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अब भारी पड़ता मध्यमार्ग

पश्चिमी लोकतांत्रिक देशों में हाल में दिखे रुझान के आधार पर राजनीति शास्त्रियों ने कहा है कि सेंटर कान्ट होल्ड। यानी अब मध्यमार्ग नहीं टिकेगा। अब जमाना या तो धुर दक्षिणपंथ या फिर स्पष्ट वामपंथ का है। अमेरिका में जो बाइडेन ने इस संदेश को एक हद तक समझा। उन्होंने वहां डेमोक्रेटिक पार्टी में वामपंथ का प्रतिनिधित्व करने वाले नेता बर्नी सैंडर्स के समर्थकों से मेल कर एक साझा एजेंडा बना लिया। उस आधार पर ना सिर्फ उन्होंने चुनाव जीता, बल्कि उस एजेंडे पर काफी हद तक वे अमल भी कर रहे हैँ। लेकिन ऐसा सबक ब्रिटेन की लेबर पार्टी ने नहीं सीखा। इसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ रहा है। ब्रिटेन के स्थानीय और एक संसदीय उपचुनाव में विपक्षी लेबर पार्टी की बुरी हार हुई है। मार इतनी तगड़ी है कि अब सवाल उठाया जाने लगा है कि क्या लेबर पार्टी फ्रांस की सोशलिस्ट पार्टी की राह पर जा रही है? फ्रांस की सोशलिस्ट पार्टी 2017 तक सत्ता में थी। लेकिन राष्ट्रपति फ्रांस्वां ऑलोंद के जमाने में अपनाई गई मध्यमार्गी नीतियों का नतीजा यह हुआ कि 2017 के चुनाव में उसे सिर्फ 8 फीसदी वोट मिले।

धुर वामपंथी और धुर दक्षिणपंथी पार्टियों के बीच पिसते हुए सोशलिस्ट पार्टी आज फ्रांस की राजनीति में लगभग अप्रसांगिक हो गई है। ब्रिटेन के ताजा चुनावों में यही हाल लेबर पार्टी का हुआ है। पार्टी के बहुत से परंपरागत वोटर उससे अलग हो गए हैँ। 2019 के आम चुनाव में हार के बाद पार्टी ने मध्यमार्गी कियर स्टार्मर को अपना नेता चुना था। तब से स्टार्मर ने पार्टी को वामपंथी नीतियों से हटा कर टोनी ब्लेयर के जमाने वाली मध्यमार्गी नीतियों की तरफ लाने की कोशिश की है। लेकिन अब ये साफ है कि ये दांव बुरी तरह नाकाम हो गया है। लेबर पार्टी के ज्यादातर युवा और प्रगतिशील समर्थक इस बार ग्रीन पार्टी की तरफ चले गए हैँ। उसके ब्रेग्जिट समर्थक बहुत से मतदाताओं ने या तो कंजरवेटिव पार्टी या फिर लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी को अपना लिया है। नतीजा यह है कि एक संसदीय उपचुनाव में पार्टी वो सीट हार गई जहां से वह 1960 के दशक से लगातार जीत रही थी।स्थानीय चुनावों के नतीजे भी लेबर पार्टी के लिए बेहद निराशाजनक हैँ। जबकि ग्रीन पार्टी को काफी फायदा हुआ है। तो जाहिर है, अब पार्टी में नेता बदलने की मांग उठी है। फिलहाल, पार्टी गहरे भ्रम में नजर आ रही है।

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