलब नहीं है। मोदी-अदानी भी विदेशियों की प्राचीन भारत धारणा को पुख्ता करते हुए होंगे। जरा सोचें, यूनानी सिकंदर महान, इस्लामी मीर कासिम, मुगल व नादिर शाह और अंग्रेज अपनी भारत समझ से जब भारत आए थे तो विदेशियों का वह रैला क्या हिंदुओं की बुनावट की हकीकत में नहीं था? उस नाते मेरा मानना है कि जी-20 की दिल्ली बैठक का मामला हो या जहांगीर के दरबार में अंग्रेज या सिंध के राजा पुरू के समय सिकंदर के राजदूतों का वक्त हो, यह सत्य स्थायी है कि भरतवंशियों की अपनी भारत समझ और विदेशियों की भारत समझ का दिन-रात का फर्क रहा है। इक्कीसवीं सदी भी अपवाद नहीं है।

इस सत्य को इक्कीसवीं सदी की रियलिटी में चीन के मौजूदा भारत नजरिए से समझें। मोटामोटी यह जाहिर होता हुआ है कि भारत को चीन सभ्यतागत राष्ट्र-राज्य मानता ही नहीं है। हिंदुओं को वह दुहने वाली गाय मानता है। इसलिए चीन का 75 साला व्यवहार भारत के प्रति हिकारत, भारत पर दादागिरी और भारत को आर्थिक तौर पर पराश्रित बनाकर लूटने का है। वह भारत को पैसिव, निष्क्रिय, जड़बुद्धि देश मानता है। उसके लिए कथित ‘हिंदू सभ्यता’ बेमतलब की बात है। इस बात को आधुनिक चीन के निर्माता माओत्से तुंग के उद्धरणों से लेकर राष्ट्रपति शी जिनफिंग के मौजूदा शासन के विचारक चाइनीज दार्शनिक जांग वी की पुस्तक द चाईना वेव (The China Wave) से साबित किया जा सकता है। चाइनीज विचारक ने दो टूक कहा है कि भारत सभ्यतागत राष्ट्र नहीं है (India is not a civilization state)। वैसा तो अकेला चीन है क्योंकि वह सर्वाधिक आबादी के साथ विशिष्ट सांस्कृतिक परंपराओं वाला सहस्त्राब्दियों पुराना राष्ट्र इतिहास लिए हुए है। चरित्र लिए हुए है। चीन पूरी दुनिया का मॉडल राष्ट्र है। मतलब भारत केवल आबादी के नाते विशाल देश है।

और विशाल आबादी वाला विशाल देश किस काम का? इतिहास के अनुभव से प्रमाणित कि लुटने के काम का। लूटे जा सकने वाला विशाल देश। विशाल चारागाह। तमाम विदेशी हमलावर भारत को लूटने के लिए, हिंदुओं से सेवादारी कराने, उन पर ठसके से राज करने के लिए ही तो भारत आए। विशाल आबादी का विशाल देश यदि विदेशी के लिए मौका रहा है तो स्वदेशी ठगों के लिए भी मौका रहा। ताजा अदानी प्रकरण में अमेरिका-कनाडा-ब्रिटेन जा कर बसे प्रवासी भारतीय लिख रहे हैं कि हिंडनबर्ग की रिपोर्ट झूठ का पुलिंदा है। एक अमेरिकी साजिश है। पर यदि ऐसा है तो पहली बात गौतम अदानी में क्यों हिम्मत नहीं हुई जो अमेरिकी अदालत में हिंडनबर्ग पर मुकद्दमा ठोके या बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री पर नरेंद्र मोदी ब्रितानी अदालत में बीबीसी के खिलाफ मानहानी का दावा ठोकें।

दूसरी बात। हिंडनबर्ग की रिपोर्ट का कुल क्या अर्थ है? क्या यह नहीं कि भारतीयों को, भारत राष्ट्र-राज्य को चेताया कि अदानी ग्रुप देश की बचत, लोगों-बैंकों के पैसे, निवेश पर ठगी का कैसा खेला खेल रहा है? अदानी ने अमेरिका व यूरोप को उल्लू नहीं बनाया, बल्कि भारतीयों को बना भारतीयों के पैसे, सिस्टम को चूना लगाया। प्रवासी हिंदुओं को भी पता है कि यदि कोई अमेरिकी शेयर बाजार से वहां ठगी करता है तो अमेरिकी सिस्टम उसे बख्शता नहीं है। इसलिए हिंडनबर्ग ने यदि दुनिया के फटाफट बने नंबर दो खरबपति की पोल खोली तो इससे भारत के लोगों का भला होना है। विशाल भारत को तुरंत समझना चाहिए कि अदानी ग्रुप के कैसे कैसे कुकर्म।

मगर हिंडनबर्ग की अदानी समझ भारत में मान्य नहीं है, बल्कि उलटे भारत के लोग अपने झूठ, मुगालतों, अंधविश्वासों व हिप्पोक्रेसी में अदानी को भारत का गौरव बतला रहे हैं। अमेरिका की निगाह में जो ठग वह भारत का राष्ट्र गौरव। भारत रत्न लायक!

इसलिए दुनिया भारत को अंधविश्वासी मानती है और हम अपने आपको विश्वगुरू। हम जो सत्य मानते हैं उसे दुनिया झूठ मानती है। हम विशाल भारत की विशाल आबादी को ताकत मानते हैं और विदेशी उसे बाजार। लूटने का चारागाह! तभी दुनिया से जाहिर यह सत्य है मोदी के अमृतकाल में जो कुबेर पैदा हुआ वह 85 फीसदी फर्जी है। उसके शेयरों की रियल वैल्यू 15 प्रतिशत ही है। कल्पना करना चाहिए कि वैश्विक पूंजी बाजार में भारत, भारत के उद्यमियों, भारत की व्यवस्था को ले कर अब किस किस तरह सोचा जा रहा होगा?

हां, गौतम अदानी से भारत की आइडेंटिटी है तो उनके साथ अपने आप नरेंद्र मोदी से भी है। पर इस बात को क्या नरेंद्र मोदी खुद समझ रहे होंगे? क्या भाजपा, आरएसएस और हिंदू राजनीति के वे चेहरे बूझ रहे होंगे जो कभी भारत को चरित्रवान, ईमानदार, सच्चा और पुरुषार्थी देखने के सपने लिए हुए थे?

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By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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