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जंगली ही खोदते हैं सभ्यताओं की कब्र!

Afghanistan

अमेरिका क्यों इस्लाम से हार रहा? -3 :  चट्टान जैसी अटल सभ्यताएं और विशाल साम्राज्य कैसे खानाबदोश घुड़सवारों की बर्बरता से खत्म हुए, इसकी दास्तां इतिहास में भरी हुई है। इतिहास में खैबर दर्रे से दिल्ली आए हमलावरों की दास्तां है तो आज खैबर से लौटता हुआ अमेरिका है! दोनों वक्त का फर्क है। बावजूद इसके कॉमन सवाल हैं क्या शक्ति, स्वास्थ्य, अमीरी, प्रगतिशीलता, वैभव में सिंध के तब के हिंदू राजा और आज का अमेरिका क्या जंगली घुड़सवारों या आज के तालिबान से कमजोर थे या हैं? तब दोनों महान सभ्यताओं को घायल करने वाला कौन? क्या लुटेरे, वहशी और जंगली जुनूनी हमलावर नहीं?

कैसे ऐसा जो सिरमौर सभ्यताएं, महाशक्ति देश खानाबदोश जिहादियों से घायल और पतनगामी दिशा पाते हैं? वजह है सभ्यताओं की अंदरूनी जर्जरता! हां, जब सभ्यताएं ताकत और वैभव से लकदक होती हैं तो वह उसके भार में धंसी होती है। नेतृत्व अपने आपको भगवान समझता है तो प्रजा झूठ, गलतफहमियों, आरामपरस्ती में ताकत का जंगलीपना, किलिंग इंस्टिंक्ट खो बैठती है। वक्त की चुनौतियों का सत्यता से सामना नहीं होता। सभ्यता मौलिकता से, क्रिएटिविटी और दृढता से मुंहतोड़ जवाब नहीं देती। ईंट का जवाब पत्थर से नहीं, बल्कि जुमलों, मान्यताओं, नजरिए  में खानबदोश जंगलियों को जंगली नहीं इंसान समझा जाता है। यह मिजाज हिंदू राजा का तब था और 21 सालों से अमेरिका के बुश, ट्रंप व लेकर बाइडेन प्रशासन का है। अमेरिका रियलिटी की अनदेखी करके लड़ाई लड़ रहा है। पिछले 21 सालों से लड़ाई इस्लाम की छेड़ी हुई है जबकि अमेरिका आंतकवाद से लड़ रहा है। वह मानने को तैयार नहीं कि हमलावर बर्बर हैं, धर्मांध हैं, जिहादी जुनून लिए हुए हैं तो लड़ाई की बुनियाद के सत्य की गांठ बांध लड़ाई लड़े। लड़ाई न नरमी से लड़ी जा सकती है और न अधबीच छोड़ी जा सकती है। मगर अमेरिका, पश्चिमी सभ्यता पिछले 21 सालों से कैसे लड़ते हुए है? अपने जीने के संस्कारों से बने सिद्धांतों धर्मनिरेपक्षता, मानवता, इंसानियत, बहुलतावाद, भाईचारे जैसे जुमलों से वह दुविधा में है तो लड़ता हुआ भी है। मूर्खता की हद जो तालिबान, अफगानों में लोकतंत्र, समानता, मानवाधिकार खिलाते हुए वह जंग जीतने के ख्यालों में था। ऐसे में सभ्य समाज को हराना ही है। जीतेगा तो वहीं जुनूनी जो मरने को भी जन्नत मानता है!

 

यही ज्ञात इतिहास की 26 सभ्यताओं के उत्थान और पतन की दास्तां का लब्बोलुआब है! इतिहासकार आर्नल्ड टॉयनबी ने महान साम्राज्यों-सभ्यताओं के पतन का जिम्मेवार कारण वहशी, खानाबदोश, दुस्साहसी, बर्बर, जंगली देशों, कबीलों की किलिंग इंस्टिंक्ट को माना है। यह विश्लेषण पिछले पचास सालों के अनुभवों से भी सही प्रमाणित होता है। क्या इस्लाम ने अफगानिस्तान के जरिए पहले सोवियत संघ और अब अमेरिकी-पश्चिमी सभ्यता को नहीं भगाया? दोनों महाशक्तियां लड़ते हुए दुविधा में थी या नहीं कि करें तो क्या करें! वह भी तब जब सोवियत संघ (आज रूस) और अमेरिका दोनों चट्टान जैसे अटल और अनश्वर मानी जाने वाली महाशक्ति। दोनों के पास क्या नहीं था या क्या नहीं है? हथियार, तकनीक, ज्ञान-विज्ञान, पैसा, जिंदादिली और प्रगतिशीलता सब कुछ है।

ठीक विपरीत 9/11 हमला करने वाले खानाबदोश बिन लादेन, नवंबर 2015 को बगदादी के हमलावर और 15 अगस्त 2021 के कबीलाई तालिबानों का क्या बल जो अमेरिका-नाटो देश भागे या घायल हुए? जवाब है इस्लाम!

