विरोध की यह कैसी संस्कृति!

भारत की राजनीति और चुनाव को लेकर कुछ सवाल सनातन हैं, जैसे सत्ता विरोध का प्रकटीकरण कैसे होगा या राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी से असहमति या उससे विरोध का इजहार कैसे होगा? लंबे चुनावी इतिहास के बावजूद भारत में इन सवालों का स्पष्ट और स्वीकार्य जवाब नहीं मिला है। परंतु इस बात पर सहमति है कि सत्ता विरोध का प्रकटीकरण वोट के जरिए होगा और राजनीतिक विरोधी के प्रति भी शत्रुता का भाव नहीं रखा जाएगा। इस बार बिहार विधानसभा चुनाव और मध्य प्रदेश की 28 सीटों के उपचुनाव में इस अघोषित सहमति का स्पष्ट उल्लंघन हो रहा है। हालांकि यह नहीं कहा जा सकता है कि ऐसा अचानक हुआ है। पिछले कुछ सालों में जिस किस्म की राजनीतिक संस्कृति बनी है और विरोधी को खत्म करके देश या राजनीति को उनसे मुक्त करने का अभियान चलाया गया है और राजनीतिक भाषणों में विरोधियों के प्रति जिस किस्म की अश्लील टिप्पणियां हुई हैं यह उसी का अनिवार्य नतीजा है।

बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खिलाफ जन आक्रोश माना जा रहा है। यह बहुत स्वाभाविक है कि लगातार 15 साल तक सत्ता में रहने वाले के खिलाफ लोगों में गुस्सा हो। लेकिन इस गुस्से का प्रकटीकरण जिस तरह से हो रहा है वह हैरान करने वाला है और बिहार की राजनीतिक संस्कृति में कहीं से फिट नहीं हो रहा है। बिहार में ऐसा नहीं होता है कि मुख्यमंत्री भाषण कर रहा हो तो विरोधी नेता के समर्थन में नारे लगें और मुख्यमंत्री के ऊपर चप्पल उछाली जाए, चाहे उससे कितनी भी नाराजगी रही हो। आखिर 2005 में हुए दो विधानसभा चुनावों में लालू प्रसाद और राबड़ी देवी से कम नाराजगी नहीं थी। नाराजगी थी, तभी लोगों ने राजद को हरा कर सत्ता से बाहर किया था। 2010 के चुनाव में तो नाराजगी ऐसी थी कि लालू प्रसाद की पार्टी महज 22 सीटों पर सिमट गई। इसके बावजूद किसी भी सभा में लालू प्रसाद के ऊपर न तो चप्पल फेंकी गई और न उनकी सभा में नीतीश कुमार जिंदाबाद के नारे लगे। जिस चुनाव में बिहार से कांग्रेस का राज हमेशा के लिए खत्म हुआ था, वीपी सिंह की लहर वाले उस चुनाव में भी कांग्रेस के मुख्यमंत्री के ऊपर चप्पल फेंके जाने की मिसाल नहीं है।

फिर इस बार ऐसा क्यों हो रहा है कि बिहार की जनता नीतीश कुमार की सभाओं में लालू प्रसाद जिंदाबाद के नारे लगा रही है और नीतीश के ऊपर चप्पल फेंक रही है? यह कहीं और की राजनीतिक संस्कृति है, जिसका बीज बिहार में डाला जा रहा है। तभी ऐसा लग रहा है कि यह स्वाभाविक नहीं होकर प्रायोजित हो। हाल के दिनों में पहली बार इस किस्म का विरोध दिल्ली में देखने को मिला था, जहां अरविंद केजरीवाल की सभाओं में उन्हीं के खिलाफ नारे लगे, रोड शो के दौरान उनको थप्पड़ मारा गया, उनके चेहरे पर स्याही फेंकी गई या कालिख पोतने का प्रयास हुआ। वह किसने कराया और दिल्ली में उसका क्या नतीजा हुआ यह सबको पता है। विरोधियों का सम्मान करना, राजनीति का अघोषित नियम है पर यह नियम अब भंग हो रहा है! राजनीतिक विरोधी को शत्रु माना जा रहा है। उसे बदनाम करने और उसकी छवि को मटियामेट करने का प्रयास हो रहा है। एक राजनीतिक सिद्धांत के तौर पर इस रणनीति को स्थापित किया जा रहा है।

