अमेरिका से दोस्ती में क्या बुराई है?

देश में अनेक लोग इस बात को लेकर परेशान हैं कि भारतक्यों अमेरिका के इतने करीबजा रहा है? उससे व्यापार समझौते के साथ साथ अहम रक्षा समझौते क्यों हो रहे हैं और गोपनीय सूचनाओं की साझेदारी का सिस्टम क्यों बनाया जा रहा है? क्या इससे भारत पूरी तरह से अमेरिका के ऊपर निर्भर नहीं हो जाएगा और इस बात की क्या गारंटी है कि अमेरिका अपने हितों की रक्षा के लिए कभी भारत की बलि न चढ़ा दे? यह जोखिम तो है। परंतु कूटनीति में हमेशा इस तरह के जोखिम उठाने पड़ते हैं। आखिर शीत युद्ध के समय रूस के साथ दोस्ती करके, अपने हित उसके साथ जोड़ कर और अपनी तमाम सामरिक जरूरतों के लिए उस आश्रित होकर भारत ने जोखिम तो लिया ही था!

अमेरिका के साथ भारत के मजबूत होते संबंधों को समझने के लिए इस हकीकत को स्वीकार करना होगा कि भारत भले गुटनिरपेक्ष देशों का अगुवा था और पंडित जवाहर लाल नेहरू ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन की बुनियाद रखी थी पंरतु भारत असल में कभी भी तटस्थ नहीं रहा। आजादी के बाद शुरुआती पांच-दस सालों को छोड़ दें तो भारत हमेशा किसी न किसी धुरी के साथ जुड़ा रहा है। नेहरू अपने आखिरी समय में अमेरिका के करीब चले गए थे तो इंदिरा गांधी ने रूस के साथ भारत की किस्मत जोड़ दी थी। उसके बाद से भारत पेंडुलम की तरह इन दो देशों के बीच झूलता रहा है। पीवी नरसिंह राव के समय देश की विदेश नीति में एक बड़ा शिफ्ट आया। अमेरिका, इजराइल के साथ भारत के संबंध मजबूत हुए। अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह ने मोटे तौर पर इसी नीति का पालन किया। इसलिए अगर भारत और अमेरिका आज सबसे करीबी सामरिक सहयोगी हो गए हैं तो यह एक दिन का घटनाक्रम नहीं है, बल्कि पिछले 30 साल की विदेश नीति की अनिवार्य परिणति है।

भारत पहले अमेरिका को लेकर आशंकित रहा है तो उसका बुनियादी कारण पाकिस्तान है। अमेरिका हमेशा पाकिस्तान को अपना करीबी सहयोगी मानता रहा है और 1971 के युद्ध में अमेरिका ने भारत को धमकाने के लिए अपना सातवां बेड़ा हिंद महासागर में भेजा था। बाद में भी अमेरिका हमेशा पाकिस्तान की तरफदारी इसलिए करता रहा क्योंकि रूस और चीन की वजह से उसे पाकिस्तान की जरूरत थी। परंतु अब हालात बदल गए हैं। पाकिस्तान पूरी तरह से चीन के ऊपर निर्भर हो गया है। भारतीय उपद्वीप की भू-राजनीतिक स्थितियां तेजी से बदल रही हैं। अफगानिस्तान के हालात बदल गए हैं। अब अमेरिका वहां से निकलने वाला है। रूस की स्थिति भी बदल गई है और वह अब चीन का सबसे नजदीकी सहयोगी है। रूस की प्रौद्योगिकी चीनी सेना को मजबूत बना रही है। इस क्षेत्र में परमाणु ताकत से संपन्न दो देश पाकिस्तान और उत्तर कोरिया पूरी तरह से चीन पर निर्भर हैं। सोचें, एशिया महादेश में परमाणु ताकत संपन्न पांच देश हैं, जिनमें से भारत को छोड़ कर बाकी चार देश- रूस, चीन, पाकिस्तान और उत्तर कोरिया एक साथ हैं। इन चार देशों की चुनौती से निपटने के लिए क्या अमेरिका को भारत की जरूरत नहीं है?