यह सत्य है या नहीं? यदि है तो 9/11 बाद के 21 सालों में जार्ज डब्लु बुश से ले कर बाइडेन को इस्लाम से लड़ना चाहिए था या नहीं? क्यों नहीं सत्य समझा और बोला कि जो झगड़ा है वह इस्लाम से है। ओसामा बिन लादेन, तालिबानी पठान यदि जिद्दी हैं, इनके कबीलाई जीवन के भाईचारे में जन्नत पाने का जिहादी जोश है तो वैसा इस्लाम से है।

इसलिए पश्चिमी सभ्यता जब खुद दुविधा के अपने जाल में फंसी व अटकी हुई है तो वह जीतेगी कैसे? राष्ट्रपति मैक्रों से जब पूछा गया कि फ्रांस क्या कर रहा है तो कहना था (अक्टूबर 2020 से पहले)- हम फ्रांस में क्या कर रहे हैं? इस्लाम के नाम के आतंकवाद से लड़ रहे हैं न कि इस्लाम से। (France is fighting terrorism that is being committed in the name of Islam, not Islam itself) क्योंकि इस देश को किसी धर्म से कोई समस्या नहीं है। पर उग्रवादी पढ़ाते हैं कि फ्रेंच का सम्मान न करें। महिलाएं नहीं हैं पुरूष के बराबर। छोटी लड़की के छोटे लड़के से बराबरी का अधिकार नहीं। इस सब पर मेरा दो टूक कहना है- इस देश में ऐसा नहीं चलेगा? (I tell you very clearly: Not in our country)।

कैसा मतिभ्रम! जीने का यह तरीका क्या आतंकियों, उग्रवादियों के चलते है?

सो, फ्रांस और यूरोपीय देश लड़ते हुए हैं लेकिन उग्रवाद, आतंकवाद से कि इस्लाम से! यों कईयों ने मस्जिद बनवाना रोका है तो हिज्ब, बुरके पर भी रोक। फ्रांस अगुआ इसलिए हुआ क्योंकि यूरोपीय देशों में मुसलमानों की सर्वाधिक आठ प्रतिशत आबादी फ्रांस में है। तथ्य यह भी कि सन 2013 के बाद फ्रांस के कोई 17 सौ मुस्लिम नौजवान इस्लामी स्टेट बनवाने के लिए इराक, सीरिया गए। फिर फ्रांस ही आजादी, समानता, धर्मनिरपेक्षता, भाईचारे की क्रांति से अमेरिका-पश्चिमी समाज का वैचारिक-सभ्यतागत गुरू! तो फ्रांस का इस्लाम बनाम पश्चिमी जीवन पद्धति के संघर्ष में खदबदाना स्वभाविक हैं। वह राष्ट्र-राज्य-सभ्यता की अपनी रचना के बुनियादी सिद्धांतों, वैल्यूज में देश में बाद में आए मुसलमानों और बाहरी इस्लामी नेताओं की इस जिद्द को कैसे माने कि फ्रांस को हमारे माफिक बनाओ! हमें इस्लाम जैसे जीने को कहता है वैसे हम जीएंगे। उसमें फ्रांस का संविधान, व्यवस्था, भावना दखल नहीं करे। वह अपने संविधान अनुसार आजादी (अभिव्यक्ति), समानता (स्त्री-पुरूष), भाईचारे (सर्वधर्म समभाव) को ले कर मुसलमान से न कहे कि बच्चों को आधुनिक स्कूली शिक्षा दिलाओ। धर्म-मस्जिद, मौलानाओं पर वैसे ही सोचो-विचारो जैसे मूल फ्रांसीसी नागरिक निज आजादी में पोप, पादरी पर सोचता, बोलता, लिखता और कार्टून बनाता है।

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सो, फ्रांस इस दबाव में जीता हुआ है कि वह मुसलमान की भावना में, उसके जीने के अंदाज में अपने को बदले। इस्लाम माफिक फ्रांस बने। मगर फ्रांस बदलने को तैयार नहीं। फ्रांस ने अभिव्यक्ति की आजादी (कार्टून) के अधिकार और राष्ट्रीय मूल्यों की जिद्द में इस दलील को सिरे से नामंजूर किया है कि वह धार्मिक (इस्लाम) भावनाओं का सम्मान करके अपने को बदले। अन्यथा नतीजा भुगते। मलेशिया के पूर्व प्रधानमंत्री महातीर के अनुसार- मुसलमानों को गुस्सा होने और लाखों फ्रांसीसियों को मारने का अधिकार है (have a right to be angry and to kill millions of French people)।

