America's 75 year mistake! अमेरिका की 75 साला गलती
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अमेरिका की 75 साला गलती!

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America’s 75 year mistake! अमेरिका क्यों इस्लाम से हार रहा?-1 भला कैसे? क्यों कर इस्लाम को एक विकसित सभ्यता और बुद्धि समझ नहीं पा रही? कैसे अमेरिका ने माना कि उसने अपनी जिस सोच में अफगानिस्तान में सेना और व्यवस्था बनाई है उससे अफगानी मुसलमान के दिल-दिमाग में इस्लाम सुधरा व आधुनिक हुआ होगा? उनमें खानाबदोश-जड़ बुद्धि के तालिबान से लड़ने की जिद्द और साहस है। उफ! इस्लाम के आगे पश्चिमी सभ्यता ऐसी नादान और नासमझ! हां, दूसरे महायुद्ध के बाद 1945 से दुनिया की एकमेव स्थायी महाशक्ति अमेरिका (पश्चिमी सभ्यता) ने 75 सालों में जितना धोखा इस्लाम से खाया है, वह उससे जितना घायल हुआ है वैसा किसी से नहीं! यासिर अराफात से लेकर खुमैनी, सद्दाम, ओसामा बिन लादेन, बगदादी और तालिबान से लड़ाई में अमेरिका के जो अनुभव हैं वे क्या मामूली हैं? 75 वर्षों में पश्चिमी सभ्यता साम्यवाद, शीत युद्ध में जीती है तो इस्लाम से लगातार धोखा खाते हुए घायल व जर्जर हुई है। इससे न केवल लंदन, पेरिस, बर्लिन, वाशिंगटन याकि पश्चिमी सभ्यता के जीने के तरीकों-कायदों पर तलवार है, बल्कि यह किंकर्तव्यविमूढ़ता भी है कि करें तो क्या करें!

सोचें, क्या अजब बात जो राष्ट्रपति बाइडेन, बोरिस जॉनसन, मर्केल काबुल से भागते हुए भी अफगान मुसलमानों को अपने यहां शरण दे रहे हैं! वे मुसलमान, जिनके जीने और सोचने के तरीके में हिज्ब, बुरका, पांच वक्त नमाज और इस्लाम पहले है। ये अमेरिका, ब्रिटेन के घर में वहीं सोच तो लिए हुए होंगे जो तालिबानी अफगानिस्तानी का जीवन है। इन अफगानों या पश्चिम एशिया के सीरियाई, इराकी, लीबियाई मुस्लिम शरणार्थियों से लंदन, पेरिस, बर्लिन में अंततः क्या ईसाई बनाम मुस्लिम संघर्ष नहीं सुलगेगा?

Joe Biden said on the situation in Afghanistan, said - Criticisms will not make a difference, the army should be ashamed...

कह सकते हैं भूमंडलीकृत दुनिया में सांझा चूल्हा, सह-अस्तित्व मजबूरी है। इस्लाम भले जड़ बुद्धि हो, मध्यकालीन हो, तालिबानी हो, दारूल-इस्लाम बनाना चाहता हो लेकिन पश्चिमी सभ्यता अपने उस अंदाज, अहसास, तौर-तरीकों, कायदों को कैसे भूल सकती है, जिससे वह दो सौ, पांच सौ सालों से वैभव, अमीरी भोगते हुए है। वह स्वतंत्रता, समानता, उदारता, लोकतंत्र, आधुनिकता में मंगल में बस्ती बसाने की तरफ बढ़ रही है तो पृथ्वी पर बाकी सभ्यताओं, धर्मों को भी मानवता में ढालने की कोशिश करते रहना चाहिए। पश्चिमी सभ्यता भला क्यों इस्लामी सभ्यता की तरह व्यवहार करे?

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बहुत अच्छी बात! लेकिन यह तो न हो कि इस कोशिश में इस्लाम और कट्टर बनता जाए। अपरिवर्तनीय हो जाए इस सत्य से कि उसने अमेरिका को हरा दिया! पश्चिमी सभ्यता फेल, पापी, पतनगामी और दुनिया में अंततः इस्लाम की, तालिबानी तलवार की जीत।

तभी सवाल है कि आधुनिक वक्त के 75 सालों में पश्चिम ने इस्लाम को बदला, सुधारा है या उसे कट्टर, तालिबानी बनाते हुए है?