इसी राजनीतिक सिद्धांत के तहत राहुल गांधी को पप्पू, अखिलेश यादव को टोंटी चोर, उद्धव ठाकरे के परिवार को पेंग्विन परिवार, लालू प्रसाद को चारा चोर के तौर पर स्थापित किया जा रहा है। कहने की जरूरत नहीं है कि यह काम कौन करा रहा है। अब तक यह काम राजनीतिक विरोधियों के लिए होता था, इस बार सहयोगी की तरफ ही बंदूक घूम गई है। इसमें संदेह नहीं है कि राजद की रैलियों की भीड़ हुड़दंगी होती है। यह भी सत्य है कि पहले भी राजद की सभाओं में अथाह भीड़ उमड़ती थी पर पहले तो कभी विपक्षी पार्टियों की सभाओं में लोगों ने हुड़दंग नहीं किया! न किसी ने मुख्यमंत्री के ऊपर चप्पल फेंकी और न किसी ने कहा कि सत्ता में आएंगे तो जेल भेजेंगे। यह सब बिहार में अचानक कैसे शुरू हो गया? यह एक नई राजनीतिक संस्कृति है, जिसे फैलने से रोकना देश के सबसे जाग्रत राजनीतिक समाज की सबसे पहली जिम्मेदारी होनी चाहिए।

मध्य प्रदेश में और भी अनोखी चीजें हो रही हैं। वहां 28 सीटों पर उपचुनाव हो रहा है। प्रचार के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने एक महिला मंत्री को ‘आइटम’ कह दिया। इस पर जो हंगामा हुआ वह अभूतपूर्व था। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान मौन धरने पर बैठे और पूरी भाजपा कमलनाथ पर टूट पड़ी। फिर उसी महिला मंत्री ने कमलनाथ की बेटी-बहन का नाम लेते हुए कहा कि वे होंगी ‘बंगाल की आइटम’। इस पर सबने चुप्पी साध ली। महिलाओं के सम्मान की चिंता करने वाले और उसे लेकर मौन व्रत करने वालों ने कान में तेल डाल लिए। भाजपा के एक नेता ने कांग्रेस के एक उम्मीदवार की पत्नी को रखैल कहा पर महिला सम्मान के लिए किसी के खून में उबाल नहीं आया। उपचुनाव का समूचा प्रचार बदजुबानी की मिसाल बन रहा है। कम या ज्यादा मात्रा में अब यह हर जगह होने लगा है।

पहले भी राजनीतिक विरोधियों पर ओछी टिप्पणियां होती रही हैं पर वह सांस्थायिक नहीं थीं। कांग्रेस ने कई बार राजनीतिक मर्यादा तोड़ी। एक राज्य के मुख्यमंत्री को ‘मौत का सौदागर’ कहना बेहद खराब टिप्पणी थी। परंतु इस किस्म की टिप्पणियों को मुख्यधारा की राजनीति का विमर्श नहीं बनने दिया गया। ऐसे बयानों और ओछी टिप्पणियों को एक राजनीतिक अस्त्र के तौर पर स्वीकार नहीं किया गया। राजनीतिक विरोध अपनी जगह था और निजी संबंध अपनी जगह थे। तभी चुनाव के बाद भी नेताओं में पर्याप्त सद्भाव दिखता था। अब राजनीतिक विरोध निजी संबंधों को प्रभावित करने लगा है। विरोधी को चोर तो पहले भी कहा जाता था पर अब आतंकवादी और देशद्रोही कहना भी आम हो गया है। विरोधी नेताओं के लिए जर्सी गाय, हाइब्रिड बछड़ा, 50 करोड़ की गर्लफ्रेंड, शूर्पणखा जैसी हंसी, शहजादा, पैसे मामा के यहां से आए, आदि विशेषणों के प्रयोग से यह नया विमर्श स्थापित हुआ है। यह बहुत गंभीर तरीके से और बहुत गहराई तक देश की राजनीति और उसके साथ समूचे लोकतांत्रिक विमर्श को प्रभावित करेगा।

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