महातीर का वाक्य अक्टूबर 2020 में फ्रांस में आतंकी वारदातों के बाद तब आया जब राष्ट्रपति मैक्रों ने कुछ ही साल पहले नागरिकता पाए ट्यूनीशियाई, पाकिस्तानी, अफगानी लड़कों द्वारा फ्रांसीसी नागरिकों के गले, हाथ काट कर मारने की एक के बाद एक घटनाओं पर अपने मन का यह सत्य बोला-  फ्रांस झुकेगा नहीं (never give up)।… हम पर हमला हमारी वैल्यूज, आजादी के हमारे स्वाद पर है।… हम ऐसे ‘इस्लामी पृथकतावाद’ को समुदायों में गैर-कानूनी बनाएंगे जो नागरिक कानून पर धार्मिक कानूनों को प्राथमिकता देता है।…’इस्लामी पृथकतावाद’ फ्रांसीसी गणतंत्र में एक समानांतर व्यवस्था चाहता है, जिसमें उसके कानून सुपीरियर माने जाएं।…यह नहीं होने दिया जा सकता कि कोई धर्म ‘धर्मनिरेपक्षता’ पर हमला करके उसे बांधे कि हमारे साथ तो ऐसा व्यवहार रखो, वह लोकतांत्रिक आजादी में दखलंदाजी करे।…फ्रांस में इस्लाम को विदेशी प्रभाव से मुक्त होना होगा।…इस्लामिस्ट हमारा भविष्य छीनना चाहते हैं (Islamists want our future) मुस्लिम संगठनों (जैसे मस्जिदों के इमाम संगठन) को गणंतत्र के मूल्यों (the Republic’s values) के सम्मान के अनुबंध पर दस्तखत करने होंगे।….. इस्लाम वह धर्म है जो पूरी दुनिया में आज संकट का अनुभव लिए हुए है।…जरूरत है एन्लाइटमेंट वाले इस्लाम की। (Islam des Lumières, Islam of Enlightenment, आलोकित इस्लाम या ज्ञानोदित इस्लाम)।

Taliban

सोचें, राष्ट्रपति मैक्रों द्वारा इस्लामऔर इस्लामी पृथकतावादव इस्लाम को बदलने की जरूरत के जिक्र के साथ फ्रांस के नहीं झुकने के ऐलान पर। तभी इस्लामी देशों में उबाल! तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन ने मैक्रों को पागल करार दिया तो इमरान खान ने कहा- मैक्रों ने दुनिया के मुसलमानों की भावनाओं को आहत किया है। वे इस्लाम पर हमला कर समाज में धुव्रीकरण बनवा रहे हैं। ऐसे इग्नोरेंट, अज्ञानी सार्वजनिक बयान नफरत, इस्लामोफोबिया और उग्रवाद को फैलाने वाले हैं। यही नहीं कई देशों में मुस्लिम संगठनों ने फ्रांसीसी उत्पाद और फ्रांस के बहिष्कार का आह्वान किया।

इस सबके बीच का सत्य क्या इस्लाम की इस जिद्द से लड़ाई नहीं है कि इस्लाम नहीं बदलेगा मगर फ्रांस बदले! अमेरिका और पश्चिमी सभ्यता बदले! क्या यही 9/11 के दिन लड़ाई का चरित्र नहीं था? यदि था तो राष्ट्रपति बुश को सत्य नहीं बोलना था कि ओसामा बिन लादेन और तालिबानी सब सऊदी अरब के फैलाए इस्लामी बीजों की पैदायश है तो लड़ाई भी उससे है।

मगर क्या बोला गया? अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, पश्चिमी सभ्यता तब (अब भी) महाशक्ति होने के बावजूद यह बोलते हुए थे कि जंग आतंक के खिलाफ है न कि इस्लाम के खिलाफ! नतीजा क्या है? 9/11 को चोरी-छुपे जिहादियों ने न्यूयॉर्क में अमेरिकी वैभव के प्रतीक व्यापारिक टॉवर ढहाए और 21 साल बाद 15 अगस्त 2021 को अमेरिकी महासेना अफगानिस्तान से भागते हुए! पुराने-खत्म चेहरों की जगह इस्लामी देश बनाते वे नए तालिबानी चेहरे, जिनके हाथों पश्चिमी सभ्यता की कब्र खुदनी है। पश्चिमी जीवन, लोकतंत्र, आजादी, समानता सब काबुल में दफन! तभी इस्लाम से पश्चिमी सभ्यता के इस हश्र पर गौर करते हुए सोचें कि तानाशाह-बर्बर चीन क्या शिनजियांग में इस्लाम से ऐसे हार सकता है? (जारी)

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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