किसान की आय कितनी है?

देश के एक औसत किसान की कितनी आय होती है? यह यक्ष प्रश्न है, जिसका जवाब हर उस व्यक्ति से पूछा जाना चाहिए, जो यह कहता है कि 2022 तक किसान की आय दोगुनी कर दी जाएगी। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने यह बात कही है और केंद्रीय कृषि मंत्री ने भी कहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यह बात पिछले छह साल से कह रहे हैं। लेकिन क्या किसी मंत्री ने यह बताया है कि जब प्रधानमंत्री ने किसान की आय दोगुनी करने का ऐलान किया तो उनकी आय कितनी थी और 2022 में कितनी हो जाएगी? कम से कम यह बता देते कि पिछले छह साल के अथक प्रयास से, जिसमें कृषि मंत्रालय का नाम बदल कर कृषि व किसान कल्याण मंत्रालय करना भी शामिल है, किसानों की आय कितनी बढ़ गई है? जब अगले एक-डेढ़ साल में आय दोगुनी होने वाली है तो साढ़े छह साल में पौने दोगुनी तो हो गई होगी? या अचानक ही दोगुनी हो जाएगी, अभी जहां के तहां अटकी है?

क्या सरकार के पास किसान की आय की गणना करने का कोई फॉर्मूला है? जैसे नौकरी करने वालों को वेतन मिलता है, महंगाई भत्ता और दूसरे भत्ते मिलते हैं, जिनके आधार पर आकलन होता है कि उनको पूरे साल में कितनी आय हुई! कारोबारी अपना आय कर रिटर्न या जीएसटी रिटर्न दाखिल करता है, जिसमें वह आमदमी और खर्च का हिसाब बताता है तो उससे पता चलता है कि उसे कितनी आय हुई। उसी तरह क्या कोई तरीका है, जिससे पता चले कि किसान की आय कितनी हुई? उसकी आमदमी और खर्च का क्या हिसाब होता है? सरकार हो या निजी कंपनियां हों हर साल अपने कर्मचारियों के वेतन, भत्ते का ख्याल रखती हैं तो उससे पता चलता है कि कितनी वेतन बढ़ोतरी या कमी हुई। क्या ऐसा कोई हिसाब किसानों का रखा जाता है?

हकीकत यह है कि सरकार के पास कोई फॉर्मूला नहीं है। भारत जैसे देश में कोई फॉर्मूला हो भी नहीं सकता है क्योंकि भारत में खेती-किसानी का दायरा इतना बड़ा है। इतने लोग इस पर आश्रित हैं और इतने तरह से लोग खेती के काम में शामिल हैं कि उनकी आमदनी और खर्च का हिसाब लगाना ही मुश्किल है। देश के अलग अलग राज्यों में किसानों की स्थितियां अलग अलग होती हैं। पंजाब और हरियाणा में अनाज मंडियां हैं और मंडियां बहुत सुनियोजित तरीके से काम करती हैं। वहां किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी की दर पर अपना अनाज बेचता है तो उसका हिसाब लगाना अपेक्षाकृत आसान है। पर बाकी राज्यों में जहां मंडियों की व्यवस्था नहीं है वहां किसान का अनाज औने-पौने दाम में बिकता है। उनके पास न तो भंडारण की व्यवस्था है और न उनकी हैसियत इतनी है कि वह अनाज को भंडार करके रखे। सो, खेत से फसल आते ही जो दाम मिलता है वह उस पर अपनी फसल बेच देता है। सो, व्यवस्थित तरीके से किसान की आय का हिसाब करना संभव नहीं है।

भारत में सरकार को किसान की आय की कितनी चिंता है, इस बात को इस तथ्य से समझा जा सकता है कि भारत सरकार के नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस यानी एनएसएसओ के पास 2012-13 के बाद के किसान की सालाना आय का आंकड़ा नहीं है या कम से कम उसे जारी नहीं किया गया है। 2012-13 के एनएसएसओ के आंकड़े 2016 में प्रकाशित हुए थे। इनके मुताबिक भारत में एक किसान परिवार की औसत आय 6,426 रुपए महीना यानी 77,112 रुपए सालाना थी। सोचें, पांच लोगों के एक औसत परिवार की आय 6,426 रुपए थी यानी प्रति व्यक्ति डेढ़ हजार रुपए से भी कम! जैसे ही इस आंकड़े को किसान की औसत जोत के आधार पर देखते हैं वैसे ही और हैरान करने वाली बात सामने आती है। एनएसएसओ के आंकड़ों के मुताबिक ही आधा हेक्टेयर से कम जोत वाले किसान परिवार की मासिक औसत आय 4,152 रुपए है और जिस किसान की जोत 10 हेक्टेयर या उससे ज्यादा की है उसकी मासिक आमदनी 41,388 रुपए है। जिस हिसाब से कृषि से जुड़े उत्पादों की कीमत बढ़ी है, उस आधार पर अगर सालाना बढ़ोतरी का हिसाब लगाएं तो 2019 तक एक किसान परिवार की औसत आमदनी 10,329 रुपए बनती है।

