caste based census necessary जाति आधारित जनगणना क्यों जरूरी है
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जाति आधारित जनगणना क्यों जरूरी है?

caste based census necessary

Caste based census necessary यह फालतू का तर्क है कि जाति आधारित जनगणना से समाज में विभाजन बढ़ेगा। भारत का समाज पहले से जाति, उपजाति, गोत्र और धर्म के आधार पर बिल्कुल जमीनी स्तर तक बंटा हुआ है। यह विभाजन हजारों साल से जस का तस विद्यमान है। जब साम्राज्य बिखर गए थे और आधुनिक राष्ट्र राज्य का उदय नहीं हुआ था तब भी तमाम सामाजिक विभाजन के बावजूद भारत एक धार्मिक और सांस्कृतिक ईकाई के तौर पर अस्तित्व में था। आधुनिक राष्ट्र राज्य बनने के बाद राजनीतिक मकसद से कई बार सामाजिक विभाजन का प्रयास हुआ लेकिन कामयाबी नहीं मिली। जातियों में बंटा हुआ होने के बावजूद भारतीय समाज अपनी परंपराओं, धार्मिक मान्यताओं और सांस्कृतिक पहचान के धागे से बंधा हुआ है। यह बहुत बारीक धागा है, जो दिखाई नहीं देता है। विभाजन के बावजूद एकजुटता बने रहने का एक बड़ा कारण सभ्यता की निरंतरता भी है, लेकिन वह अलग से विश्लेषण का विषय है।

तभी कहा जा सकता है कि सामाजिक विभाजन के तर्क से जाति आधारित जनगणना को रोकने का कोई कारण नहीं है। उलटे जातियों की गिनती समाज में मौजूद कई किस्म की असमानताओं और विभाजन को खत्म कर देगी। भारत में आखिरी बार 1931 में जाति आधारित जनगणना हुई थी। उस समय देश की आबादी 30 करोड़ के करीब थी, जिसमें मौजूदा समय का पाकिस्तान और बांग्लादेश दोनों शामिल थे। उसी 90 साल पुराने आंकड़े के आधार पर अभी तक अंदाजा लगाया जाता है कि किस जाति और समूह की कितनी आबादी देश में है। सोचें, आजादी और देश के बंटवारे के बाद इस आंकड़े में कितना बदलाव आ गया हो सकता है! क्या उन बदलावों की वास्तविक तस्वीर देश के सामने नहीं आनी चाहिए?

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आजादी के बाद अलग अलग समय में सरकारों ने आर्थिक रूप से कमजोर समूहों को या सामाजिक रूप से हाशिए में रखी गई जातियों को ऊपर लाने के लिए एफरमेटिव एक्शन यानी सकारात्मक कार्रवाई की। इन कार्रवाइयों का लाभ वास्तविक जरूरतमंदों तक पहुंचे इसके लिए जरूरी है कि जाति के आधार पर जनगणना हो। मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने 2011 की जनगणना से ठीक पहले 2010 में सामाजिक-आर्थिक जनगणना के साथ जाति आधारित जनगणना कराने का फैसला किया था। हालांकि जनगणना के बाद जातियों का आंकड़ा जारी नहीं किया गया। सामाजिक और आर्थिक स्थिति के आंकड़े जरूर सार्वजनिक किए गए, लेकिन उससे जातियों की स्थिति का पता नहीं चल सका। बताया गया कि जातियों के आंकड़े में बड़ी गड़बड़ियां हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक उसके एक-चौथाई आंकड़े सही नहीं थे। देश के कुल 33 करोड़ घरों में से आठ करोड़ घरों के आंकड़े सही नहीं थे। इन्हें ठीक करने का प्रयास भी किया गया लेकिन बताया जाता है कि वह कोशिश कामयाब नहीं हुई।

सो, अगर यूपीए सरकार ने जातिवार आबादी और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थितियों का पता लगाने के लिए जनगणना कराई थी तो मौजूदा सरकार को भी इस तरह की गिनती कराने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए। आखिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछड़े, दलितों, आदिवासियों के हितों के चैंपियन हैं। उन्होंने हाल ही में अपनी मंत्रिपरिषद का विस्तार किया तो सबसे ज्यादा इस बात पर जोर दिया कि उनकी सरकार में पिछड़े, दलित और आदिवासियों की संख्या बढ़ी है। जब विपक्ष ने संसद में नए मंत्रियों के परिचय के समय हंगामा किया तो प्रधानमंत्री ने कहा कि कुछ लोगों को यह बात अच्छी नहीं लग रही है कि बड़ी संख्या में पिछड़े, दलित, आदिवासी मंत्री बने हैं। जाहिर है उन्होंने बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व करने वालों को सरकार में शामिल करके एक मैसेज दिया है। तभी क्या यह जरूरी नहीं है कि सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में दाखिले में बड़ी आबादी को उनकी संख्या के हिसाब से प्रतिनिधित्व मिले? या सरकार ने समाज के हाशिए पर के लोगों के लिए जो योजनाएं शुरू की हैं, उनका लाभ वास्तविक जरूरतमंदों तक पहुंचे?