असल में अमेरिका को भारत की ज्यादा जरूरत है। दक्षिण कोरिया और जापान जैसे अपने सहयोगी एशियाई देशों और एशिया-प्रशांत में ऑस्ट्रेलिया जैसे साझीदार देश की एकता, अखंडता और संप्रभुता की रक्षा की जिम्मेदारी अमेरिका के ऊपर है। इस काम के लिए उसे भारत की मदद की हमेशा जरूरत होगी। भारत के पास बड़ी सैन्य ताकत है, भारत परमाणु शक्ति संपन्न देश है और प्रौद्योगिकी व आधुनिक हथियारों के मामले में भी भारत ने अपनी स्थिति मजबूत की है। भारत की इस हैसियत से चीन परेशान है। उसको पता है कि अगर अमेरिका की सामरिक ताकत भारत के साथ जुड़ जाती है तो चीन की विस्तारवादी नीतियों पर ब्रेक लगेगा। वह एशिया महादेश से लेकर दक्षिण चीन सागर तक में अपने विस्तार का जो अश्वमेध चला रहा है उसे रोकना होगा। अमेरिका का खुल कर उसके विरोध में खड़ा होना अफ्रीका और लैटिन अमेरिकी देशों में भी चीन के कारोबारी विस्तार की गति को धीमी करने वाला होगा।

यह सवाल भी उठाया जाता है कि भारत, रूस और चीन के साथ अपने को क्यों नहीं जोड़ सकता है? भारत ऐसा इसलिए नहीं कर सकता है कि क्योंकि चीन भारत की एकता, अखंडता और संप्रभुता के लिए खतरा है। यह बात चीन ने कई बार प्रमाणित की है। अब भी वह छह महीने से लद्दाख में जमा हुआ है और भारत की एक हजार वर्ग किलोमीटर से ज्यादा जमीन कब्जा कर ली है। पहले भी डोकलाम में वह ऐसा कर चुका है और अरुणाचल प्रदेश पर दावेदारी करता रहा है। ऐसे देश के साथ भारत की साझेदारी कभी नहीं बन सकती है। दूसरे, चीन के साथ साझेदारी का मतलब है कि जिस तरह से पाकिस्तान उस पर निर्भर हुआ है, उसका उपनिवेश बना है उस तरह से भारत भी बन जाए। इसके बावजूद भी अखंडता और संप्रभुता की रक्षा की गारंटी नहीं होगी। चीन अपने ऊपर निर्भर देशों की जमीन पर नजर गड़ाए रहता है। नेपाल और पाकिस्तान की जमीन भी उसने कब्जाई है। बहरहाल, उसने आर्थिक रूप से भारत को काफी हद तक अपना उपनिवेश बना लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चीन प्रेम ने भारत को कई मामलों में चीन के ऊपर निर्भर बनवाया है। अब धीरे धीरे भारत को अपनी वह निर्भरता खत्म करनी होगी। चीन के उलट अमेरिका से भारत को अपनी एकता, अखंडता और संप्रभुता का कोई खतरा नहीं है।

सो, यह बिल्कुल सही समय है, जब भारत को अमेरिका के साथ अपनी हर किस्म की साझेदारी मजबूत करनी चाहिए। दोनों देशों के बीच बेसिक एक्सचेंज एंड कोऑपरेशन एग्रीमेंट पर दस्तखत किया गया है। यह दोनों देशों के संबंधों को एक कदम आगे ले जाएगा और भारत की सुरक्षा को मजबूत करेगा। दोनों देशों के बीच सेटेलाइट के जरिए या किसी भी स्रोत के जरिए हासिल होने वाली गोपनीय सूचनाओं की साझेदारी होगी। अमेरिका पहले भी भारत की सुरक्षा को लेकर आगाह करता रहा है। वह दुनिया भर के जिहादी संगठनों की निगरानी करता है, वर्ल्ड वाइड वेब की हर हरकत पर उसकी नजर रहती है, हर संदिग्ध आईपी एड्रेस को अमेरिकी खुफिया एजेंसियां मॉनिटर करती हैं, हर देश की सीमा पर होने वाली हलचल पर अमेरिकी सेटेलाइट नजर रखते हैं। सोचें, अगर इनकी निगरानी से हर सूचना भारत को मिले तो आतंकवाद और चीन के विस्तारवाद के खिलाफ भारत को कितनी मदद  मिलेगी? असल में भारत और अमेरिका की चिंताएं एक जैसी हैं, दोनों के सामने खतरे एक जैसे हैं, राजनीतिक व्यवस्था एक जैसी है और भारतीय मध्य वर्ग की चाहना भी अमेरिका जैसा होने की है। सो, अगर भारत की सरकार अपने को अमेरिका के साथ जोड़ रही है तो इसमें कुछ भी बुरा नहीं है।

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