बेपटरी अर्थव्यवस्था

भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए वैश्विक वित्तीय संस्थानों की जो भविष्यवाणियां और अनुमान आ रहे हैं वे चिंताजनक हैं। अब विश्व बैंक ने भी भारत की जीडीपी विकास दर का अनुमान साढ़े सात फीसद से घटा कर छह फीसद कर दिया है। विश्व बैंक ने जो चेतावनी दी है वह और नींद उड़ाने वाली है। बैंक ने साफ कहा है कि आने वाले दिनों में वित्तीय क्षेत्र को और बुरे दिन देखने पड़ेंगे। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी भारत की आर्थिक विकास दर को लेकर कोई अच्छी राय जाहिर नहीं की है। भारतीय रिजर्व बैंक ने भी हाल में विकास दर को 6.8 से घटा कर 6.1 फीसद कर दिया है। जाहिर है, किसी को भी आने वाले दिनों में अर्थव्यवस्था में सुधार के कोई संकेत मिलने की उम्मीद नहीं है।

ये सब अनुमान इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि देश मंदी की चपेट में है और इससे निपटने के लिए सरकारी प्रयास एकदम निष्फल साबित हो रहे हैं। सवाल है कि जब देश के आर्थिक हालात को लेकर वैश्विक संस्थान भी इतनी चेतावनियां दे रहे हैं तब भी सरकार की आंखें क्यों नहीं खुल रहीं, बल्कि सरकार और उसके अर्थशास्त्री इस बात को मानने को भी तैयार नहीं हैं कि भारत बड़े आर्थिक दुष्चक्र में फंस गया है। हाल में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने तो यहां तक कह डाला कि भारत में कोई आर्थिक मंदी नहीं है और इस पर कोई चर्चा या चिंता नहीं होनी चाहिए। क्या ये हैरत में डालने वाली बात नहीं है?

अर्थव्यवस्था पर नजर रखने वाली संस्था सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) ने पिछले कई महीनों में बार-बार अर्थव्यवस्था की हालत को लेकर चिंताजनक आंकड़े सामने रखे हैं। बेरोजगारी की दर इस वक्त सबसे ज्यादा है। अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्रों जैसे इस्पात, खनन, बिजली, विनिर्माण का भट्ठा बैठा हुआ है। पिछले हफ्ते जारी सरकारी आंकड़ों में कहा गया है कि औद्योगिक उत्पादन 1.1 फीसद और नीचे चला गया और यह इक्यासी महीनों के न्यूनतम स्तर तक पहुंच गया है। यह इस बात का संकेत है कि कारखानों में उत्पादन की हालत बुरी है। निर्माण क्षेत्र और रीयल एस्टेट बाजार एकदम ठंडा पड़ा है। सीमेंट और इस्पात क्षेत्र पर इसका बुरा असर पड़ रहा है। रोजमर्रा के इस्तेमाल वाले सामान बनाने वाली कंपनियां रो रही हैं। उत्पादन इसलिए ठप है कि मांग नहीं है। मांग इसलिए नहीं है कि लोगों के पास खर्च करने को पैसे नहीं हैं, मंदी ने लाखों लोगों का रोजगार छीन लिया है। ऐसे में कहां से पैसा आएगा खर्च करने के लिए, यह बड़ा सवाल है। भले हम दोष वैश्विक मंदी को देते रहें, लेकिन अगर कुछ महीने और इसी तरह की हालत बनी रही तो हालात विस्फोटक हो जाएंगे।

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