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आंतक से लड़ना बिना आंतक के बीज को मिटाए!

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America’s fight against terrorism अमेरिका क्यों इस्लाम से हार रहा?-2 : पच्चीस वर्षों में इस्लाम से पश्चिमी सभ्यता को ये तीन अनुभव- 9/11 को न्यूयार्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला, नवंबर 2015 में पेरिस के बैटाक्लां हॉल पर हमला और 15 अगस्त 2021 को काबुल पर तालिबानी कब्जा। तीनों का अर्थ? जाहिर है पश्चिमी सभ्यता की आन-बान-शान, उसके जीने के तौर-तरीकों व कायदो और महाशक्ति की हैसियत को इस्लाम द्वारा खारिज करना। सोचे अल कायदा, इस्लामी स्टेट और तालिबानियों पर! ये जंगली, वहशी, बर्बर और खानाबदोश लोग न केवल सिरमौर पश्चिमी सभ्यता को छकाते हुए बल्कि पौने दो अरब मुसलमानों के भी हीरो!  तभी तो ऑक्सफोर्ड में पढ़े, एटमी महाशक्ति देश के प्रधानमंत्री इमरान खान ने दुनिया को समझाया है कि सांस्कृतिक गुलामी की बेड़ियों को तोड़ना बहुत मुश्किल है। इसलिए अफगानिस्तान में जो हुआ है वह गुलामी की जकडनों से आजादी है।

जाहिर है वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में विमान घुसाते हुए पढ़े-लिखे इंजीनियर-पायलट हो,  ब्रिटेन-योरोप मे पले-बढ़े आईएस के नौजवान लडाके हो या फ्रांस में शिक्षक का गला काटने वाला चेचेन्याई मुसलमान या अफगानिस्तान में एके-47 बंदूके लहराते हुए तालिबानी सभी की अमेरिका से नफरत दो टूक है। इनका वैश्विक मैसेज है कि हमें विश्व समाज में, उसकी मुख्यधारा, उसके जीवन जीने के कायदो में, वसुधैव कुटुम्बकम् और सर्वधर्म समभाव में नहीं रहना है। उन्हे बहुरंगी समाज, बहुसंस्कृतिवाद, बहुवाद में नहीं बल्कि इकरंगी इस्लामी संस्कृति में जीना पसंद है इसलिए दारूल इस्लाम बनाना है!

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यह मैसेज अमेरिका और पश्चिमी सभ्यता के लिए नया नही है। यह कोई 20 वीं-21 वीं सदी में बनी इस्लामी चुनौती नहीं है बल्कि सदियों पुरानी चुनौती है। पच्चीस साल, पचहत्तर साल का  अनुभव याद करें या 1095 से 1291 में ईसाईयों के इस्लाम से हुए क्रुसेड़ का इतिहास खगाले, इस्लाम का पहले भी पश्चिमी सभ्यता से सर्घष था और आज भी है। इस्लाम की यह जिद्द, यह प्रतिस्पर्धा स्थाई है कि उसके पैगंबर ही आखिरी ईश्वर अवतार है और उनकी आसमानी किताब, कुरानशरीफ के अनुसार उसे दुनिया बनानी है।

उस नाते इस्लाम बनाम पश्चिम का संघर्ष लगातार और दो टूक है। ईसाई धर्म और इस्लाम का बाल काल हो या मध्य काल या आधुनिक काल, हर वक्त में इस्लाम की तलवार खींची रही है और वह सर्वाधिक पश्चिमी सभ्यता पर तनी रही है। कई जानकारों का मानना था कि दुनिया के गांव में बदलने, भूमंडलीकृत विश्व और विश्व समाज के विकसित होने से बर्बर खानाबदोश खत्म होंगे। उनका जंगलीपन खत्म होगा। यातायात, संचार के साधनों से दुनिया गांव बनी है और परस्पर निर्भरता व ज्ञान-विज्ञान, वैज्ञानिकता और आधुनिकता का बोलबाला है तो जिहादी जुनून नहीं चल सकता। अमेरिका की बनवाई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था से अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा में मानवता सुरक्षित है।

मगर क्या ऐसा है? क्या अमेरिका की नंबर एक वैश्विक सभ्यता लगातार खानाबदोश जंगली लड़ाई की चुनौती के आगे लाचार, बेबस और हारती हुई नहीं है?

आज सच्चाई है कि मानव विकास ने इस्लाम की चुनौती को वैश्विक बनाया है। इस्लाम को संचार, विकास और आधुनिकता से वैश्विक प्रसार और भाईचारे के नए औजार मिले है। दुनिया भर का मुसलमान इस नैरेटिव में जीता हुआ है कि सिर्फ वे ही सच्चे है। ये मानते है कि इस्लाम को बदनाम करने के लिए तमाम दूसरे धर्म साजिश रच इस्लाम पर ठीकरा फोड़ते है। सीआईए-मोसाद कभी न्यूयार्क, पेरिस में हमले कराते है तो कभी पेशावर और कभी काबुल में ताकि इस्लाम बदनाम हो!  सोचे, अज्ञानता-मूर्खताओं और खामोख्याली में कैसा यह जीना। सौ साल पहले इस्लाम के जिलियोट्स (Zealot’s), उन्मादी-कट्टर याकि वहाबी जुनूनी केवल अरब इलाके में थे अब वे दुनिया में फैले है। ऐसे ही हेरोडियन (Herodian) याकि जिससे संर्घष है वैसा ही बनकर तुर्की जैसे पढ़े-लिखे-आधुनिक प्रतिस्पर्धी मुसलमान भी अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस सभी और पसर गए है। इस्लाम बतौर वैश्विक नस्ल वह आकार-प्रकार बना चुका है जिसकी बुनावट का बीज मंत्र पश्चिम से नफरत और आर-पार की लड़ाई का निश्चय है।

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दूसरे शब्दों में दुनिया एक गांव, एक वैश्विक समाज, बहुवाद, संचार-सोशल मीडिया-आवाजाही के विकास के वैभव में मानवता विकसित है तो इससे उलटे इस्लाम अपनी जिद्द से दुनिया को तालिबानी बनाता हुआ है। मानवता बनाम तालिबानी संर्घष 21वीं सदी का सत्य है। इससे पश्चिमी सभ्यता घायल है और लड़ाई लगातार नए-नए आयाम पाती जा रही है। वह अब वैश्विक जिहाद बनाम आंतक के खिलाफ युद्ध की शक्ल लिए हुए है।

हां, इस सत्य को कोई नकार नहीं सकता कि तालिबानी हो या सर्वहारा मुसलमान या आधुनिकता से रंगे और बने जिलियोट्स और हेरोडियन मिजाज वाले सभी तरह के मुसलमान पृथ्वी के अब तक के विकास में  मानवता की कुल उपलब्धि, जीवन जीने के आधुनिक तौर-तरीकों, कायदो से नफरत करते है। सबको पश्चिमी सभ्यता, दूसरे धर्मो और सभ्यताओं के साथ सहजीवन नापंसद है। इनके लिए लिव-इन रिलेशन, सहजीवन जलालत है। ऐसे जीवन से ये विद्रोह और मुक्ति चाहते है। तभी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के इस वाक्य की गहराई को बूझे कि सांस्कृतिक गुलामी की बेड़ियों को तोड़ना बहुत मुश्किल है इसलिए अफगानिस्तान में जो हुआ है वह गुलामी की जकडनों से आजादी है।

उस नाते इमरान खान और तालिबानियों व इराक-सीरिया-अफ्रीका गए ब्रिटेन, योरोप के पढ़े-लिखे इस्लामी स्टेट के जिहादी नौजवानों की सोच में मकसद की समानता है। सभी यह मानते हुए है कि आसमानी किताब, कुरान का लक्ष्य, आदर्श और उसके सुझाए जीने के तरीके की सर्वोच्चता में पूरी दुनिया को दारूल-इस्लाम में कनवर्ट करना है।

तब दूसरे धर्मावंलबी, दूसरी सभ्यताएं क्या करें?  इसके आगे अमेरिका, पश्चिमी सभ्यता और बाकि सभ्यताओं की काट क्या है?

इसका फिलहाल जवाब नहीं है! इसलिए कि पश्चिमी सभ्यता का रहनुमा अमेरिका 9/11 से ले कर 15 अगस्त 2021 के काबुल फॉल तक के 21 सालों में यह तय करने, सोचने का साहस नहीं बना पाया है कि आंतक को जन्म देने वाले विचार और बीज को मिटाए बिना क्या आंतकवाद खत्म हो सकता है? अमेरिका बंधा हुआ हैं मानवता, इंसानियत, लोकतंत्र, निज आजादी, बहुलवाद की सभ्यतागत पश्चिमी बुनावट में। तभी आश्चर्य नहीं जो अफगानिस्तान से भागते हुए भी अमेरिका-ब्रिटेन इस्लाम में रचे-पके अफगान रिफ्यूजियों पर दया में उन्हे अपने यहां लिवा ला रहा है! ऐसा यह जानते हुए भी है कि रिफ्यूजी पांच दफा नमाज के साथ आसमानी किताब के कहे में पाबंद जीवन जीने वाले है!

क्या मैं गलत लिख रहा हूं? अमेरिका 21 वर्षों से इस मूर्खता में है जो इस्लाम के बिना इस्लामी आंतकवाद से लड़ रहा है! पश्चिमी सभ्यता क्रूसेड के वक्त से जानती-समझती है कि इस्लाम की बुनावट के ऑपरेशन के बिना सभी धर्मों के साथ-साथ जीने, सहजीवन और उन्नत मानवीय मूल्यों का मानव जीवन संभव नहीं है। 9/11 और अल-कायदा, तालिबान के जन्म का सत्य, उसकी जड़, उसका बीज इस्लाम से है तो उस पर अमेरिका और पश्चिमी सभ्यता ने क्या किया हैं? वह कैसे सभ्यता के संर्घष, आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को बिना लड़ाई की जड़ और बीज पर ध्यान दिए लड़ रहा है?  क्या सोचकर अमेरिका-ब्रिटेन ने अफगानिस्तान में लोकतंत्र, संसद, महिलाओं को अधिकार जैसे उपाय सोचे जबकि अफगानिस्तान की जर-जमीन के सत्य में वे बीज है जिनसे बबूल की खेती होगी न कि आम की।

क्या मैं गलत लिख रहा हूं? अमेरिका को 9/11 के बाद अफगानिस्तान जा कर अल कायदा, ओसामा बिन लादेन या कि आंतकवाद के खिलाफ लड़ना था तो सऊदी अरब के उस वहाबी कट्टर बीज को क्या खत्म नहीं करना था जिससे लादेन और तालिबान बने है? लेकिन अमेरिका ने वह नहीं किया तो न अफगानिस्तान में तालिबानी खत्म हुए, न अफ्रीका, पश्चिम एसिया के रेगिस्तानी बीहड़ों में अल कायदा, इस्लामी स्टेट का कबीलाई जज्बा खत्म है!

तभी 21 वर्षों से लगातार वह हो रहा है जो इतिहास में सभ्यताओं के उत्थान और पतन की दास्तां है। आगे कल। (जारी)

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By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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