अफगानिस्तान की अबूझ पहेली

अफगानिस्तान से नाटो सेनाओं की वापसी का मामला लटक गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने वहां से अमेरिकी सैनिकों की वापसी का पूरा कार्यक्रम घोषित कर दिया था। उसके मुताबिक उन्होंने वापसी शुरू भी कर दी थी। लेकिन जो बाइडेन के राष्ट्रपति बनने के बाद ऐसा लगता है कि इस मामले में अमेरिकी आकलन बदल गया है। उसका असर उत्तर अटलांटिक संधि संगठन के रुख पर देखने को मिला है। पिछले दिनों नाटो के महासचिव येंस स्टोल्टेनबर्ग ने कहा कि सदस्य देशों ने अब तक यह फैसला नहीं लिया है कि अफगानिस्तान से सैन्य वापसी होगी या नहीं या कब होगी। उन्होंने कहा कि अमेरिका और तालिबान के बीच शांति वार्ता के तहत पिछले साल एक समझौता हुआ था। उसके तहत एक मई सेना वापसी की तय तारीख है। गौरतलब है कि 9/11 के हमलों के बाद अमेरिका और उसके सहयोगियों ने 2001 में अफगानिस्तान पर हमला किया और तब से युद्ध जारी है। इस पर अब तक अरबों डॉलर खर्च किए जा चुके हैं।

बड़ी संख्या में नाटो सैनिकों की मौत भी हुई है। इन सब के बावजूद अफगानिस्तान में लोकतंत्र कायम करने की दिशा में कोई उल्लेखनीय तरक्की नहीं हुई है। ऐसे में अमेरिका और नाटो से जुड़े दूसरे देशों में भी अफगानिस्तान में अपनी फौज रखना अलोकप्रिय होता गया है। इसके बावजूद ये वापसी कैसे हो, इसे ये देश तय नहीं कर पा रहे हैं, इससे अफगानिस्तान की हालत और उन देशों की दुविधा का अंदाजा लगाया जा सकता है। नाटो प्रममुख स्टोल्टेनबर्ग ने भी ये बात मानी। कहा- “हम एक बहुत ही मुश्किल स्थिति का सामना कर रहे हैं और कोई आसान विकल्प नहीं हैं। अगर हम एक मई के बाद रुकते हैं, तो हिंसा बढ़ने का खतरा है। हमारी अपनी सेनाओं पर और हमलों का जोखिम है। लेकिन अगर हम वापसी करते हैं, तो हमने वहां जो प्रगति हासिल की है वह चली जाएगी।” अफगानिस्तान में हाल ही में काबुल समेत कई इलाकों में घातक हमले हुए। इसके बाद अफगानिस्तान के कई समूहों ने ये यह मांग बढ़ा दी है कि नाटो देश जल्दबाजी में अपनी सेना की वापसी ना करें। ऐसा करना खतरनाक साबित हो सकता है। अमेरिका के साथ हुए समझौते के तहत अफगानिस्तान सरकार के साथ शांति वार्ता में प्रगति, हिंसा में कमी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर घोषित आतंकवादी संगठनों के साथ तालिबान के संबंधों को खत्म करना जरूरी है।

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