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टोक्यो ओलंपिक का क्या सबक है?

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lesson of the olympics यह भारत का दुर्भाग्य है कि यहां राजनीति में खेला होता है और खेलों में राजनीति होती है। टोक्यो ओलंपिक के बाद भी खेल के नाम पर जो कुछ भी हो रहा है वह राजनीति ही है और तय मानें कि इससे भारत में न तो खेलों की संस्कृति बेहतर होने वाली है और न दीर्घावधि में खेल व खिलाड़ियों की गुणवत्ता में सुधार होना है। जो सचमुच खेलों में रूचि रखते हैं उनको याद होगा कि 2012 के लंदन ओलंपिक में भी भारत के खिलाड़ियों ने जब छह पदक जीते थे तब भी देश में ऐसा ही माहौल था। चारों तरफ खिलाड़ियों की जय जयकार हो रही थी, उनका स्वागत किया जा रहा था कि और उन पर इनामों की बौछार हो रही थी। लेकिन उसके बाद क्या हुआ? उसके चार साल बाद रियो ओलंपिक में भारत के 117 खिलाड़ियों की टीम गई और सिर्फ दो पदक जीत कर लौटी। सोचें, लंदन में 83 खिलाड़ियों की टीम ने छह मेडल दिलाए थे और रियो में 117 खिलाड़ियों की टीम सिर्फ दो पदक लेकर लौटी थी।

यह याद दिलाने का मकसद किसी किस्म की निराशा का माहौल बनाना नहीं है। पर यह हकीकत बताना है कि भारत में किस तरह नेता, अभिनेता, कारोबारी और खेल संगठन मौके का फायदा उठाते हैं और यूफोरिया खत्म होते ही सब अपने अपने काम में लग जाते हैं। फिर खिलाड़ियों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है। उनका और उनके परिवार का संघर्ष चलता रहता है। जिनको विश्व मुकाबलों में या ओलंपिक में पदक मिल जाता है वे हर तरह से सक्षम हो जाते हैं। फिर आमतौर पर यह देखने को मिला है कि अति आत्मविश्वास उनको अपने प्रदर्शन के प्रति लापरवाह बनाता है। उनकी तैयारियां ढीली पड़ती हैं और फिर अगले मुकाबले में उनका प्रदर्शन खराब हो जाता है। तभी आज तक के इतिहास में भारत में सिर्फ दो ही खिलाड़ी ऐसे हुए हैं, जिन्होंने लगातार दो ओलंपिक में अपना प्रदर्शन दोहराया। पहले, पहलवान सुशील कुमार और इस बार बैडमिंटन खिलाड़ी पीवी सिंधु! इसलिए टोक्यो ओलंपिक से सबको सबक लेना चाहिए। सबसे पहले तीन सबक ये हैं-

पहला, मोमेंट मार्केटिंग यानी मौके का फायदा उठाने पर रोक लगनी चाहिए। अभी भारतीय खिलाड़ी टोक्यो में ऐतिहासिक प्रदर्शन करके लौटे हैं तो सब इस मौके का फायदा उठाने में लगे हैं। हर व्यक्ति मोमेंट मार्केटिंग कर रहा है। जिस तरह से कोई छात्र अपने परिश्रम, अपनी तपस्या और अपनी योग्यता के दम पर यूपीएससी की परीक्षा पास करता है या जेईई मेन्स या नीट की परीक्षा पास करता है तो सारे कोचिंग वाले उसकी फोटो लगा कर उसे बधाई देते हैं और अपना प्रचार करते हैं। उसी तरह ओलंपिक में पदक जीतने वाले खिलाड़ियों के साथ हो रहा है। प्रधानमंत्री से लेकर राज्यों के मुख्यमंत्री और फिल्म अभिनेताओं से लेकर कारोबारी जगत तक के लोग इन खिलाड़ियों के सहारे अपने प्रचार में जुटे हैं। टेलीविजन चैनल अपनी टीआरपी के लिए रात-दिन खिलाड़ी के परिजनों को तो छोड़िए पड़ोसियों तक के इंटरव्यू चला रहे हैं।

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प्रधानमंत्री आज पदक जीतने वाले खिलाड़ियों से कैमरे लगवा कर स्पीकर फोन पर बात कर रहे हैं लेकिन हकीकत यह है कि ओलंपिक आयोजन के वर्ष में भारत में खेल बजट में दो सौ करोड़ रुपए से ज्यादा की कटौती की गई। आज देश का कोई उद्योगपति किसी खिलाड़ी के लिए नकद इनाम की घोषणा कर रहा है तो कोई अपनी कंपनी की एसयूवी गाड़ी भेंट कर रहा है। इनसे कोई पूछे कि 2018 में जब सहारा समूह ने भारतीय हॉकी टीम की स्पांसरशिप खत्म की थी तब कोई उद्योगपति क्यों नहीं आगे आया था हॉकी टीम को स्पांसर करने? देश के सारे छोटे-बड़े उद्योगपति आईपीएल के क्रिकेट तमाशे के लिए टीम खरीदने की होड़ में हैं। बोली लगा कर टीमें और खिलाड़ी खरीदे जा रहे हैं लेकिन राष्ट्रीय खेल हॉकी की टीम का स्पांसर कोई नहीं है! ओलंपिक में जिन खेलों के मुकाबले होते हैं उनके खिलाड़ियों पर पैसा लगाने को कोई तैयार नहीं है। खिलाड़ी पदक जीत कर लौटे हैं तो सबको उसके सहारे अपनी मार्केटिंग करनी है। सोचें, उत्तराखंड की सरकार ने मुंबई के अंग्रेजी अखबार में नीरज चोपड़ा को बधाई देने का पूरे पेज का विज्ञापन दिया! इसकी क्या तुक है? मणिपुर की सरकार नीरज चोपड़ा के लिए एक करोड़ के इनाम की घोषणा कर रही है, इसकी भी क्या तुक है?