लेकिन यह आंकड़ा भी एक किस्म का भ्रम है क्योंकि देश की अर्थव्यवस्था में कृषि से जुड़े कंपोनेंट्स की कीमत बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि उसका फायदा किसान को हो रहा है। उसका फायदा शायद ही कभी किसान को मिलता है। किसान के ऊपर कृषि की लागत बढ़ते जाने का बोझ तो पड़ता है लेकिन उसकी आमदनी नहीं बढ़ती है। तभी सबसे पहली जरूरत यह होनी चाहिए कि सरकार किसान की निश्चित आय तय करे। जैसे दुनिया के तमाम विकसित देशों ने सब्सिडी देकर अपने किसानों की आय तय की है, उस तरह से। इसके लिए कृषि लागत के अनुपात में आमदनी सुनिश्चित करने का फॉर्मूला बने और उसे लागू किया जाए।

सारी सरकारें एमएस स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों की चर्चा करती हैं पर उसे लागू कोई नहीं करता। इस फॉर्मूले के मुताबिक कृषि लागत को तीन हिस्सों में बांटा गया है। एक, जो किसान खेती के लिए नकद खर्च करता है, जैसे बीज, खाद, सिंचाई, केमिकल, मजदूरी आदि। दूसरा, जो फैमिली लेबर है यानी किसान का परिवार, जो मेहनत करता है और तीसरा हिस्सा होता है जमीन का किराया और खेती में इस्तेमाल होने वाली मशीनरी का खर्च। इन तीनों को मिला कर स्वामीनाथन आयोग ने लागत निकाली थी, जिसके ऊपर 50 फीसदी मुनाफा किसानों को देने की बात थी। इसे ए2, एफएल प्लस सी2 फॉर्मूले का नाम दिया गया था।

इस तरह से लागत निकाल कर उसके ऊपर किसान को 50 फीसदी आमदनी देने का फॉर्मूला तो तभी बन या सफल हो सकता है, जब सरकार पूरे देश में इस फॉर्मूले के आधार पर हर फसल की लागत तय करे और उसके ऊपर 50 फीसदी मुनाफे के साथ न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करे और साथ ही यह सुनिश्चित करे कि न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम कीमत पर देश में कहीं भी किसानों के उत्पाद की खरीद-बिक्री नहीं होगी। लेकिन अफसोस की बात है कि सरकार ऐसी कोई व्यवस्था नहीं बना रही है, जिससे किसान की न्यूनतम आय सुनिश्चित हो। उलटे वह पूरे देश में ऐसी व्यवस्था बना रही है, जिसमें किसान कारपोरेट और उद्यमियों के हाथ में खिलौना बन जाए। सरकार ने नए कृषि कानूनों से ऐसी व्यवस्था बनाई है, जिसमें कोई भी व्यक्ति कहीं भी किसान की फसल खरीद सकता है और न्यूनतम समर्थन मूल्य चुकाने की कोई बाध्यता नहीं होगी। ऊपर से ऊपर फसल की कीमत या भुगतान को लेकर विवाद होता है तो एसडीएम की अदालत में भागदौड़ करनी पड़ेगी।

इसका सीधा मतलब यह निकलता है कि किसान को अंततः बाजार द्वारा तय की गई दर पर अपनी फसल बेचनी होगी और जब ऐसा होगा तो किसान की आय कैसे बढ़ेगी? खेती वैसे भी किसान के लिए लगातार घाटे का सौदा बनती जा रही है। सरकार समझ रही है कि साल में किसानों को छह हजार रुपए यानी 17 रुपए रोज की ‘सम्मान निधि’ देकर वह उनका भला कर रही है। पर असल में वह छह हजार रुपए की राशि सिर्फ इसलिए शुरू की गई थी ताकि जब खेती-किसानी को कारपोरेट के हाथों सौंपने का कानून बने तो सरकार के पास कहने को रहे कि वह किसानों को ‘सम्मान निधि’ दे रही है। वह असल में किसानों को एक बड़े दुष्चक्र में फंसाने की योजना का हिस्सा है।

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