अरुधंति राय और रंगा-बिल्ला

जब पिछले दिनों जानी मानी लेखिका अरुधंति राय को नागरिकता संशोधन, एनआरसी विरोधी आंदोलन के दौरान आंदोलनकारी युवाओं से यह कहते हुए सुना कि अगर आप लोगों से कोई आपका नाम पूछे तो कह देना कि हम है रंगा बिल्ला। यह बताता है कि बुद्धि और लोकप्रियता व सफलता में दूर-दूर तक कुछ लेना देना नहीं होता है। अगर आप चर्चित पुरस्कार पाने वाली लेखिका हैं तो कोई जरुरी नहीं है कि आप एक व्यवहारिक व समसामयिक इतिहास की जानकारी लिए महिला भी हो।

इस देश की सबसे अच्छी बात यह है कि जिन लोगों का अतीत बुरा होता है हम उनका नाम तक लेना पसंद नहीं करते है व उनके नाम के आधार पर किसी का नाम नहीं रखते। जैसे कि रावण, कंस, सूर्पणखा आदि यहां तक कि विभीषण भी भाई विरोधी भूमिका के कारण अमान्य नाम है। मैंने आज तक किसी का नाम विभीषण नहीं सुना।

अंरुधित राय कोई बच्ची नहीं है उनकी उम्र भी मेरी आयु के आसपास होगी और वे भी दिल्ली में रहते हुए रंगा —बिल्ला कांड की साक्षी रही होगी। जो कि उस समय का निर्भया कांड से भी अधिक निर्मम कांड था व जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। अब चूंकि उन्होंने रंगा, बिल्ला को याद किया व आम छात्र को रंगा बिल्ला बतलाने की सलाह दी तो यहां यह बताना जरुरी हो जाता है कि रंगा बिल्ला थे कौन? यह घटना 1978 की है जब दो ड्राइवर अपराधियों ने दो सगे भाई-बहन किशोरो संजय व गीता को कार में लिफ्ट देने के बहाने उनका अपहरण कर उनकी निर्ममता के साथ हत्या कर दी थी। आरोप था कि उन्होंने बलात्कार भी किया।

दोनों बच्चे नौ सेना अधिकारी कैप्टन मदन चोपड़ा के बच्चे थे। वे  लोग धौलाकुंआ स्थित आफिसर एनक्लेव में रहते थे। यह दुर्घटना 26 अगस्त की है जब संजय व गीता चोपड़ा आल इंडिया रेडियो के युवावाणी कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए जा रहे थे। गीता चोपड़ा की आयु साढ़े सोलह साल की थी व जीजस मेरी कान्वेंट में द्वितीय वर्ष की छात्रा थी। उसका भाई संजय माडर्न स्कूल में दसवीं कक्षा में पड़ता था।

उन्हें संसद मार्ग स्थित रेडियो के दफ्तर पर 7 बजे तक पहुंचना था व लौटते समय उनके पिता उन्हें लेते हुए आते। वे दोनों अपने घर से शाम के 6.15 पर निकले व उन्हें धौला कुंआ पर एमएस नंदा नामक व्यक्ति ने गोल डाकखाने तक अपनी गाड़ी में लिफ्ट दे दी। उस समय हल्की बूंदा बांदी हो रही थी। उस दिन 6.30 बजे भगवानदास नामक एक व्यक्ति ने गुरुद्वारा बंगला साहब से नार्थ एवेन्यू जाती एक कार से शोर आते सुना व उसने अपने स्कूटर से गोल डाकखाना के निकट कार रोकने की कोशिश की।

उसने देखा कि एक लड़की ड्राइवर के बाल खींच रही है व पीछे की सीट पर बैठा लड़का अपने साथ बैठे व्यक्ति से लड़ रहा था। वह कार को रोक पाने में नाकाम रहा। बाबूलाल नामक एक व्यक्ति ने तो अपनी सायकिल टकरा कर कार को रोकने की नाकाम कोशिश की। पास के पुलिस कंट्रोल रुप को 6.45 पर फोन करके इस घटना की जानकारी दी। उसने बताया कि लड़की सहायता के लिए चिल्ला रही थी। उसने कार का नंबर एचआरके 8930 बताया।

एक और व्यक्ति इंद्रजीत सिंह ने बाबा खड़क सिंह मार्ग पर राममनोहर लोहिया अस्पताल के सामने कार में भाई बहन को संघर्ष करते हुए देखा। लड़के के खून बह रहा था। इंद्रजीतसिंह शंकर रोड तक कार का पीछा किया मगर वह कार लाल बत्ती पर आगे बढ़ती चली गई व वहीं रुक गया। उसने राजेन्द्र नगर पुलिस को पूरे मामले की जानकारी दी। मगर पुलिस ने इसलिए कोई कार्रवाई नहीं की क्योंकि उनके मुताबिक यह अपराध उनके इलाके में नहीं किया गया था व मेरठ की एक अदालत ने उन पर इलाके के बाहर का मामला सुलझाने पर रोक लगा रखी थी।

