आरक्षण की क्या उपयोगिता?

जातीय आरक्षण की मांग बार- बार क्यों उठती है, अब इस सवाल पर विचार किए जाने की जरूरत है। क्या इसके पीछे कुछ नेताओं की अपनी सियासत चमकाने की मंशा होती है, या वास्तव में संबंधित समुदाय के लोग ये समझते हैं कि आरक्षण मिलने से उनका भला हो जाएगा? सरकारी क्षेत्र में नौकरियां लगातार घटने और सार्वजनिक कंपनियों के निजीकरण के चल रहे दौर के बावजूद अगर कुछ समुदायों में आरक्षण के प्रति मोह बना हुआ है, तो जाहिर है, उसका कोई तथ्यात्मक आधार नहीं है। इसीलिए अब इस प्रश्न पर व्यापक और तथ्य-परक चर्चा जरूरी हो गई है। ताजा खबर है कि राजस्थान में गुर्जर समुदाय से जुड़े लोगों ने उच्च शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मांग फिर से उठाई है। प्रदर्शनकारी कई जगहों पर ट्रेन की पटरियों पर बैठ गए, जिससे रेल सेवाएं बाधित हो गईं। गुर्जर समाज के लोग 2007 से आरक्षण की मांग कर रहे हैं। उन्होंने पहले भी कई बार आंदोलन किए हैं, जिनमें कई बार हिंसा भी हुई। अतीत में उनके लिए राज्य सरकार ने पांच प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा भी की थी। लेकिन उसे अदालतों में चुनौती दी गई है, क्योंकि उसे लागू करने से सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन होता है। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने देश में आरक्षण पर 50 प्रतिशत की सीमा लगाई हुई है।

अब फिर प्रदर्शनों की शुरुआत करते हुए गुर्जर नेता विजय बैंसला ने कहा कि पिछले दो सालों में आरक्षण के बारे में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से उनकी चार बार बातचीत हो हुई है। लेकिन अभी तक कोई भी कदम नहीं उठाया गया है। इसीलिए इस बार जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं हो जातीं, उनका प्रदर्शन चलता रहेगा। सवाल है कि जब मामला कोर्ट में है, तो फिर आंदोलन का क्या तर्क बनता है। मगर जातीय राजनीति करने वाले नेता ऐसी ठोस पर विचार नहीं करते। बैंसला ने कहा कि बड़ी संख्या में युवा बेरोजगार बैठे हुए हैं। दूसरी तरफ 25,000 नौकरियां अटकी हुई हैं, जिसकी वजह से युवाओं में बहुत गुस्सा है। तो मांग यह होनी चाहिए कि उन खाली जगहों पर भर्ती हो। या ऐसी आर्थिक नीति अपनाई जाए, जिससे रोजगार के अधिकतम अवसर पैदा हों। क्या ऐसी मांग करने के बजाय आरक्षण की मांग करना मुद्दे को भटकाना नहीं है?

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