दुनिया में उथल-पुथल, बेचैनी और भारत

दुनिया उथल-पुथल, अव्यवस्था के गड़बड़झाले में है। एक तरफ लोकलुभावन राजनीति से दक्षिणपंथी नेताओं का दबदबा बना हुआ है, तो दूसरी ओर बेचैनी, सड़कों पर उतरते-गुंजतेविरोधी स्वर प्रबल होते जा रहे हैं। इन दोनों ही स्थितियों से दुनिया में जैसे हालात हैं, वैसे पहले कभी नहीं बने। दक्षिणपंथ और उसके लोकलुभावनवाद, अच्छे-बुरे प्रभावों के बारे में बहुत कुछ कहा और लिखा जा चुका है। उस नाते ज्यादा महत्त्वपूर्ण अब यह है कि उस विरोध, बैचेनी, विद्रोह पर विचार करें जो इन दिनों की चर्चा का आधे से ज्यादा हिस्सा है।

हांगकांग की सड़कों पर पिछले पांच महीनों से नौजवान चीन के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। एक तरह से पूरा देश ठप-सा पड़ा है। हालात इतने विकट हैं कि देश की अर्थव्यवस्था तक चरमरा गई है। इधर, चिली जो एक समय दक्षिण अमेरिका का चमकता सितारा हुआ करता था, में इन दिनों आर्थिक सुधारों को लेकर सरकार के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन हो रहे हैं। चिली में 1990 में लोकतंत्र की वापसी के बाद से पहली बार इतनी खराब स्थिति बनी है।

इसी तरह पिछले साल फ्रांस के ‘यलो वेस्ट’ आंदोलन ने भी दुनिया का ध्यान खींचा था। ब्रिटेन को देखें तो वहां ब्रेक्जिट को लेकर भारी उथल-पुथल का वक्त है। स्पेन में अलग कैटेलोनिया देश की मांग को लेकर जो आंदोलन चला उसने पूरे देश को हिला कर रख दिया है।पिछले महीने कैटेलोनिया समर्थक राजनीतिकों और कार्यकर्ताओं को नौ से तेरह साल तक की सजा सुनाते हुए जेलों में ठूंस दिया गया। कजाखस्तान में अल्माती और नूर सुल्तान में प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतरे हुए हैं और ये सरकार के व चीन की विस्तारवादी गतिविधियों के खिलाफ लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। इसी तरह मध्य पूर्व में भी जिस तरह की अशांति दिख रही है, वह अरब बसंत के दूसरे दौर का संकेत दे रही है। इधर, पडौस के पाकिस्तान में प्रधानमंत्री इमरान खान के खिलाफ प्रदर्शनों का सिलसिला शुरू हो चुका है। लाखों लोग लाहौर व दूसरे शहरों में प्रदर्शन कर रहे हैं। पाकिस्तान गंभीर आर्थिक संकटों से अलग जूझ रहा है।

और सिर्फ इन देशों में ही नहीं, बोलीविया, हैती, इक्वाडोर, लेबनान जैसे देशों में भी सरकारों के खिलाफ प्रदर्शनों का दौर चला हुआ है। हर देश में प्रदर्शन के अपने अलग कारण हैं। जैसे कैटेलोनिया संघर्ष स्पेन से अलग होकर अपना अलग राष्ट्र बनाने को लेकर है। ‘यलो वेस्ट’ आंदोलन दूसरे मुल्कों से आए लोगों की वजह से फ्रांस के समाज में उत्पन्न सामाजिक बुराइयों को लेकर है। आंदोलनकारी फ्रांस के अभिजात्य वर्ग और बढ़ती असमानता को लेकर गुस्से में हैं। चिली में प्रदर्शनों की शुरुआत मेट्रो के किराएकोबढ़ाने से हुई। हालांकि चिली में आर्थिक असमानता तेजी से बढ़ी है और लोगों के गुस्से की यह बड़ी वजह बनी है। हफ्ते से ज्यादा हो चुका हैं, लेकिन प्रदर्शनकारी घरों को लौटे नहीं हैं। कमोबेश यही स्थिति पाकिस्तान की भी है।

आंकड़े बता रहे हैं कि 1960 और 2009 के मुकाबले अब प्रदर्शनों की तादाद और तीव्रता काफी तेज है। यह काफी सघन और मुखर है। तभी सवाल है कि आखिर क्या कारण हैं कि आधी दुनिया विरोध प्रदर्शनों से हिली हुई है?