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यह तथ्य है कि सरकार के सकारात्मक कदमों का लाभ वास्तविक जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच पा रहा है। मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने के बाद केंद्र सरकार अन्य पिछड़ी जातियों यानी ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण दे रही है। एक रिपोर्ट के मुताबिक केंद्र की सूची में 2,633 जातियां ओबीसी श्रेणी में दर्ज हैं, जिनमें से एक सौ जातियों ऐसी हैं, जिनको आरक्षण का सर्वाधिक लाभ मिल रहा है। यानी पिछड़ों में जो मजबूत जातियां हैं वे आरक्षण का फायदा ले रही हैं और पिछड़ों में अति पिछड़ी जातियों को इसका लाभ नहीं मिल रहा है। इसे ठीक करने के लिए ही बिहार में कर्पूरी ठाकुर ने आरक्षण के भीतर आरक्षण का फॉर्मूला बनाया था, जिसे नीतीश कुमार ने अपने हिसाब से लागू किया। उन्होंने ओबीसी के भीतर एमबीसी या ईबीसी यानी अतिपिछड़ी जातियों का एक समूह बनाया, जिन्हें आरक्षण के भीतर आरक्षण दिया गया। यह एफरमेटिव एक्शन का अगला कदम था। हालांकि यह कदम भी अनुमान पर ही आधारित है। आखिरी बार 1931 में हुए जातीय जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक देश में 52 फीसदी आबादी ओबीसी की है। इसी आंकड़े के आधार पर आज 90 साल बाद भी ओबीसी और एमबीसी आबादी का अनुमान लगाया जाता है।

अगर सरकार सामाजिक-आर्थिक स्थिति के साथ साथ जाति आधारित जनगणना कराती है तो सभी पिछड़ी जातियों की वास्तविक संख्या उसके सामने होगी और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति भी स्पष्ट होगी। तभी पता चलेगा कि हजारों जातियां ऐसी हैं, जो आजादी के 75 साल बाद भी सरकारों के सकारात्मक कदमों के लाभ से वंचित हैं और गिनी-चुनी जातियां ही इन सकारात्मक कदमों का फायदा उठा रही हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि पिछड़ों और वंचितों में जो गिनी-चुनी जातियां आरक्षण और दूसरे सकारात्मक कदमों का फायदा उठा रही हैं उनका निहित स्वार्थ है और वे ही जाति आधारित जनगणना के सबसे बड़े विरोधी भी हैं। वे जाति आधारित जनगणना नहीं चाहते और न जातियों के वर्गीकरण के पक्ष में हैं। कुछ चुनिंदा राज्यों में इसकी पहल की गई तो वहां हालात बेहतर हैं। जैसे तमिलनाडु में 69 फीसदी आरक्षण है, इसे बचाए रखने के लिए भी जाति आधारित जनगणना जरूरी है।

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केंद्र सरकार ने 2017 में जातियों के वर्गीकरण की दिशा में एक पहल की थी। सरकार ने जस्टिस जी रोहिणी की अध्यक्षता में एक आयोग बनाया था, जिसे जातियों के भीतर उप जातियों के बारे में एक रिपोर्ट बनानी थी। इस आयोग को तीन महीने में अपनी रिपोर्ट देनी थी लेकिन साढ़े तीन साल के बाद आयोग ने अपनी रिपोर्ट दी। इस साल फरवरी में आयोग ने ओबीसी के 27 फीसदी आरक्षण को चार उप श्रेणियों में बांटने का सुझाव दिया। इस आयोग ने कई साल के श्रमसाध्य काम के बाद जो तथ्य बताए वो हैरान करने वाले थे। आयोग ने 2018 में यह आकलन किया था कि उससे पहले के पांच साल में केंद्र सरकार ने ओबीसी श्रेणी के एक लाख 30 हजार लोगों को नौकरी या दाखिले में आरक्षण दिया था। इनमें 97 फीसदी लोग सिर्फ 25 फीसदी जातियों के थे। आयोग ने यह भी कहा कि 983 यानी केंद्रीय सूची की एक-तिहाई ओबीसी जातियां ऐसी हैं, जिनको इस आरक्षण का कोई फायदा नहीं मिला। ध्यान रहे केंद्र की सूची के अलावा राज्यों की अलग अलग सूची होती है, जिनमें स्थानीय स्तर पर कमजोर जातियों को शामिल किया जाता है।

बहरहाल, सोचें यह कैसी विडंबना है, कैसी असमानता है और कैसा भेदभाव है, जो सरकार के सकारात्मक कदमों का, जिनको सबसे ज्यादा फायदा मिलना चाहिए था वे इसके लाभ से वंचित रह गए और सामाजिक, आर्थिक व शैक्षणिक रूप से मजबूत पिछड़ी जातियों को आरक्षण और दूसरे सकारात्मक कदमों का समूचा फायदा मिल गया? मोटे तौर पर यही स्थिति आरक्षण या सकारात्मक कदम का लाभ पाने वाले हर समूह के साथ है। इसलिए इस असमानता और भेदभाव को खत्म करने के लिए जाति आधारित जनगणना जरूरी है। यह सही है कि जाति के आंकड़े का राजनीतिक इस्तेमाल हो सकता है। समाज के मौजूदा ताने-बाने को प्रभावित करने का प्रयास भी हो सकता है। लेकिन इसमें कुछ भी नया नहीं होगा। ‘पिछड़े पावें सौ में साठ’ या ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’ का नारा इस देश में दशकों से दिया जा रहा है। अगर तथ्यों के आधार पर इन नारों को वास्तविकता में बदला जाता है तो उससे संतुलन बिगड़ेगा नहीं, बल्कि समाज पहले से ज्यादा संतुलित होगा, हाशिए पर के समूह मुख्यधारा में शामिल होंगे और तभी भारत को अपनी विशाल आबादी का वास्तविक लाभांश हासिल हो पाएगा।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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