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ओलिंपिक इतना जरूरी क्यों?

जब जापान कोरोना महामारी के कारण आपातकाल झेल रहा है, तब ये सवाल अहम है कि क्या कंपनियों का आर्थिक नुकसान खिलाड़ियों की सेहत और आम जन भावना से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है? गौरतलब है कि जापान में महामारी के कारण दो तिहाई लोग इन खेलों को रद्द करने के पक्ष मे राय जता रहे हैं।

ये बात समझी जा सकती है कि अगर टोक्यो में होने वाले अगले ओलिंपिक खेलों को रद्द किया गया, तो उससे अंतरराष्ट्रीय ओलिंपिक समिति (आईओसी), स्थानीय आयोजकों और प्रायोजकों को भारी नुकसान होगा। उस नुकसान के एक बड़े हिस्से भरपाई बीमा कंपनियों को करनी होगी, इसलिए ये कंपनियां भी नहीं चाहेंगी कि ये खेल टलें। लेकिन जब जापान कोरोना महामारी के कारण आपातकाल झेल रहा है, तब ये सवाल अहम है कि क्या कंपनियों का आर्थिक नुकसान खिलाड़ियों की सेहत और आम जन भावना से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है? जापान में फिलहाल महामारी के कारण आपातकाल लगा हुआ है। तमाम जनमत सर्वेक्षणों दो तिहाई लोग इन खेलों को रद्द करने के पक्ष मे राय जता रहे हैं। कई खिलाड़ियों ने भी अपनी आशंकाएं जताई हैं। लेकिन आईओसी और टोक्यो की स्थानीय आयोजन समिति इस माहौल में ही अगले 23 जुलाई से 8 अगस्त तक इन खेलों का आयोजन कराने पर अड़े हुए हैं।

इस बीच आईओसी ने टोक्यो ओलिंपिक्स के लिए जो नियमावली जारी की है, उसमें शामिल जोखिम की जिम्मेदारी से संबंधित शर्त ने खिलाड़ियों के कान खड़े कर दिए हैं। प्लेबुक के एक नियम में कहा गया है- ‘तमाम सावधानियों के बावजूद हो सकता है कि जोखिम और प्रभाव पूरी तरह खत्म ना हों। इसलिए आप इन खेलों में भाग लेने के लिए अपने जोखिम पर तैयार हो रहे हैं।’ यानी खिलाड़ी अपने रिस्क पर टोक्यो आएंगे। क्या यह इंसाफ है? ये उचित ही है कि खिलाड़ियों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाली संस्था वर्ल्ड प्लेयर्स यूनाइटेड (डब्लूपीयू) ने इस नियम का विरोध किया है। उसने टोक्यो ओलिंपिक्स के आयोजकों से कहा है कि ऐसा नियम लागू करने के बजाय उन्हें यहां आ रहे सभी खिलाड़ियों का बीमा कराना चाहिए। संक्रामक रोग विशेषज्ञ पहले से इन खेलों के आयोजन से जुड़े खतरों की तरफ इशारा करते रहे हैँ। ध्यान दिलया गया है कि जिन गरीब देशों में टीकाकरण नहीं हुआ है, वहां के खिलाड़ी टोक्यो आएंगे, तब उन्हें यहां टीका लगाया जाएगा। ऐसे में उनके यहां संक्रमित होने का खतरा बना रहेगा। ऐसे में ये संभव है कि कुछ खिलाड़ी टोक्यो में संक्रमित होकर अपने देश लौटें। वहां उनकी देखभाल का जिम्मा किसका होगा? गौरतलब है कि आयोजकों को यहां आने वाले खिलाड़ियों, कोच, अधिकारियों या पत्रकारों के संक्रमित होने संबंधी किसी भी जिम्मेदारी से मुक्त करने का प्रावधान भी नियमावली में शामिल किया है। स्पष्टतः यह उनकी असंवेदनशील की ही मिसाल है।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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