अगर सतही तौर पर देखें तो दुनिया में चल रहे ये विरोध प्रदर्शन छोटे-छोटे मसलों पर जनता के तात्कालिक गुस्से के चलते शुरू हुए। लेकिन छोटे मसले, छोटी चिंगारियां भी बड़े कारण लिए होती है। विरोध तब पैदा होता है जब सरकारें जन-समस्याओं की अनदेखी करती हैं, मुद्दों को दरकिनार किया जाता है और लोगों की परवाह नहीं की जाती है। फिर तूफान पूर्व वाली वह शांति बनती है जिसमें विरोध फूटा तो सरकार किंकर्तव्यमूढ़। दुनियाभर में चल रहे विरोध प्रदर्शनों पर गौर करें तो इन सबमें समान बातें और समानताएं मिलेगी। सालोसाल आर्थिक बदहाली, समस्याओं को लेकर आमजन के भीतर बनती लों जबकुप्रबंधन, बढ़ती असमानता, भ्रष्टाचार और सरकारी दमन से हवा पाती है तो सड़क पर गुस्सा फूट पड़ता है। सरकारों की लापरवाही लोगों के गुस्से में आग में घी का काम करती है। कुछ विद्वान, जानकार इन प्रदर्शनों के बीच की समानता को महज संयोग मानते है। शायद ऐसा हो भी। लेकिन इस तरह के संयोगों में ही समस्याओं की सुस्पष्ट वे ध्वनियां भी हैं जो दुनिया के विकसित और विकासशील सभी देशों में राजनैतिक बवाल का हल्ला, झगड़ा बनवा देती है। कई देशों में मुक्त बाजार व्यवस्था के समर्थक अपने ही देश में असमानता की चौड़ी होती खाई देख खुद मानने लगे है कि संघर्ष नहीं होगा तो क्या होगा!

मुक्त व्यापार, नई तकनीक, चीन में बढ़ती आर्थिक मंदी, अमीर-गरीब याकिसंपन्न-वंचित के बीच की खाई और मध्य वर्ग पर दबिस ने सर्वत्र हताशा व सुगबुगाहट का वह माहौल बनाया है जिसनेसबसे बड़े पीड़ित वर्ग यानी मध्यम वर्ग को सरकारों के खिलाफ सड़कों पर उतारा है। प्रदर्शनों में सबसे ज्यादा भागीदारी स्कूल-कालेजों के छात्रों और विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे नौजवानों की होती है। और ध्यान रहे यही दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाली और उम्मीदें रखने वाली पीढ़ी है जो अपने को किसी अधरझूल में नहीं लटकाए रखना चाहती। लंदन से निकलने वाले अखबार ‘द टाइम्स’; में इतिहासकार नियाल फर्ग्यूसन ने मौजूदा प्रदर्शनों की तुलना 1960 के दशक में होने वाली प्रदर्शनों से की है।