दूसरा, ‘विनर्स टेक ऑल’ यानी विजेता को ही सब कुछ मिलेगा की सोच बदलनी होगी। दुनिया के शायद किसी देश में ऐसा नहीं होता है, जैसा भारत में हो रहा है। पदक जीत कर लौटे खिलाड़ियों पर इनामों की बौछार हो रही है और पदक जीतने से चूक गए खिलाड़ी अपने शानदार प्रदर्शन के बावजूद किसी की तवज्जो में नहीं हैं। नीरज चोपड़ा ने भारत को एथलेटिक्स का पहला गोल्ड मेडल दिलाया। उनके गोल्ड जीतने के चार घंटे के अंदर देश में उनके लिए करीब 14 करोड़ रुपए के नकद इनाम की घोषणा कर दी गई। रजत और कांस्य पदक जीतने वाले खिलाड़ियों के लिए भी करोड़ों रुपए नकद इनाम और सरकारी नौकरियों की घोषणा हुई है। कांस्य पदक जीतने वाली हॉकी टीम में शामिल सभी खिलाड़ियों के लिए बड़े इनामों की घोषणा हुई है। लेकिन जो खिलाड़ी पदक जीतने से चूक गए उनके प्रोत्साहन के लिए क्या है?

भारतीय गोल्फर अदिति अशोक चौथे स्थान पर रही थीं और बहुत मामूली अंतर से पदक नहीं जीत पाई थीं। एमसी मैरीकॉम मुक्केबाजी के रिंग में नहीं, बल्कि जजों की टेबल पर हारी थीं। तीरंदाज दीपिका कुमारी और उनके पति अतनु दास शानदार प्रदर्शन करके भी पदक नहीं जीत पाए थे। शूटर मनु भाकर की गन ऐन मौके पर धोखा दे गई थी। विनेश फोगाट धाकड़ पहलवान हैं और यह महज संयोग था कि वे पदक नहीं जीत पाईं। लेकिन टोक्यो से लौट कर ये सभी खिलाड़ी कहां गए किसी को पता नहीं है। इनके प्रोत्साहन के लिए किसी ने आगे आकर किसी इनाम की घोषणा नहीं की है। हजारों करोड़ रुपए कमाने वाले भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी बीसीसीआई ने इनाम की घोषणा की तो उसने भी सिर्फ जीते हुए खिलाड़ियों को इनाम देने के लिए चुना।

तीसरा, शॉर्ट टर्म विजन यानी तात्कालिकता में सोचने का नजरिया बदलना होगा। भारत में हर चीज तात्कालिकता में सोची जाती है। जैसे पेरिस में अब ओलंपिक 2024 में होना है तो तैयारियों के बारे में 2023 में सोचा जाएगा। उस समय जैसे तैसे टीम तैयार करके विश्व मुकाबले के लिए रवाना कर दी जाएगी। उसमें भी जितने खिलाड़ी जाएंगे उससे ज्यादा सरकारी बाबू और खेल संगठनों से जुड़े  लोग जाएंगे। इस नजरिए को बदल कर खेलों के टिकाऊ विकास का नजरिया बनाना होगा। लंबे समय के लिए नीतियां बनानी होंगी, खेल सुविधाओं का विकास करना होगा, कम उम्र में खिलाड़ियों की पहचान करनी होगी, उन्हें प्रशिक्षित करने का बंदोबस्त करना होगा और इस पर खुले हाथ से खर्च करना होगा। आज भारतीय क्रिकेट टीम अगर दुनिया में सबसे बेहतरीन टीम बनी है तो उसका कारण यह है कि राहुल द्रविड जैसे खिलाड़ी को नए खिलाड़ी तैयार करने का जिम्मा दिया गया और उस काम पर खर्च किया गया। अगर भारत को खेल महाशक्तियों की श्रेणी में आना है तो उसे खेलों में निवेश करना होगा। जिस तरह अमेरिका, चीन, रूस या जापान में प्रतिभा की तलाश का सिस्टम है उस तरह का सिस्टम बनना होगा।

टोक्यो ओलंपिक ने भारत में खेलों के बारे में कई मिथक तोड़े हैं। पहले माना जा रहा था कि भारत एथलेटिक्स में पदक नहीं जीत सकता है। भारतीयों का डीएनए ऐसा नहीं होता है कि वे ट्रैक एंड फील्ड में पदक जीत सकें। लेकिन नीरज चोपड़ा ने इस मिथक को तोड़ दिया। वैसे भी यह तथ्य है कि एथलेटिक्स में पदक जीतना सबसे मुश्किल होता है। टोक्यो में ही 38 स्वर्ण पदक जीतने वाले चीन को एथलेटिक्स में महज दो स्वर्ण मिले हैं। अमेरिका ने 39 स्वर्ण जीते हैं, जिसमें सात एथलेटिक्स के हैं। असल में इन सब देशों ने अपने खिलाड़ियों की क्षमता को पहचाना है और उन्हें पता है कि वे किस खेल में ज्यादा पदक जीत सकते हैं। पदक तालिका में शीर्ष पर रहने वाले देशों को तैराकी और जिम्नास्टिक से जुड़े खेलों में ज्यादातर पदक मिलते हैं। भारत को तीरंदाजी, शूटिंग, मुक्केबाजी, कुश्ती जैसे मुकाबले में पदक मिल सकते हैं। एथलेटिक्स के साथ साथ इन खेलों पर फोकस करके नीति बने और तैयारियों में निरंतरता आए तो भारतीय खिलाड़ी चमत्कार कर सकते हैं।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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