अयोध्या से आगे अब क्या?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूसरे कार्यकाल का पहला सवा साल भारतीय जनसंघ और भाजपा की ओर से किए गए गए वादों को पूरा करने का समय रहा। जनसंघ और भाजपा ने मुख्य रूप से तीन वादे किए थे। पहला और सबसे पुराना वादा अनुच्छेद 370 खत्म करने का था, जो जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी और दीनदयाल उपाध्याय ने किया था। मोदी सरकार ने पिछले साल अगस्त में यह वादा पूरा कर दिया। अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण भाजपा का दूसरा वादा था उसे भी पूरा कर दिया गया। समान नागरिक संहिता का वादा जरूर अभी अधूरा है पर उसे भी पूरा करने की शुरुआत हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक के मुद्दे को असंवैधानिक बना दिया है और उसके बाद पिछले साल सरकार ने इसे कानूनी रूप से अपराध भी बना दिया। मुस्लिम समाज में एक से ज्यादा शादियों का मामला भी सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है।

सो, अब सवाल है कि अनुच्छेद 370 खत्म करने और अयोध्या में राम मंदिर का शिलान्यास होने के बाद अब सरकार और भाजपा दोनों क्या करेंगे? क्या सरकार दो टूक अंदाज में समान नागरिक संहिता बनाने की पहल कर सकती है? इसके लिए सभी धर्मों के पर्सनल लॉ को खत्म करना होगा। भाजपा के पास इस तरह के एजेंडे की कमी नहीं है। सरकार ने नागरिकता कानून में संशोधन कर दिया है और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर बनाने की संभावना भी हवा में है। यह अपने आप में बड़ा एजेंडा है। इसी तरह जनसंख्या नियंत्रण की बातें शुरू हो गई हैं और हो सकता है कि आने वाले दिनों में बढ़ती हुई आबादी पर काबू पाने के लिए जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाया जाए। अयोध्या में राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े एक अहम नेता विनय कटियार ने दो दिन पहले एक अखबार को दिए इंटरव्यू में कहा कि अयोध्या की तरह ही मथुरा और काशी में ऐतिहासिक भूल सुधार होनी है। ध्यान रहे अयोध्या आंदोलन के समय विश्व हिंदू परिषद का नारा था- अयोध्या तो झांकी है, मथुरा-काशी बाकी है।

भारत का एक पुराना मुद्दा पाक अधिकृत कश्मीर, पीओके को भारत में मिलाने का है। जम्मू कश्मीर विधानसभा में और लोकसभा में सीटें खाली रखी गई हैं कि पीओके का विलय भारत में होगा तो इन सीटों पर चुनाव कराया जाएगा। भाजपा के लिए यह भी बड़ा और भावनात्मक मुद्दा है। इसके अलावा चीन के साथ सीमा पर चल रहा टकराव भी है, जिसे हमेशा के लिए खत्म करने का प्रयास किया जा सकता है। कुल मिला कर भाजपा के पास धार्मिक, राजनीतिक, सामरिक और राष्ट्रीयता के कई मुद्दे हैं, जिन पर आगे राजनीति हो सकती है। ये सारे मुद्दे बरसों की चर्चाओं से लोगों के मानस में बैठे हुए हैं। भले अनुच्छेद 370 या राम मंदिर की तरह इनकी बड़ी भावनात्मक अपील नहीं है पर इनका भी महत्व है।

इस समय बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी कमान में भाजपा ऐसे मुकाम पर खड़ी है, जहां वे संतोष के साथ कह सकते हैं कि उन्होंने अपने सारे वादे पूरे कर दिए। भाजपा ने अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभा दी। यह मामूली बात नहीं है। विपक्ष दशकों से इस बात के लिए भाजपा का मजाक बनाता रहा था कि मंदिर निर्माण का क्या हुआ! भाजपा का नारा था कि ‘मंदिर वहीं बनाएंगे’ तो विपक्ष के नेता तंज करते हुए इसमें जोड़ते थे कि ‘तारीख नहीं बताएंगे’। अब तारीख बताने की जरूरत नहीं है क्योंकि मंदिर निर्माण शुरू हो गया। इसी तरह विपक्ष कुछ भी कहता रहे, अनुच्छेद 370 भी खत्म हो गया। जिन लोगों को राजनीति से या भाजपा के एजेंडे से ज्यादा मतलब नहीं है उन्होंने भी संतोष की सांस ली होगी कि चलो ये सारे अध्याय खत्म हुए। तभी सवाल है कि इसके आगे अब क्या?

