कोरोना का सच आखिर क्या है?

कोराना वायरस के चारों ओर प्रोटीन का एक आवरण होता है, जिसकी वजह से यह इंसान की कोशिकाओं को बहुत तेजी से संक्रमित करता है। यह ‘स्पाइक प्रोटीन’ का इस्तेमाल करता है, जिसके कारण यह शरीर के कई अंगों को संक्रमित करने में सक्षम है। यह म्यूटेशन के समय अपना रूप बदलता है, जिसकी वजह से इसे समझने में दिक्कत आ रही है। यह इसकी मेडिकल सचाई है, जो अनेकानेक शोध के जरिए प्रमाणित है। पर कोरोना वायरस का यह सिर्फ एक पहलू है। इसके कई और पहलू हैं, जिनके ईर्द-गिर्द रहस्य का आवरण लिपटा हुआ है और ऐसा नहीं लग रहा है कि कोई भी उस आवरण को हटा कर सचाई को सामने लाने में दिलचस्पी ले रहा है।

आखिर ऐसा क्यों है कि इसके बारे में पक्के तौर पर अभी तक कुछ नहीं कहा जा पा रहा है? कोई प्रमाणिक तौर पर क्यों नहीं बता पा रहा है कि यह वायरस कैसे पैदा हुआ, कैसे फैलता है, इससे होने वाली बीमारी का इलाज क्या है और वैक्सीन कैसे बन रही है? ध्यान रहे किसी भी वायरस के बारे में जब तक सारी चीजें पता नहीं चल जाती हैं तब तक उसकी वैक्सीन नहीं बन सकती है। दवा का मामला अलग है। दवा बन सकती है। जैसे अभी कम से कम चार दूसरी बीमारियों की दवाओं- रेम्डेसिविर, फैबिपिराविर, हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन और डेक्सामिथासोन का इस्तेमाल कोरोना वायरस के मरीजों को ठीक करने के लिए किया जा रहा है। पर इस किस्म के प्रयोग वैक्सीन बनाने में नहीं हो सकते हैं। उसके लिए जरूरी होता है कि वायरस के म्यूटेशन को पूरी तरह से समझा गया हो और अगर वायरस म्यूटेट होते हुए रूप बदल रहा है तो उसके हर रूप का स्ट्रेन एक्सट्रैक्ट किया जा चुका है।

अब जबकि ब्रिटेन में ऑक्सफोर्ड से लेकर अमेरिका में मोडर्ना और ऑस्ट्रेलिया में नोवावैक्स से लेकर भारत में बीबीआईएल तक कई लैब्स में वैक्सीन का परीक्षण चल रहा है और दावा किया जा रहा है कि वैक्सीन का लैब ट्रायल सफल रहा है, क्लीनिकल ट्रायल सफल रहा है, ह्यूमन ट्रायल भी सफल रहा है और इसी वजह से कुछ जगह तो इनका उत्पादन शुरू भी कर दिया गया है और दूसरे-तीसरे साझा ट्रायल के बाद अक्टूबर-नवंबर में इसे बाजार में उतार दिया जाएगा, तो इसका मतलब है कि वैज्ञानिकों ने पूरी तरह से इस वायरस को समझ लिया है। सो, सवाल है कि जब इसे पूरी तरह से समझ लिया गया है तो फिर इसके बारे में इतना कंफ्यूजन क्यों है?

ताजा कंफ्यूजन यह है कि कोरोना वायरस हवा से भी फैलता है। कुछ समय पहले भी कहा गया था कि जिस तरह से प्रदूषण वाले कण यानी सस्पेंडेड पार्टिकुलेट मैटर हवा में लटके होते हैं उसी तरह कोरोना का वायरस भी किसी की छींक या खांसी के बाद निकले ड़्रॉपलेट्स में से निकल कर हवा में लटक जाता है और कोई तीन-चार घंटे तक लटका रहता है। उस दौरान उसके आसपास आने वाला कोई व्यक्ति अगर वहां की हवा में सांस लेता है तो ये वायरस भी उसके शरीर में पहुंच जाता है। अब 20 देशों के 239 वैज्ञानिक विश्व स्वास्थ्य संगठन पर दबाव बना रहे हैं कि वह अपने दिशा-निर्देशों में बदलाव करके लोगों को इस बारे में आगाह करे।

अब बड़ा सवाल ये है कि यह वायरस हवा से फैलता है तो अब तक पूरी दुनिया में फैल क्यों नहीं गया है? ऐसा तो है नहीं कि वायरस को हवा से फैलने का हुनर तब आया जब यह सात महीने का हो गया? इसमें यह गुण पहले दिन से होगा। अगर यह हवा से फैलता है तो एक परिवार में या एक दफ्तर में या एक इलाके में सभी लोगों को क्यों नहीं हो रहा है? यह इतना संक्रामक है कि छू भर लेने से संक्रमित कर दे रहा है और ऊपर से यह हवा से फैल रहा है तो अब तक दुनिया में अरबों लोगों को संक्रमित होना चाहिए था और करोड़ों लोगों को मर जाना चाहिए था। यह भी कहा जा रहा है कि इसके 80 फीसदी मामले असिम्पटमैटिक हैं यानी कोई लक्षण दिखाई नहीं देता है। ऐसे लोगों ने हवा से वायरस फैला कर करोड़ों लोगों को संक्रमित किया होगा। तो वे लोग दिख क्यों नहीं रहे हैं? अगर यह वायरस हवा से फैलता है तो फिर संक्रमितों का पता लगाने के लिए किसी टेस्ट की जरूरत नहीं है। फिर तो करोड़ों लोग छींकते, खांसते, सांस की तकलीफ से सीना पकड़े, छटपटाते या सड़कों पर गिर कर तड़पते दिखाई दे रहे होते। पर ऐसा दुनिया में कहीं नहीं हुआ है। बहुत कम ऐसे मामले हैं, जिनमें लोग गंभीर हालत में अस्पताल पहुंचे, ज्यादातर लोगों को खोज कर उनकी बीमारी का पता लगाया गया है।

