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खतरनाक दिशा में दुनिया

general assembly emergency meeting

प्रथम विश्व युद्ध के बाद लीग ऑफ नेशन्स बना था। लेकिन वह विफल रहा। उसका बहुत घातक परिणाम दुनिया को झेलना पड़ा। इसीलिए संयुक्त राष्ट्र में सुरक्षा परिषद को शामिल किया गया। प्रावधान किया गया कि दुनिया की पांच बड़ी शक्तियों को इसमें वीटो का अधिकार होगा।

पहले संदर्भ पर गौर करें। संयुक्त राष्ट्र का गठन दूसरे विश्व युद्ध के बाद हुआ। इसका प्राथमिक उद्देश्य था दुनिया में फिर दूसरे विश्व युद्ध जैसी हालत पैदा ना हो, उसे सुनिश्चित करना। प्रथम विश्व युद्ध के बाद लीग ऑफ नेशन्स बना था। लेकिन वह विफल रहा। उसका बहुत घातक परिणाम दुनिया को झेलना पड़ा। इसीलिए संयुक्त राष्ट्र में सुरक्षा परिषद को शामिल किया गया। प्रावधान किया गया कि दुनिया की पांच बड़ी शक्तियों को इसमें वीटो का अधिकार होगा। इन शक्तियों के बीच संतुलन पर विश्व शांति टिकी है- यह बात आज भी उतना ही सच है। लेकिन अब पश्चिमी देशों ने संयुक्त राष्ट्रों में हेरफेर शुरू कर दी है। अमेरिकी अधिकारी रूस को सुरक्षा परिषद से निकालने तक की बात कह चुके हैँ। शुरुआत के तौर पर रूस को संयुक्त राष्ट्र मानव अधिकार परिषद से निकालने का प्रस्ताव लाया गया, जो पारित हो गया। संयुक्त राष्ट्र महासभा में 193 सदस्य देशों में से 93 ने ही प्रस्ताव के समर्थन में वोट किया। लेकिन प्रावधान यह है कि मतदान करने वाले कुछ सदस्यों का दो तिहाई अगर पक्ष में हो, तो प्रस्ताव पारित हो जाएगा।

विरोध में सिर्फ 24 देशों ने मतदान किया। 58 सदस्यों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया। 19 सदस्य देश इस मौके पर उपस्थित ही नहीं हुए। मगर तकनीकी तौर पर प्रस्ताव को दो तिहाई समर्थन मिल गया और रूस की सदस्यता के निलंबन पर मुहर लग गई। इसे पश्चिमी देश अपनी जीत समझ सकते हैँ। लेकिन हकीकत यह है कि 100 देशों ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से ऐसे दुस्साहस में निहित खतरे की बेहतर समझ दिखाई। उन देशों ने समझा कि इस प्रस्ताव के जरिए जो किया जा रहा है, वह एक गलत शुरुआत है, जिसके खतरनाक नतीजे हो सकते हैँ। पश्चिमी देशों पर इस पर भी गौर करना चाहिए कि इसके पहले जब महासभा में रूस के खिलाफ प्रस्ताव आए थे, तब 141 और 140 सदस्यों ने रूस के खिलाफ वोट किया था। इस बार ये संख्या घट कर सिर्फ 93 रह गई। मानवाधिकार परिषद में 47 सदस्य हैं। रूस अपनी तीन साल की सदस्यता के दूसरे साल में था। वहां अब रूस के ना रहने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। मगर पश्चिमी देशों की सरकारों को अपनी जनता को यह समझाने में मदद मिलेगी, दुनिया उनके साथ है।

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