क्या ये सारे काम करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शांति के साथ बैठ जाएंगे कि उन्होंने अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभा दी, अब जो होना है सो हो? ऐसी उनकी फितरत नहीं है। वे शांति से बैठने की बजाय नए एजेंडे पर काम शुरू कर सकते हैं या कुछ बचे हुए पुराने एजेंडे को नए सिरे से धार दे सकते हैं। पर यह काम हमेशा मुश्किल होता है। हर व्यक्ति या राजनीतिक दल का इतिहास ऐसा है कि उसे अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभाने के बाद नेपथ्य में जाना होता है। कांग्रेस आज अप्रासंगिक हुई है तो कारण यहीं है कि उसने अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभा दी है और उसके बाद समय की जरूरत के हिसाब से उसने खुद को रिइन्वेंट नहीं किया। वह अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभाने के बाद इस मुगालते में रही कि इसी से उसका काम हमेशा चलता रहेगा। तभी उसने खुद को रूटीन के काम में ढाल लिया। वह इस बात को नहीं समझ पाई कि रूटीन के काम लोगों को बहुत आकर्षित नहीं करते हैं, भले उनसे उनका भला ही क्यों न हो होता हो!

इस मामले में लालू प्रसाद की मिसाल दे सकते हैं। उन्होंने 15 साल तक सामाजिक न्याय की राजनीति की। वे दलित, पिछड़े, अकलियत के मसीहा बने और उनको आवाज देने की राजनीति करते रहे। जब तक वे इस छवि में रहे तब तक उनको वोट की चिंता नहीं करनी पड़ी। परंतु केंद्र में रेल मंत्री बनने के बाद उन्होंने जाति व धर्म के भावनात्मक मुद्दे को काफी हद तक छोड़ दिया। वे रूटीन के काम में लग गए। उनको इस बात का चस्का लग गया कि वे रेलवे का कायाकल्प करेंगे। वे हार्वर्ड और आईआईएम में लेक्चर देने लगे औऱ उधर बिहार में लोगों को लग गया कि लालू प्रसाद अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभा चुके हैं और अब बिहार को इसके आगे ले जाने के लिए नए चेहरे की जरूरत है। सो, लोगों ने नीतीश कुमार को चुन लिया।

इस मामले में लोगों की आकांक्षाएं अलग ही तरह से काम करती हैं। वे जिससे बहुत ज्यादा संतुष्ट हो जाते हैं उसे ही हटा देते हैं। उन्हें हमेशा कुछ नए की जरूरत होती है। तभी नरेंद्र मोदी और भाजपा के सामने एक बड़ी चुनौती है। वे भी अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभा चुके हैं। व्यापक हिंदू समाज गदगद है। सब संतुष्ट हैं कि नरेंद्र मोदी ने वह कर दिया, जो कोई नहीं कर सका था। उन्होंने सारे वादे पूरे कर दिए। इसके बाद मोदी के लिए नया एजेंडा तय करना और उस पर लोगों को उद्वेलित करना बहुत आसान नहीं होगा। दूसरा खतरा यह है कि अगर वे रूटीन की राजनीति पर उतरते हैं यानी जैसे लालू प्रसाद ने रेलवे का विकास शुरू किया था उस तरह मोदी देश का विकास शुरू करते हैं तो हो सकता है कि लोग बोर हो जाएं। वे कुछ नए, रोचक और रोमांचक एजेंडे की तलाश में दूसरे की ओर देखने लग सकते हैं। मोदी इस बात को समझते हैं इसलिए उम्मीद करनी चाहिए कि वे लोगों को बोर नहीं होने देंगे।

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