तभी सवाल है कि इस नए खुलासे का क्या मतलब हुआ? कहीं किसी खास मकसद से पैनिक फैलाने का काम तो नहीं किया जा रहा है? दवा कंपनियों से लेकर वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों और विश्व स्वास्थ्य संगठन से लेकर चीन और अमेरिका तक सारे देश अपने अपने हिसाब से कोरोना का इस्तेमाल कर रहे हैं। जैसे कुछ दिन पहले दिल्ली के उप मुख्यमंत्री ने कह दिया था कि 31 जुलाई तक दिल्ली में साढ़े पांच लाख संक्रमित होंगे। हकीकत यह है कि 31 जुलाई तक दिल्ली में संक्रमितों की कुल संख्या दो लाख भी नहीं होगी। उप मुख्यमंत्री ने कहीं से बनवाया हुआ यह प्रोजेक्शन केंद्र सरकार के एक आदेश को बदलवाने के लिए जारी कर दिया था। सोचें, जब एक मामूली आदेश को बदलवाने के लिए कोई चुनी हुई सरकार इस तरह से पैनिक बना सकती है, तो जिनके अरबों, खरबों डॉलर दांव पर लगे हैं वे क्या कर सकते हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में अमेरिका की एमआईटी के नए प्रोजेक्शन को भी देखने की जरूरत है, जिसके मुताबिक फरवरी 2021 में भारत में हर दिन 2.87 लाख संक्रमित रोज आएंगे और संक्रमितों की संख्या 20 से 60 करोड़ पहुंच सकती है। हालांकि बाद में इसमें यह भी जोड़ दिया गया है कि ऐसा तब होगा, जब दवा या वैक्सीन नहीं मिली।

तभी ऐसा लग रहा है कि यह दवा और वैक्सीन की उपयोगिता स्थापित करने और उसके लिए बाजार तैयार करने की कवायद है। वायरस है, संक्रामक है और गंभीर भी है, जिनको दूसरी कोई बीमारी है उनके लिए घातक भी है, हो सकता है कि आने वाले दिनों में संक्रमितों की तादाद बहुत बढ़े, पर इसके बारे में हर दिन पैनिक फैलाने का जो काम हो रहा है उसका मकसद दूसरा है। सोचें, 60 करोड़ तक संक्रमित होने और भारत में हर दिन दो लाख 87 हजार केसेज आने का प्रोजेक्शन और वायरस के हवा में फैलने वाली बात कब आई है? जब चार अलग अलग दवाओं से बीमारी का इलाज होने लगा है, प्लाज्मा थेरेपी सफल होने लगी है और दुनिया भर के देशों में मरने वालों की संख्या में कमी आने लगी है। ध्यान रहे दुनिया में कोरोना संक्रमितों के मरने की औसत संख्या चार हजार है। वह भी तब है, जब यह गाइडलाइन है कि अगर कोरोना संक्रमित की मौत किसी दूसरी वजह से भी हुई है तो उसे कोरोना से हुई मौत में गिना जाएगा। अमेरिका, ब्राजील और भारत के अलावा थोड़े से और देशों को छोड़ कर लगभग सभी देशों ने वायरस के संक्रमण पर किसी न किसी तरह से काबू कर लिया। तब अचानक नए प्रोजेक्शन आने लगे और वायरस को लेकर घबराहट फैलाने वाली नई बातें होने लगीं!

यह ध्यान रहे कि दुनिया भर की प्रयोगशालाएं, जहां बडे शोध हो रहे हैं, वैक्सीन और दवाएं बन रही हैं वो निजी कंपनियों की फंडिंग से चलती हैं और पैसे के अलावा उनका कोई और धर्म नहीं है।

याद रखें इन्हीं लैब्स से यह एक दिन यह खबर आती है कि एक दिन में तीन कॉफी पीने से दिल मजबूत होता है और दूसरे दिन दूसरे लैब का निष्कर्ष होता है कि एक दिन में तीन कॉफी पीने से जान भी जा सकती है। इसी तरह से इन प्रयोगशालाओं ने कोरोना वायरस का मजाक बना कर रख दिया है। ज्ञात इतिहास में जितने वायरस हुए हैं और वे जितनी तरह से फैले हैं, इन लैब्स पर भरोसा करें तो उतनी तरह से कोरोना का वायरस फैल रहा है। यह हवा से फैल रहा हैं, छींकने-खांसने से फैल रहा है, मानव मल से फैल रहा है, वीर्य से फैल रहा है, जानवरों से फैल रहा है, लोहे की सतह पर नौ दिन रहता है, चमड़े के सामान पर चार दिन रहता है, हवा में तीन घंटे रहता है, मरे हुए जानवर के चमड़े पर चार दिन रहता है, फ्रीजर में रखे गए मीट पर 15 दिन रहता है, कपड़ों पर तीन घंटे रहता है, खाने-पीने की चीजों पर भी रहता है, करेंसी नोट सहित कागज पर भी कई घंटे रहता है यानी कोई ऐसी जगह नहीं है, जहां ये नहीं रहता है। वायरस न हुआ भगवान हो गया, जो कण-कण में विराजमान है। इसके बावजूद दुनिया के 780 करोड़ लोगों में से एक करोड़ लोग ही संक्रमित हुए हैं!

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