बच्चों के मां-बाप ने 8 बजे उनका कार्यक्रम सुनने के लिए जब रेडियो खोला तो उसमें कुछ नहीं आया। उन्हें लगा कि कार्यक्रम रद्द हो गया होगा। जब पिता बच्चों को लेने रेडियो के दफ्तर पहुंचे तो उन्हें पता चला कि वे लोग तो वहां पहुंचे ही नहीं थे। वह घर लौट कर रिश्तेदारों के साथ खोज में जुट गए। रात को 10.15 पर दोनों अपराधी विलिगडन अस्पताल (राममनोहर लोहिया अस्पताल) पहुंचे। बिल्ला नामक एक व्यक्ति के माथे पर काटने का निशान था। उन दोनों ने बताया कि चोरों ने उन पर हमला किया। वह अपना नाम गलत बता गए। उन्होंने कहा कि मंदिर मार्ग पर चोर ने उन पर हमला करके उनकी घड़ी छीन ली। वहां मंदिर मार्ग से आयी पुलिस उनसे पूछताछ करने लगी।

वे उन्हें लकर उस कथित अपराध घटने वाले स्थान तक ले गई। पर वहां कुछ होने का कोई प्रमाण नहीं था। पुलिस वाले उन्हें अगले दिन थाने आने की सलाह देकर वहां से चले गए। उन्होंने गलत पता दिया। चोपड़ा परिवार ने रात 10 बजे पुलिस को सूचना दी। 25 अगस्त को धनीराम नामक चरवाहे को अपने जानवर चराते समय रिज पर शाम 6 बजे दो लाशें मिलीं। उसने पुलिस को जानकारी दी व पुलिस ने चोपड़ा दंपत्ति को बुलवाया।

उन्होंने बताया कि मारे गए दोनों लोगों की लाशें उनके बच्चों की थी। पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टर ने पाया कि लाशे सड़ने लगी थी व लड़की व लड़के दोनों पर चाकू से वार किए गए थे। वे यह नहीं पता लगा पाए कि लड़की के साथ बलात्कार किया गया था या नहीं। जब कुछ अखबारों ने इन दोनों बच्चों की लाशों की तस्वीरें छापी तो उन्हें देखकर  नंदा ने पुलिस में संपर्क किया और सारी बात बतायी। यह कार अशोक होटल से डेढ़ महीने पहले चुराई गई थी।  पता चला कि इन लोगों ने उन बच्चों को अमीर घर का समझते हुए उनका अपहरण किया था ताकि वे फिरौती वसूल सकें। कार में बिल्ला ने अपनी कृपाण दिखा कर उन्हें धमकाने की कोशिश की व कृपाण छीनने की कोशिश में संजय घायल हो गया। बिल्ला ने रंगा की अपनी तीन फुट लंबी तलवार से संजय पर हमला करने को कहा। इस हमले में संजय मारा गया। रंगा का पूरा नाम कुलजीत उर्फ रंगा था बाद में उन्हें आगरा के पास सैनिकों के एक डब्बे में पकड़ा गया। वे लोग मराठी में बात कर रहे थे व उनकी बात को मराठी भाषी एक सैनिक ने समझ लिया व इन दोनों की तस्वीरें वह अखबारों में देख चुका था।

उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट ने मौत की सजा दी। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी सजा को उचित ठहराया व वे लोग चार साल तक राष्ट्रपति के यहां दया की गुहार लगाते रहे। उन्हें 31 जनवरी 1982 को फांसी पर लटका दिया गया। उनके इस जघन्य अपराध को देखते हुए उनके परिवार के किसी सदस्य ने उनका मृत शरीर नहीं लिया। हालांकि 1978 को भारतीय बाल विकास परिषद ने उन दोनों बच्चे की याद व सम्मान में गीता चोपड़ा व संजय चोपड़ा वीरता अवार्ड दिए जाने का ऐलान किया। दोनों बच्चों को 5 अप्रैल 1981 को कीर्ति चक्र पुरस्कार दिया गया। यह मामला तो निर्भया कांड से भी ज्यादा जघन्य मामला माना जाता है।

One thought on “अरुधंति राय और रंगा-बिल्ला

  1. … बुद्धि और लोकप्रियता व सफलता में दूर-दूर तक कुछ लेना देना नहीं होता है। अगर आप चर्चित पुरस्कार पाने वाली लेखिका हैं तो कोई जरुरी नहीं है कि आप एक व्यवहारिक व समसामयिक इतिहास की जानकारी लिए महिला भी हो।… सब कुछ कह दिया सर???????

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