सचमुच सोचें, 9/11, ओसामा बिन लादेन, इराक, बगदादी, अफगानिस्तान के पिछले इक्कीस सालों का अनुभव क्या नैरेटिव, मनोदशा बनवा बैठा है? क्या यह नहीं कि इस्लाम के आगे बाकी सभी सभ्यताएं लाचार हैं, फेल हैं। कुछ भी हो अफगानिस्तान में अमेरिका फेल है। पुतिन चेचेन्या में फेल हैं। चीन शिनजियांग में फेल है तो भारत कश्मीर घाटी में फेल है! कहीं भी सहजता, उदारता, आधुनिकता, मानवता, साझे चूल्हे की साझी विरासत में इस्लाम के साथ जीना संभव नहीं है। या तो जोर-जबरदस्ती-डंडे वाला जीवन या आंतक की आबोहवा!

पचहत्तर सालों में पश्चिमी सभ्यता सचमुच इस्लाम को बदल नहीं पाई। उलटे लगातार वे स्थितियां बनती गई हैं, जिससे इस्लाम का तालिबानीकरण हुआ है। कभी अफगानिस्तान में भी राजा जहीर शाह या ईरान में शाह पहलवी और मिस्र में समाजवादी-राष्ट्रवादी सादात, इंडोनेशिया में सुकार्णो, इथियोपिया में हेली सेलसेई राजा हुआ करते थे तो मध्य एशियाई देशों में साम्यवाद था, इन सबसे मुस्लिम आबादी अलग-अलग विचारों, ख्यालों में जीवन जीते हुई थी लेकिन सन् 2021 में क्या स्थिति है? हर तरफ मुसलमान आज इस गर्व, अहंकार में है कि अमेरिका भागा! इस्लामी भाईचारे के ख्यालों में मुसलमान अलग ही दुनिया बनाते हुए हैं। तभी आश्चर्य नहीं जो इमरान खान तालिबानी जीत को ‘गुलामी की बेड़ियों से आजादी’ बता रहे हैं तो तुर्की के अर्दोआन ने रूस के पुतिन को समझाया कि तालिबान को गले लगाओ। हर इस्लामी देश मन ही मन अमेरिका के भागने से वैसे ही अपनी जीत देख रहा है जैसे आम मुसलमान तालिबान के हवाले यह घमंड लिए हुए है कि देखो अफगानिस्तान और इस्लाम की ताकत को जो अमेरिका को बोरिया-बिस्तर बांधकर भागना पड़ा। हां, सामान्य बात नहीं जो महबूबा मुफ्ती ने भारत राष्ट्र-राज्य को ललकारते हुए कहा कि जिस दिन सब्र की दीवार टूट जाएगी, तुम परास्त हो जाओगे! ईरान हो या सऊदी अरब या तुर्की या मलेशिया मतलब इस्लामी देशों के संगठन का हर देश, हर राष्ट्रपति अमेरिका और पश्चिमी देशों की हार से खुश हो मन ही मन तालिबान के साथ है।

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इस सच्चाई को नकारना मूर्खता में वैसे ही जीना है, जैसे अमेरिकी दिमाग काबुल के पतन से पहले सोचता हुआ था।… सवाल बार-बार उठता हुआ है कि अमेरिकी दिमाग को हो क्या गया है जो इस्लाम को समझने में हर तरह से नाकाम। कैसे वाशिंगटन के तमाम थिंक टैंकों मतलब पेंटागन, सीआईए, विदेश मंत्रालय, ट्रंप-बाइडेन प्रशासन की बुद्धि ने इस्लाम की अफगानिस्तान हकीकत का एबीसी नहीं जाना-समझा। क्यों यह माना कि उसने काबुल में जो बनाया है उससे अफगान मुसलमान सुधरा-बदला हुआ है। उसकी बनवाई तीन लाख लोगों की सेना, सेना को दिए आधुनिक हथियारों, संसद-निर्वाचित सरकार, स्कूल-कॉलेज, लड़के-लड़कियों की पढ़ाई और पुरूष-महिला समानता, स्वतंत्रता व आधुनिकता, विकास, इमारतें, सड़क-बिजली और सुविधाओं से मुसलमानों का सोचना बदला है इसलिए जब तालिबानी काबुल के दरवाजे पहुंचेंगे तो अफगान उनके विरोध में सड़कों पर उतर पड़ेंगे। सेना लड़ेगी!

ऐसी मूर्खतापूर्ण खामोख्याली! सोचें, अनुभवों के बावजूद पश्चिमी सभ्यता ऐसी मूर्खताओं में जीती हुई! मेरा यह निष्कर्ष किससे प्रमाणित है? तो जवाब है पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान से। हां, वे इमरान खान जो पढ़े-लिखे हैं, लंदन याकि पश्चिमी सभ्यता में रमने और उसका मजा लेने वाले, वैश्विक पहचान लिए खिलाड़ी और जिन्होंने यहूदी महिला से शादी की उन्होंने तालिबान की जीत पर क्या बोला है? कहा है- अफगान गुलामी की बेड़ियों से आजाद हुए! (It is harder to throw off the chains of cultural enslavement. What is happening in Afghanistan now, they have broken the shackles of slavery.)  तो अमेरिका-ब्रिटेन याकि पश्चिमी सभ्यता के अफगानिस्तान में विकास, उसकी कोशिशों, प्रयोगों पर इमरान का लबोलुआब है- गुलामी की जंजीरें!

यह है एक आधुनिक, ग्लोबलाइज्ड मुसलमान के दिल-दिमाग में पैठे इस्लाम के भावों की अभिव्यक्ति। अमेरिकी और पश्चिमी सभ्यता पर औसत मुसलमान की राय! ध्यान रहे तथ्य कि इमरान खान ने लंदन की आजाद ख्याल यहूदी महिला से शादी कर, उनसे फिर तलाक ले कर बाद में बुरका बंद धमांर्ध मुस्लिम महिला से शादी की।

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इसलिए इमरान खान की मिसाल में लंदन के मेयर सादिक अली बनाम ब्रितानी प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन या सऊदी अरब के प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान बनाम अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन के मिजाज और उसकी गहराई, असलियत की थाह ले कर पश्चिमी सभ्यता बनाम इस्लामी सभ्यता की सोच के फर्क को बूझें। मुसलमान कहीं का कोई भी हो वह पहले खुदा का है जबकि पश्चिमी नेता पहले मानवता में विश्वास और व्यवहार बना साझे चुल्हे के भरोसे में जीते हैं। मतलब 75 सालों से इस्लाम पश्चिमी सभ्यता, अमेरिका, यूरोप को उल्लू बनाता हुआ है और वे उल्लू बनते हुए है। इसे भारत के 1947 के अनुभव से भी समझ सकते हैं। सत्य है कि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री चर्चिल, एटली, लार्ड माउंटबेटन याकि ब्रितानी तासीर ने हिंदुओं, गांधी-नेहरू-पटेल के मुकाबले मुसलमान, मोहम्मद अली जिन्ना व पाकिस्तान बनवाने का रूझान ज्यादा दिखलाया था। लेकिन 75 सालों में ब्रिटेन का भारत बनाम पाकिस्तान क्या अनुभव रहा? क्या उसने पाकिस्तान से कई तरह के धोखे नहीं खाए?

तब सवाल है क्यों कर पश्चिमी सभ्यता और इस्लाम में 75 वर्षों में परस्पर केमिस्ट्री ज्यादा रही? एक कारण शायद एक ही इलाके से, एक ही मूल के अब्राहमिक धर्म से यहूदी, ईसाईयत, इस्लाम तीनों के निकले हुए होने का है। खानपान में समानता का है तो संगठित धर्म की सरलता का भी शायद रोल हो। लेकिन बड़ा कारण दूसरे महायुद्ध के बाद साम्यवाद, सोवियत संघ से पश्चिम के झगड़े का है। अमेरिका, ब्रिटेन याकि पश्चिमी सभ्यता के पूंजीवादी वैभव के लिए कम्युनिस्ट दुनिया नंबर एक खतरा थी। तभी लंदन, वाशिंगटन, पेरिस के विचारवानों ने धर्म विरोधी कम्युनिज्म के खिलाफ इस्लामी दुनिया को नैसर्गिक साझेदार, सांझा चुल्हा समझा।

सो अमेरिका की ताकत एक तरफ साम्यवाद से लड़ने में खपी तो दूसरी और पश्चिम एशिया, इस्लामी देशों को बनाने, पटाने और उनका भरोसा बनाए रखने में जाया हुई! विडंबना है जो 75 सालों के आधुनिक इतिहास में अमेरिका (पश्चिमी सभ्यता) ने साम्यवाद को हराया लेकिन इस्लामियत और चीन को ऐसा बना डाला कि दोनों उसके लिए आगे भस्मासुर साबित हों तो आश्चर्य नहीं होगा। हैरानी की बात है जो अमेरिका में रीति-नीति, ज्ञान-विज्ञान सबमें निर्णायक हैसियत में होते हुए भी यहूदी दिमाग ने अमेरिकी बुद्धि में यह सच्चाई क्यों नहीं पैठाई कि ईसाईयत का इतिहासजन्य सभ्यतागत संघर्ष, क्रूसेड जब इस्लाम से है तो इस्लाम को पालना-पोसना-बढ़ाना भविष्य में घातक होगा! पहली और सर्वोच्च प्राथमिकता इस्लाम को डंडे से बदलवाने और सुधरवाने की हो न कि सऊदी अरब की वहाबी कट्टरता को बरदाश्त करने की!

मैं भटक गया हूं। इमरान खान पर लौटें। आधुनिकता की शोशेबाजी में इमरान खान ने लंदन में जब यहूदी-क्रिश्चियन एलिट पर जादू किया, यहूदी जेमिमा गोल्डस्मिथ से शादी की तो तब वहां क्या किसी को अनुमान था कि इमरान खान जब प्रधानमंत्री बनेंगे तो वे पाकिस्तान में स्त्री-पुरूष रिश्ते इस्लामी कायदे में चाहेंगे और अफगानिस्तान में पश्चिमी सभ्यता के प्रयासों पर यह हथौड़ा चलाएंगे कि तालिबानियों ने गुलामी की जंजीरों को तोड़ा!

हिसाब से पश्चिमी सभ्यता की हर राजधानी, रूस के पुतिन और चीन के शी जिनफिंग सभी को इमरान खान के वाक्य को नोट करके इस्लाम की इस सोच को मन में पैठा लेना चाहिए कि इस्लाम पृथ्वी पर तब तक अपने को जंजीरों में जकड़ा हुआ मानेगा जब तक दूसरे धर्मों, सभ्यताओं के साथ उसे जीना है। मुसलमान कोई भी, कैसा भी हो वह अपने तौर-तरीकों, अपने कायदों में जीने की जिद्द लिए हुए है। वह कसम खाए है और दिन में पांच दफा वह अपने खुदा को विश्वास दिलाता है कि जैसा उन्होंने कहा वैसे ही जी रहा है! इमरान खान या लंदन का मेयर सादिक अली कितने ही आधुनिक हों, साझे चूल्हे की रोटी खा रहे हों लेकिन दिल और दिमाग में सभी इस तालिबानी जिद्द को लिए हुए हैं कि उन्हें अपने हिसाब से जीना है!

क्या मैं गलत लिख रहा हूं? यदि ऐसा है तो अमेरिका इसे समझने को तैयार क्यों नहीं? (इस पर कल)

(अफगानिस्तान के घटनाक्रम ने ध्यान भटकाया है तो कश्मीर सीरिज रोक रहा हूं। अनुच्छेद 370 के बाद की कश्मीर दशा-दिशा पर दो-तीन दिन बाद।)

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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