उन्होंने तब और अब में समानता यह बताई कि तब भी शिक्षित नौजवानों का अत्यधिक, एक्सेस में होना बडा कारण था। शिक्षा क्षेत्र में आई क्रांति से शिक्षित नौजवानों की तादाद नौकरियों से कई गुना ज्यादा थी। ज्यादा डिग्रीधारी और काम की तलाश में। तभी अंहम सवाल कि आधी दुनिया में अचानक ऐसा क्या गलत हुआ है जो हर देश में नौजवानों की भीड़ सड़कों पर उतरने को मजबूर हो है? युद्ध और आर्थिक मंदी को छोड़ दें तो कोई वक्त इतना खौफनाक नहीं होता जब लोगों के जीवनस्तर में इस कदर भारी गिरावट आने लग जाए जो उनके लिए सड़कों पर उतरना वैसे आसान हो जैसा आज देख रहे हैं। क्या सोशल मीडिया और इंटरनेट ने इस तरह के प्रदर्शनों को पहले के मुकाबले ज्यादा आसान, फैशनेबल बना दिया है? या वाकई दुनिया आज ऐसे मोहभंग में है जो गुजरे वक्त के मुकाबले आज का वक्त जीने लायक नहीं माना जा रहा है?सब आंदोलन के लिए विवश है?

जवाब में कोई एक थ्योरी, एक सी वजह बूझना व्यर्थ है। बावजूद इसके विरोध प्रदर्शनों की प्रकृति में समानता, साम्यता देखी जा सकती है। सभी जगह लोग अपने को ज्यादा अधिकारविहीन, शक्तिविहिन महसूस कर रहे हैं। लोगों को लगने लगा है कि उनके वोट का अब कोई मतलब नहीं रह गया है। उनके वोट समाज, राजनीति में बदलाव नहीं ला सकते। न सिर्फ राजनेताओं ने, बल्कि संस्थाओं ने भी आमजन से दूरी बना ली है। अस्सी के दशक के आखिर के प्रदर्शनों से अलग, जब आमतौर पर दमनकारी सरकारें निशाने पर होती थीं जो समाधान के रूप में चुनाव का पाखंड करती थीं, वैसा आज नहीं है। आज तो दुनिया के ज्यादातर उन देशों में हालत अस्पताल में आपरेशन टेबल पर लेटे मरीज की तरह है जहां लोकतंत्र जीवंत व सच्चा है। फ्रांस, ब्रिटेन, स्पेन, हांगकांग, चिली सबतो जिंदा लोकतंत्र लिए हुए है।

सवाल है क्या ये सब बातें और हालात आज के भारत पर उपयुक्त नहीं बैठती हैं? क्या हमें इससे सतर्क होने की जरूरत नहीं है?

यों भविष्य हमेशा अनिश्चित होता है, लेकिन हमारा गुजरा वक्त हमें बताता है कि कुछ भी संभव है। आखिरकारनरेंद्र मोदी भी तो सन् 2011-2012 के असंतोष, लोगों के गुस्से की देन हैं। यदि आज के माहौल, परिदृश्य पर गौर करें तो गंभीर पहला तथ्य आर्थिक वृद्धि के हवा हो चुकने का है।एनआरसी और अनुच्छेद-370 ने दो तरह के समानांतर मनोभाव बना रखे है। घटनाओं ने दो तरह की सोच वाले वर्ग को जन्म दे डाला है। उधर वह बेरोजगार तबका तेजी से फेल रहा है जो अपने को अधरझूल में लटका पा रहा है। इनकी आशावादिता धीरे-धीरे ही सही खत्म होती जा रही है। समस्याओं का समाधान किसी के पास नहीं है। कुल मिलाकर दुनिया में हो रहे विरोध प्रदर्शनों ने एक तरह की वह नई यथास्थिति बनाई है जिसमें असंतोष, हताशा मानो स्थाई हो। तूफान से पहले की शांति, यथास्थिति कब किसी देश को अपने दुष्षचक्र में फंसा ले यह दूसरे कई देशों में जाहिर हुआ है तो असंभव नहीं कि अचानक भारत भी अपने को उस दौर में फंसा पाए। वक्त असहज है, बेचैनी लिए हुए है तो इसकी यथास्थिति में गुल कुछ भी, कभी भी खिल सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares