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हरिशंकर व्यास कॉलम | गपशप | बेबाक विचार| नया इंडिया| जो लिखा वह इतना सही साबित

जो लिखा वह इतना सही साबित!

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सन् 2021 के आईने में ‘गपशप’

देख कर हैरानी होती है कि इस गुजरते साल में क्या ‘गपशप’ लिखी और जो लिखा वह कितना सही साबित हुआ! बार बार यह कहते हुए लिखा कि ‘भगवान करें मैं गलत साबित होऊं’ लेकिन अपवाद के लिए भी कोई अंदाजा गलत नहीं हुआ। साल के पहले महीने से अंदाजा था कि पूरा साल टकराव में बीतेगा और सत्ता पक्ष राष्ट्रवादी और देशद्रोही का विमर्श बनवाए रहेगा। आंदोलनरत किसानों की लोहिड़ी देख कर लिखा था यह आंदोलन ऐतिहासिक होगा और सरकार अगर इस भ्रम में है कि वह किसानों को डरा, धमका कर या बदनाम करके झुका लेगी तो यह उसकी गलतफहमी है। अपने को इस बारे में कोई गलतफहमी नहीं थी लेकिन सरकार मुगालते में रही और अंत में घुटने टेके।

जिस समय कोरोना वायरस के खिलाफ जंग जीत लेने का ऐलान था उस समय भी यह लिखा कि कोरोना की जंग खत्म नहीं हुई है। लोगों को आगाह किया और सरकार को भी चेतावनी दी कि इस वायरस के हलके में न लें और बचाव की तैयारी रखें। लेकिन जैसी देश की सरकार वैसे इस देश के लोग! सब मुगालते में रहे और कोरोना ने मार्च में जब फिर हमला किया तो पूरा देश तड़पता, बिलखता और मरता दिखा। पूरा देश अस्पताल से लेकर श्मशान तक वेटिंग लिस्ट में दिखा।

अर्थव्यवस्था की बदहाली के बारे में नोटबंदी के बाद से जो मैंने जो लिखा वह अभी तक सही साबित हो रहा है। साल 2021 भी अपवाद नहीं रहा। कोरोना के खिलाफ जंग जीतने की हुंकार के साथ ही अर्थव्यवस्था के पटरी पर लौटने और वी शेप रिकवरी की बातें सरकारी अर्थशास्त्रियों ने बतानी शुरू की थी तब भी लिखा कि अर्थव्यवस्था पटरी पर लौट ही नहीं सकती क्योंकि उसकी कमर टूटी हुई है। वह हिलने-डुलने की स्थिति में नहीं है। हर बीतते दिन के साथ लाखों लोग गरीबी में जा रहे हैं और देश अंबानियों-अडानियों के सुपुर्द है।

चीन के आक्रामक रवैए से निपटने में भारत की अक्षमता और विश्व कूटनीति में भारत की विफलता के बारे में लिखा और उसके खतरे बताए। लेकिन फिर वहीं ढाक के तीन पात! सरकार पूरे साल इस झूठ पर टिकी रही कि ‘न कोई घुसा है और न कोई घुस आया है’। इसका नतीजा यह हुआ है कि चीन ने चौतरफा घेराबंदी कर ली है। मैंने ‘अपन तो कहेंगे’ और ‘गपशप’ दोनों कॉलम में अनगिनत बार लिखा कि भारत सरकार को अफगानिस्तान के हालात पर नजर रखनी चाहिए और अपनी सैन्य भूमिका बनानी चाहिए। आज क्या हालात हैं? तालिबान के कब्जे के बाद अब अफगानिस्तान पूरी तरह से चीन के नियंत्रण में है और चीन, पाकिस्तान, अफगानिस्तान की तिकड़ी भारत के लिए भारी सिरदर्द है। देश की सीमाएं चारों तरफ से असुरक्षित हैं और दुनिया में कहीं भी भारत का डंका नहीं बज रहा है।

देश में संस्थाओं के पतन और संसदीय व्यवस्था के क्षरण के बारे में भी कितना कुछ लिखा और साल के पहले महीने से जो लिखा वहां आखिरी महीने में भी होता दिखा। यह कोई नई बात नहीं थी कि सरकार ने विपक्ष के एक दर्जन सांसदों को निलंबित कराया और अपना मकसद पूरा किया। विपक्ष विरोध में प्रदर्शन करता रहा और सरकार ने अनेक विवादित विधेयक बिना किसी बहस या वोटिंग के पास करा लिया। क्या पूरे साल सिर्फ यही पांच-छह मुद्दा नहीं रहे? किसान आंदोलन, कोरोना की भयावह दूसरी लहर का प्रकोप और तीसरी लहर का इंतजार, डूबती अर्थव्यवस्था और भिखारी की दशा में पहुंचे करीब एक अरब लोगों की दास्तां, राष्ट्रीय सुरक्षा पर चौतरफा खतरा और विश्व कूटनीति की विफलता और अंत में संसदीय लोकतंत्र का क्षरण! इन विषयों पर पूरे साल जो लिखा उसकी चुनिंदा लाईनों को देख कर आप अपनी समझ से पूरे साल की एक समग्र तस्वीर बना सकते हैं तो आने वाले साल का भी अंदाजा लगा सकेंगे।

किसान आंदोलन

खुद्दार सिख, इतिहासजन्य लोहड़ी!

…पता नहीं हम हिंदुओं के भाग्य में क्या बदा है! पर पिछले साढ़े छह साला हिंदू राज में भारत के जैसे-जो फोटो बने हैं उसके क्रम में वर्ष 2021 की लोहड़ी का फोटो कभी भूलाए नहीं भूलेगा। .. सलाम खुद्दार किसानों के जज्बे को जो आंदोलन के 49वें दिन किसानों ने केंद्रीय कानूनों की कॉपी जला कर लोहड़ी मनाने के साथ यह भी कहा कि अगर उन्हें बैशाखी भी यहीं, ऐसे ही मनानी पड़ी तब भी कोई दिक्कत नहीं है।…

तो 21 टकराव का!

हां, 26 जनवरी से 29 जनवरी 2021 के दिन इन पंक्तियों के लिखने तक का घटनाक्रम प्रमाण है कि भारत में सन् 2021 में देशभक्तों बनाम देशद्रोहियों-पाकिस्तानियों की पानीपत की लड़ाई नए आयाम पाएगी। देश के किसानों में खालिस्तानी गैंग का नैरेटिव बना कर सिख बनाम जाट का भेद बना कर पंजाब के किसानों को अलग-थलग करने का मंसूबा सिरे नहीं चढ़ा है। रोते हुए राकेश टिकैत के वीडियों से जाटों में, जयंत चौधरी जैसे नेताओं में जो रिएक्शन हुआ है ….

हस्तक्षेप यह ईश्वरीय!

पिछले छह महीने में जो हुआ है क्या वह अहंकार, घमंड की सत्ता को ईश्वरीय श्राप नहीं है? नरेंद्र मोदी ने किसी से भी बात नहीं करके अपनी सर्वज्ञता में देश को बदलने के तीन कृषि कानून पहले तो अध्यादेश से लागू कराए और फिर राज्यसभा में उप सभापति हरिवंश के जरिए विपक्ष को दबाकर ध्वनि मत से जैसे बिल पास करवाए वह न केवल संसदीय इतिहास की सर्वाधिक कलंकित कार्रवाई थी, बल्कि खम ठोक सत्ता का यह अहंकार प्रदर्शन भी था कि देश के सबसे बड़ी आबादी समूह याकि किसानों के वे भाग्य विधाता हैं।…तभी अहंकार की अति में ईश्वरीय हस्तक्षेप हुआ और अप्रत्याशित तौर पर किसान सड़क पर उतर आया। ….2020-21 से जो शुरुआत है तो उससे देश में विकल्प नहीं बनेगा, बल्कि समाज, राजनीति बिखरेगी।

कोरोना वायरस की महामारी

मार्च तब-अब व भारत सत्य!

मैंने फरवरी 2020 में, फिर लॉकडाउन से पहले और बाद में और लगातार पूरे साल बार-बार लिखा है कि जानो समझो महमारी को, संवेदनशील बनो, जान-माल की बरबादी तय है। याद रखो सन् 1918-20 की महामारी में भारत की बरबादी को। और ‘नया इंडिया’ देश का अकेला अखबार है, जिसमें फरवरी 20 से ले कर अब तक कोरोना और संक्रमण की खबर हर रोज लगातार पहले पेज पर पहली, दूसरी या तीसरी खबर के रूप में छपी। देश का अकेला वह ‘बेसुरा’ अखबार ‘नया इंडिया’ है, जिसने पहले दिन से अब तक सरकार, नेतृत्व, लोगों और राष्ट्र-राज्य के झूठ, मुगालते, अंधविश्वास के बीच पाठकों को बेबाकी से वायरस का सत्य पहले पेज पर प्रस्तुत किया।…. भारत कोरोना वायरस से लगातार कई साल प्रभावित, अछूत और बरबाद होते जाना है। ….आप नहीं मानते। मत मानिए। अगली मार्च 2022 में बात करेंगे।

दुनिया सचमुच देख रही हमें!

‘दुनिया भारत की तरफ देख रही है’ का जो विमर्श भाजपा के नेताओं ने खड़ा किया वह सचमुच हकीकत बन गई। दुनिया सचमुच भारत की ओर देख रही है कि यह कैसा असभ्य और अनपढ़-गंवार लोगों का देश है, जहां वायरस की भयावहता के बीच कुंभ मेले का आयोजन हो रहा है… एक राज्य का मुख्यमंत्री लोगों से लाखों की संख्या में कुंभ के मेले में शामिल होने की अपील करता है और कहता है कि आस्था के आगे कोरोना हार जाएगा! …दुनिया सचमुच आंखें फाड़ कर भारत की ओर देख रही है कि इस देश का नेतृत्व कैसे हाथ में है, जो कोरोना की भयावह महामारी के बीच हजारों लोगों को जुटा कर चुनावी रैलियां कर रहा है और इस बात पर गदगद हो रहा है कि उसकी सभाओं में इतनी भीड़ जुट रही है!

क्या लिखूं, सब तो साल पहले लिखा।

भारत मौत का कुंआ बना है! ऐसा कोई सेकेंड वेव, थर्ड, फोर्थ वेब से नहीं है जो है वह नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की अंतहीन मूर्खताओं से है। इन मूर्खताओं में ब्रेक कभी नहीं था जो समझदार-सभ्य देशों की तरह यह सोचे कि वायरस रूक गया, फिर फैला, फिर रूका फिर फैला।

संघ-वीएचपी वालों शर्म करो! अरबों रुपए के चंदे में

कुछ तो हिंदुओं को सांस देने पर खर्च करो!

..क्या हिंदू के लिए इतना भी सोचना उस संघ-उस विश्व हिंदू परिषद्, उस रामदेव, उस रविशंकर, उस जग्गी वासुदेव, उन शंकाराचार्यों, महामंडलेश्वरों की बुद्धि, मानवता में नहीं, जो मोदी के हिंदू काल में वैभव को प्राप्त हैं, जिन्होंने हर तरह का धंधा किया, पैसा-मुनाफा-चंदा कमाया। ये पैसे का क्या दस-बीस-पच्चीस प्रतिशत हिस्सा निकाल कर उससे मौत काल में हिंदुओं को ऑक्सीजन नहीं दिलवा सकते? हिंदू को गरिमापूर्ण अंतिम यात्रा नहीं करवा सकते?

भाजपा के नेता कहां हैं?

भारतीय जनता पार्टी दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है। उसका दावा है कि उसके कार्यकर्ताओं की संख्या 11 करोड़ है। लोकसभा में उसके 303 सांसद हैं और राज्यसभा सदस्यों की संख्या भी 90 से ऊपर हो गई है। देश भर में भाजपा के विधायकों की संख्या डेढ़ हजार के करीब है। इसके अलावा हजारों की संख्या में स्थानीय निकायों के चुने हुए प्रतिनिधि हैं। लेकिन क्या मानवता के इस सबसे बड़े संकट के समय कहीं ये नेता, कार्यकर्ता या जन प्रतिनिधि दिखाई दे रहे हैं?

प्रतिदिन चार हजार मौतें या 25 हजार या….?

भारत में, मृतकों-अर्थियों की संख्या बता रही है कि बीमारी भयावह है बनिस्पत अधिकारिक आंकड़ों के।… भारत प्रतिदिन सिर्फ चार हजार मौतों का अनुभव लिए हुए नहीं है, बल्कि यह तो बैकग्राउंड का एक ब्लिप याकि रडार का एक बिंदु है। जिस देश में तीस हजार मौतें एक सामान्य दिन में होती हैं तो अब महामारी के वक्त, श्मशानों में चौबीसों घंटे चिताओं के जलते हुए वक्त में,. लकड़ियों की कमी की खबरों के मध्य में कोविड-19 से कम से कम 25 हजार या उससे ज्यादा मौतें हो रही होंगी। …. क्या यह गलत अनुमान है? इस बात को वैश्विक अखबारों-मीडिया (कुछ भारत के भी) में छपी-आई ग्राउंड रिपोर्ट में आंखिन देखी-मुंह जुबानी साक्ष्य पर तौलें तो मोटे तौर पर सरकारी एक मौत के आंकड़े की जगह दस-बीस गुना अधिक संख्या में मौत का आंकड़ा बनेगा। जैसे अमेरिकी ‘वाशिंगटन पोस्ट’ ने तीन शहरों आगरा, भोपाल और राजकोट के श्मशानों में अंत्येष्टि की संख्या और सरकारों के जारी आंकड़ों से तुलना की तो भारी फर्क प्रगट हुआ।

 झूठ को फिर भी शर्म नहीं!

मैं थक गया, सूख गई स्याही.. पर झूठ न हारा। सांसें फड़फड़ा कर मर गईं… पर झूठ न पसीजा। गिद्धों ने नोचा जिंदा इंसानों (मरीजों) को.. पर झूठ नहीं लजाया। लोभी-लालची बन गए नरपशु…पर झूठ नहीं कांपा। चिताओं से जल उठे श्मशान …पर झूठ नहीं जला। शवों पर टूट पड़े कुत्ते… पर झूठ नहीं ठिठका।… गंगा रो पड़ी लाशों से… पर झूठ नहीं रोया। देवता हुए रूष्ट… पर झूठ नहीं घबराया। दुनिया सन्न लावारिस देश के लावारिसों को देख…पर झूठ आंकड़ों से चिंघाड़ता हुआ। दुनिया दौड़ी आई..पर झूठ मगरूर। गरीब-गुरबे बिना कफन रेत में दबते हुए… पर झूठ को फिर भी शर्म नहीं!…21वीं सदी के सन् इक्कीस में गंगा किनारे जा बने हिंदू जीवन की टायर-घासलेटी चिता के मुक्ति फोटो… क्या कोई विचलित?

साहेब तुम्हारे रामराज में..

वक्त का कमाल देखिए कि जिस कवियत्री (पारुल खक्कर) को गुजरात के लोग भजन लेखन के लिए जानते थे, उन्होंने वक्त की हकीकत पर सिर्फ चौदह लाइनों में मन के उद्गार लिखे और राजा का कथित भाग्य कंपकंपा गया। वे और उनके ट्रोल-लंगूर सैनिक उन पर टूट पड़े… यह मजाल।… पर सत्य तो सत्य। अपने आप कविता का कई भाषाओं में अनुवाद हुआ और पारूल खक्कर गुजरात में घर-घर चर्चित। उस कविता का हिंदी अनुवाद हैः

एक साथ सब मुर्दे बोले ‘सब कुछ चंगा-चंगा’

साहेब तुम्हारे रामराज में शव-वाहिनी गंगा

खत्म हुए शमशान तुम्हारे, खत्म काष्ठ की बोरी

थके हमारे कंधे सारे, आंखें रह गई कोरी

दर-दर जाकर यमदूत खेले

मौत का नाच बेढंगा

साहेब तुम्हारे रामराज में शव-वाहिनी गंगा

नित लगातार जलती चिताएं

राहत मांगे पलभर

नित लगातार टूटे चूड़ियां

कुटती छाती घर-घर

देख लपटों को फिडल बजाते वाह रे ‘बिल्ला-रंगा’

साहेब तुम्हारे रामराज में शव-वाहिनी गंगा

साहेब तुम्हारे दिव्य वस्त्र, दैदीप्य तुम्हारी ज्योति

काश असलियत लोग समझते, हो तुम पत्थर, ना मोती

हो हिम्मत तो आके बोलो

‘मेरा साहेब नंगा’

साहेब तुम्हारे रामराज में शव-वाहिनी गंगा

लोकतंत्र, नेतृत्व, व्यवस्था

जहां से चले वहीं पहुंचे मोदी!

अमेरिकी संसद और प्रशासन के लिए रिफरेंस वाले फ्रीडम हाउस संस्थान ने भारत को अब ‘आंशिक लोकंतत्र’ कैटेगरी में डाला है और इंटरनेट पांबदी में भारत दुनिया में नंबर एक पर है और उसके बाद यमन, इथियोपिया जैसे देश हैं!… ‘द इकोनॉमिस्ट’ पत्रिका ने पिछले सप्ताह नरेंद्र मोदी, गुरू गोलवलकर के विचार-तौर-तरीकों में हिटलर-नात्सीवाद का जिस अंदाज में रिफरेंस बनाया, उसका सीधा दो टूक अर्थ है कि ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’, ‘वाशिंगटन पोस्ट’, ‘गार्जियन’ से लेकर दुनिया के सभी सभ्य-विकसित लोकतांत्रिक देशों के मीडिया, थिंक टैंक, प्रशासन में इस्लाम, चाइनीज (जिस पर पिछले दो साल में नजरिया भारी बदला) के बाद हिंदू और हिंदू राजनीति पर विचार निगेटिव हुआ है। दुनिया की निगाह में नरेंद्र मोदी और उनका राज वैसे ही फिर बदनाम है जैसे बतौर गुजरात सीएम थे।… किसान आंदोलन से, सन् 2019 की दोबारा जीत के बाद से दुनिया में फिर यह स्थापित हो रहा है कि नरेंद्र मोदी, आरएसएस, हिंदू राजनीति वहीं है, जो इस्लामी तानाशाह, संगठनों और देशों की राजनीति है।… दिशा रवि पर देशद्रोह, तापसी पन्नू के यहा आईटी छापे, ओटीटी-इंटरनेट पर पांबदी के बेतुके नियमों से लेकर किसान आंदोलन, बूढ़ों-नौजवानों को जेलों में डालने जैसी बातों ने दुनिया का भारत पर ऐसा फोकस बनवाया है कि जिधर देखो उधर बदनामी है।… सन् 2016 के बाद से यह निष्कर्ष बार-बार लिखता आ रहा हूं कि हिंदू राजनीति को मोदी राज इतना बदनाम करके जाएगा, जिसकी कल्पना कभी किसी ने नहीं की होगी।

हिंदुवादी नहीं जातिवादी कैबिनेट!

भारत के प्रधानमंत्री और उनकी कैबिनेट का क्या मतलब है? एक ही लाइन का जवाब है कि गांव लेवल का जातिवाद अब केंद्रीय कैबिनेट की बुनावट है। आजाद भारत के इतिहास में पहले कभी ऐसे नहीं हुआ जो सात जुलाई को हिंदुवादी प्रधानमंत्री ने किया। कैबिनेट को जातियों में बांटा। जातियों के हिसाब से मंत्री पद बांट कर दुनिया को बताया कि हिंदू धर्म वह नारंगी है जो जातीय फांकों में बंटा हुआ है। कैबिनेट के केंद्रीय मंत्री जात से भारत को चलाते हैं। मुझे ध्यान नहीं पड़ रहा है कि केंद्रीय कैबिनेट की फेरबदल से पहले नगाड़ों का ऐसा कभी शोर हुआ हो कि इतने मंत्री ओबीसी-दलित के हैं।

 दीये से दिशा, अमित शाह, चिदंबरम, सबकी सिविल लिबर्टी!

भारत के मौजूदा गृह मंत्री अमित शाह को 25 जुलाई 2010 को वैसे ही जेल में डाला गया था जैसे उनके पूर्ववर्ती गृह मंत्री चिंदबरम को अमित शाह की पुलिस ने जेल में डाला। … 21 साला दिशा रवि को लोअर कोर्ट के जज राणा द्वारा जमानत पर रिहा करना व राजद्रोह या देशद्रोह के डंडे पर बेबाकी दिखाना सिर्फ सत्य और हिम्मत का मामला नहीं है, बल्कि 138 करोड़ नागरिकों की आजादी, मानवाधिकारों की मशाल की बानगी है।….. 21 साल की दिशा या 88 साल के वरवर राव सभी को (या एक वक्त में कथित हिंदू आतंक के नाम पर प्रज्ञा आदि) जेल में रखना ही देश रक्षा है तो तय मानें भारत हमेशा वैसे ही शापित रहना है, जैसे इतिहास में रहा है! ….एक 21 साला लड़की को राजद्रोही, देशद्रोही करार देने के लिए क्या-क्या नहीं किया!

संसद में क्या मौतों को मिलेगी श्रद्धांजलि?

आजाद भारत के इतिहास में सर्वाधिक गमी का वक्त कौन सा है? अपना मानना है कोविड-19 महामारी में अप्रैल-मई 2021 के दो महीने। इस अवधि में भारत में इतनी लावारिस मौतें हुईं कि पूरी दुनिया हिली। श्मशानों-कब्रिस्तानों की फोटो, ऑक्सीजन की कमी से फड़फड़ाते और मरते हुए भारतीय। भारत में वह हुआ और दुनिया ने उसे जैसे जाना, वैसा इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। … 19 जुलाई को जब संसद भवन में जन प्रतिनिधि सांसद इकठ्ठे होंगे तो हर के दिल-दिमाग में अपने-अपने जिले में मौत की असलियत निश्चित दर्ज होगी।

बिन ऑक्सीजन मौत.. इतना झूठ क्यों?

सचमुच दिमाग ने नहीं माना कि संसद में सरकार यह कह देगी कि ऑक्सीजन की कमी से मौतें नहीं हुईं। भला ऐसे सत्य को कैसे झुठला सकते हैं, जिसके फोटो हैं, जिसके मुंह जुबानी बोलते चेहरे हैं, जिसके रोते-बिलखते आंसू हैं।.. जब ऑक्सजीन की कमी से फड़फड़ाते लोगों को देखा है, परिवारजनों के आंसुओं को, लाशों को देखा है तब भी सत्य को नकारना।….क्या नरेंद्र मोदी और उनके सलाहकारों का दिमाग माने बैठा है कि दुनिया में भारत राष्ट्र-राज्य को झूठ का विश्व गुरू बनाना है।

उफ! हिंदुओं की जासूसी, उन्हें भयाकुल बनाना

आप दुनिया में ढूंढें भी तो ऐसे किसी प्रजातंत्र को नहीं खोज पाएंगे, जहां बहुसंख्यक आबादी इतनी भयाकुल और डरी हुई बना दी गई है, जैसे भारत के हिंदुओं को बनाया गया है। भारत का हर समझदार, मायने रखने वाला भारतीय आज इस भय से जीता हुआ है कि फोन बदलते रहो। फोन पर बात न करो और करो तो लैंडलाइन, मोबाइल कॉल नहीं, बल्कि सिग्नल से करो या टेलाग्राम से करो। भारत के अंबानी हो या केंद्र सरकार के मंत्री या पत्रकार, नेता, अफसर सब उन तरीकों से बात करते मिलेंगे, जिससे भय प्रकट होता है।

संस्थाएं जर्जर तो लोकतंत्र, आजादी?

सोचें, लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में संसद नाम की जो संस्था सबसे पहले आती है, जिसके ऊपर लोकतंत्र और आजादी दोनों की रक्षा का भार होता है, जिसका आचरण दूसरी हर संस्था के लिए मिसाल होता है, वहां क्या हो रहा है? संसद के चार हफ्ते के सत्र में सरकार ने विपक्ष की एक बात का जवाब नहीं दिया। पेगासस जासूसी मामले पर चर्चा नहीं कराई। महंगाई और किसानों के मुद्दे पर चर्चा नहीं हुई। महंगाई के मुद्दे पर विचार नहीं किया गया।

अगर संसद को इसी तरह से काम करना है तो हजारों करोड़ रुपए खर्च करके कोई नई इमारत खड़ी करने का क्या मतलब है? लोकतंत्र क्या इमारतों से बनता है? आजादी क्या इमारतों से सुनिश्चित होती है? हकीकत यह है कि पिछले सात साल में संसद की जरूरत और उसकी प्रासंगिकता दोनों क्रमशः कम होती गई है। बहस की संस्कृति लगभग खत्म है और संसदीय समितियों की जरूरत भी खत्म कर दी गई है।

गिद्ध देश

सॉफ्ट गोश्त.. कुछ मासूमियत और तरूणाई में कुरकुरा, परवरिश से मुलायम…. गर्म खून में हौले-हौले पका और लाल… वाह मेमना लाजवाब…फड़फड़ाता, रोता, कलपता और निर्विकार, निर्जीव सा इस ख्याल में खोया कि लोग मुझे किंग का मेमना बताते थे… मैं मुगालते में दुनियादारी से दूर, मेमनों-बकरियों के साथ मस्त था…लेकिन यह क्या? ऊपर से अचानक झपटा और समझ पाता उससे पहले ही उधड़ी खाल के साथ जंगल की गोश्त हॉट पॉट में पटका हुआ… भीड़ मुझे कैसे देख रही है.. गिद्ध, बाज, चील, भेड़िए, सियार, लोमड़ी आदि तमाम पशु-पक्षी इकठ्ठे होते, गर्दन उचका, मेरी ओर आंख टिकाए लार टपकाते हुए..

व्यासजी अब क्या होगा?

… आगे क्या होगा का सवाल अजीब वक्त का अजीब अर्थ लिए हुए है। याद करें नेहरू-वाजपेयी जैसे प्रधानमंत्री और उनके समवर्ती जीडी बिड़ला या नारायण मूर्ति जैसे महासेठों को। तब ये जैसे चैन, सुरक्षा और सहजता से जीते हुए थे वैसे मोदी, अंबानी, अडानी जीते हुए हैं? नहीं। नरेंद्र मोदी का वर्तमान लगातार अपनी सुरक्षा, चौबीसों घंटे चुनाव जीतने की चिंता में है। वे अपनी परछाई को भी हर दिन सुबह नापते-मापते-देखते सोचते होंगे कि किसानों का धरना मेरा खतरा। फ्रांस के अखबार में हेडिंग तो अब क्या होगा? तभी नरेंद्र मोदी को हर दिन नए भाषण, नई-नई हेडलाइन, नए शृंगार, आज की इवेंट सोच-सोच कर वक्त काटना होता है? क्या ऐसे नेहरू, वाजपेयी का सत्ता वक्त गुजरा था?

विदेश नीति

भारत की विदेश नीति खत्म!

बहुत बुरा लगा अपनी ही प्रजा पर गोलियां चलाने वाली सेना के साथ भारतीय सेना की उपस्थिति की खबर सुन कर! उफ! क्या हो गया है भारत को? हम किन मूल्यों, आदर्शों और संविधान में जीते हुए हैं? जो हमारा धर्म है, हमारा संविधान है, हमारी व्यवस्था है, उसमें कैसे यह संभव जो हम खूनी के साथ खड़े हों। .. पता नहीं आपने जाना या नहीं कि प्रजा के खून से रंगी म्यांमारी सेना के 27 मार्च के सालाना दिवस के समारोह में भारतीय सेना के प्रतिनिधि सैनिक अटैची ने तानाशाह सेनापति का हौसला बढ़ाया।… भारत में म्यांमार की सैनिक तानाशाही की निंदा की हिम्मत नहीं है, अफगानिस्तान, ईरान, पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल कहीं भी चीन के कूटनीतिक-सामरिक-सैनिक दबदबे के प्रतिरोध का सामर्थ्य लिए हुए नहीं है तो क्या तो भारत की विदेश नीति और क्या भारत का नेतृत्व!

 

मोदी राजः भारत कितना ठुकेगा?  

सवाल है किसी देश का ठुकना क्या होता है? जब दुश्मन उसकी सीमा में घुस अपना डेरा बनाए। जब देश अपने-अगल-बगल में अकेला पड़ जाए। जब दुश्मन देश से सशस्त्र घुसपैठिए घुसें और देश की सेना के जवान मारें? जब दो दुश्मन मिलकर सीमा पर ऐसा उत्पात करें कि देश को सीमा पर महीनों-सालों सेना को सीमा पर तैनात रखना पड़े। जब छोटे-छोटे पड़ोसी भी आंखें दिखाने लगें? जब दुश्मन की धौंस के बावजूद उससे धंधा करते रहें।…सोचें क्या ये तमाम बातें भारत पिछले पांच सालों से भुगतते हुए नहीं है? इसमें सबसे भयावह और भविष्य के नाते सर्वाधिक चिंताजनक घटना है भूटान की चीन के साथ सहमति।

भारत के पास अमेरिका है!

चीन यदि अरूणाचल प्रदेश से ले कर लद्दाख के अपने दांवों में भारत की सीमाओं में घुसे, आक्रामकता दिखाए तो भारत की तुरूप कार्ड क्या होगी? वह पैंगोंग झील, डोकलाम, तवांग को कैसे बचाएगा?….नया संभव जवाब यह है अमेरिका है न अपना!

अर्थव्यवस्था

आर्थिकी भी खलास!

हिसाब से आर्थिकी की बरबादी को नंबर एक पर मानना चाहिए। पर मैं अशिक्षा, अज्ञानता को इसलिए अधिक घातक-गंभीर समझता हू क्योंकि यदि भारत (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, हम-आप से लेकर आम नागरिक सभी) अशिक्षा-अज्ञान के वायरस में जकड़ गए तो आर्थिकी के सकंटों का आगे निदान ही संभव नहीं।…2020-21 की विकास दर में 7.3 प्रतिशत की गिरावट की खबर आईसबर्ग का महज ऊपरी हिस्सा था। पानी के नीचे समुद्र में 140 करोड़ लोगों का जीवन बरबादी की उन जंजीरों में जकड़ा है, जो महामारी के बाद भी जस की तस रहेगी।

जीने की आजादी मतलब पांच किलो अनाज

सरकार गर्व से कह रही है कि वह देश के 81 करोड़ से ज्यादा लोगों को पांच किलो अनाज और एक किलो दाल दे रही है। यह सम्मान से जीना नहीं, बल्कि खैरात पर जीना है। सम्मान से जीने का मतलब है कि सरकार हर नागरिक के लिए काम-धंधे का बंदोबस्त करे। उसकी एक निश्चित कमाई सुनिश्चित करे ताकि वह अपना जीवन सम्मान के साथ जी सके। लेकिन रोजगार के अवसर बनाने में विफल रही सरकार अनाज बांट कर अपनी उपलब्धि बता रही है।

जिधर सुनो उधर अडानी!

गजब है और दुनिया में ऐसा कहीं, कभी नहीं हुआ! क्या दुनिया में कोई ऐसी मिसाल है कि किसानों का हल्ला हो तो अडानी! सरसों तेल के मंहगे होने का हल्ला हो तो चर्चा में अडानी! प्रधानमंत्री ऑस्ट्रेलिया जाएं तो कोयले की खान की खबरों में अडानी। म्यांमार में सैनिक शासन से रिश्ते की बात हो तो अडानी! श्रीलंका में पोर्ट का मामला हो तो अडानी।

जिधर देखो उधर अंबानी

हिंदुओं के आधुनिक काल याकि अंग्रेजों के भारत आने के बाद के ढाई सौ सालों पर यदि समग्रता से विचार हो तो अपना मानना है कि जगत सेठ, मुकेश अंबानी और गौतम अडानी नाम के तीन कुबेर ऐसे इतिहासजन्य हैं, जिनसे हिंदुओं की तकदीर, गुलामी और शोषण का इतिहास रचा या रचता हुआ है। आज के अंबानी और अडानी कई मायनों से जगत सेठ के भी गुरू हैं।

दोनों का डंका एक सा!

देश और पूरी दुनिया में इस समय मुकेश अंबानी और गौतम अडानी का डंका बज रहा है। सोशल मीडिया के भक्त लंगूरों के मुताबिक दुनिया की राजनीति और कूटनीति में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का डंका है तो कारोबार की दुनिया में दो गुजराती कारोबारियों अंबानी और अडानी का डंका बज रहा है।

लोकसभा में डंके की चोट अंबानी-अडानी

जनसंघ-भाजपा-संघ की एकात्म मानवतावादी विचारधारा के जनक पंडित दीनदयाल उपाध्याय की 53वीं पुण्यतिथि के दिन नरेंद्र मोदी ने सबको संदेश दिया कि देश का भविष्य अंबानी-अडानियों से है। देश के लिए वेल्थ क्रिएटर्स (खरबपति) जरूरी हैं। निजी क्षेत्र के खिलाफ अनुचित शब्दों का इस्तेमाल, उनके टेलीकॉम टॉवर या प्रतिष्ठानों को निशाना बनाना गलत है।… जो हो मैं कायल हो गया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लोकसभा में अंबानी-अडानी याकि खरबपति वेल्थ क्रिएटरों से देश के 138 करोड़ लोगों के कल्याण होने की दो टूक घोषणा से। ….

बाबुओं छोड़ो सब और बेचों खरबपतियों को!

सोचें, आईएएस अफसरों को लोकसभा में प्रधानमंत्री ने ‘बाबू’ कहा।.. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में जो आईना दिखाया वह आजाद भारत की इतिहासजन्य घटना है। क्या गजब वाक्य कि क्या सब कुछ बाबू ही करेंगे? आईएएस बन गया मतलब वह फर्टिलाइजर का कारखाना भी चलाएगा, आईएएस हो गया तो वह हवाई जहाज भी चलाएगा। यह कौन सी बड़ी ताकत बना कर रख दी है हमने? बाबुओं के हाथ में देश दे करके हम क्या करने वाले हैं?

गृह युद्ध की राजनीति

यह गृह युद्ध की राजनीति नहीं तो क्या?

हिंदुओं को डराया जा रहा है तो मुसलमानों में तालिबान, उग्रवादियों की ओर देखने, कट्टरपंथी बनने की मनोदशा बनवाई जा रही है। एक तरफ हिंदू मनोदशा में तालिबानी विलेन व दूसरी तरफ मुस्लिम मनोदशा में तालिबानी महानायक!… इससे दस-बीस सालों में भारत एपिसेंटर बने तो आश्चर्य नहीं होगा। इसे क्या मोदी सरकार, हिंदू राजनीति के मौजूदा कर्णधारों को बीस-पच्चीस साल के टाइम फ्रेम में नहीं सोचना चाहिए? पर जैसा मैं लिखता रहा हूं, हजार साल का सत्य है हिंदुओं को पहले तो राज का मौका नहीं मिलता है और मिलता है तो राज करना नहीं आता।…. क्या गलत है?

तालिबान का खतरा और मोदी की जयकार!

… केंद्रीय मंत्री ने अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार बनने के बहाने सीएए को लेकर ‘थैंक्यू मोदी जी’ कहा और उसके बाद प्रधानमंत्री मोदी की जय जयकार शुरू हो गई।… इसी तरह एक नैरेटिव यह बना है कि सोचें, इस समय भारत में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं होते तो क्या होता?

 अमृत महोत्सव के साल में जहर!

हकीकत यह है कि आजादी के 75 साल के बाद भारतीयता की पहचान पहले के मुकाबले कमजोर हुई है और धर्म व जाति की पहचान मजबूत हुई है। वोट की राजनीति की खातिर समाज में मौजूद विभाजन को बढ़ाया गया है। इसका दोष किसी एक राजनीतिक दल को या किसी एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन को नहीं दिया जा सकता है। इसमें सब दोषी हैं। लेकिन पिछले छह-सात साल इस मामले में निर्णायक रहे हैं। नोएडा के बिसहाड़ा गांव में 2015 में अखलाक अहमद की लिंचिंग से शुरू हुई प्रक्रिया आज कानपुर के असरार अहमद तक पहुंची है।

हिंदू कोर वोट में योगी नंबर 1

हां, यदि यह मानें कि भारत के कुल मतदाताओं में बीस करोड़ कट्टर हिंदूवादी वोट हैं और ये सिर्फ हिंदू-मुस्लिम राजनीति में पके हुए हैं तो इन वोटों में अब नंबर एक हीरो योगी आदित्यनाथ हैं।

मोदी-शाह सेर तो योगी सवा सेर!

जरा इस सवाल पर गौर करें कि पिछले साढ़े चार सालों में भाजपा के किस मुख्यमंत्री का ग्राफ नरेंद्र मोदी और अमित शाह के मुकाबले बढ़ा है? जवाब है योगी आदित्यनाथ का! प्रमाण क्या है? ताजा प्रमाण ‘इंडिया टुडे’ का लोकप्रियता सर्वे है। मूड ऑफ नेशन के इस सर्वे में नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता 66 प्रतिशत से घट कर 24 प्रतिशत रह गई जबकि योगी आदित्यनाथ की बढ़ कर 11 प्रतिशत हो गई।

राजनीति और झाग

अमरेंदर की बट्टी, गोदी मीडिया का झाग!

उफ! पटियाला के बूढ़े महाराजा का साबुन की बट्टी की तरह भाजपाई राजनीति का औजार बनना! भाजपा ने गुजरे सप्ताह इस बट्टी को ऐसा घिसा कि कभी सनसनी भाजपा में अमरेंदर सिंह के शामिल होने की।… यदि वे अकेले पार्टी बना कर या भाजपा का चेहरा बन कर पंजाब में चुनाव लड़ें तो दो-तीन सीटें भी नहीं मिलेगी। अमरेंदर सिंह को अंदाज नहीं है कि भाजपा के लिए साबुन की बट्टी बन कर झाग पैदा करवा कर उन्होंने जीवन भर की अपनी सिख राजनीति को ब्यास नदी में बहा डाला है। अमरेंदर सिंह का अब जीरो मतलब हो गया है।

विपक्ष को चाहिए जेपी, अन्ना

लखीमपुर में किसान आंदोलन की घटना के राजनीतिक बवाल से फिर प्रमाणित है कि जब तक जेपी या अन्ना हजारे जैसा अराजनीतिक नेतृत्व नहीं उभरेगा तब तक न जन असंतोष में दम बनेगा और न विपक्ष एकजुट होगा। भाजपा और मोदी सरकार को लेकर मोहभंग है, असंतोष है, गुस्सा है, मुद्दे हैं, आंदोलन है लेकिन वह चुंबक नहीं है, जिससे सब खींच कर एकजुट हो जाएं। उस नाते ठीक इंदिरा गांधी के वक्त जैसी स्थिति है।

भारत में चुनाव ही चुनाव

क्या कभी चुनावों से मुक्ति मिलेगी? क्या कभी ऐसा आदर्श समय आएगा, जब सारे चुनाव एक साथ हो जाएं और उसके बाद सरकारें राजनीति को किनारे रख कर पांच साल सुशासन पर ध्यान दें?… जब हर साल पांच-सात राज्यों के चुनाव होंगे और हर साल कुछ न कुछ उप चुनाव होते रहेंगे, जिन्हें पार्टियां मिनी विधानसभा चुनाव की तरह लड़ेंगी तो कामकाज कब होगा? क्या सरकारें, पार्टियां और आम नागरिक सारे समय चुनाव में नहीं उलझे रहेंगे?

मोदी अभी से 24 की चिंता में!

यह वैसे सही बात है कि नरेंद्र मोदी चुनाव की चिंता करते हुए कब नहीं होते! उनकी कमान और राज की पहचान यह साबित करते रहना है कि उनकी जीत लगातार है। गुजरात के मुख्यमंत्री के नाते उनकी पहचान थी कि वे वहां लगातार चुनाव जीतते रहे तो दिल्ली में प्रधानमंत्री बनने के बाद भी यहीं पहचान कि वे चुनाव नहीं हार सकते। सवाल है जब ऐसा ट्रैक रिकार्ड है तो क्या तुक जो चौबीसों घंटे चुनावी मोड में रहा जाए? हर दिन जनता के आगे नई-नई झांकी और भाषण का प्रायोजन! हर दिन राजनीति, हर दिन सुर्खियों का, टीवी पर चेहरे के दर्शन का मैनेजमेंट और कभी कौन सा फोटोशूट तो कभी कौन सा!

2024 तक लोक लुभावन राजनीति

प्रधानमंत्री का हर कदम अब 2024 की राह में उठ रहा है। असली चिंता 2024 की है। उसी चिंता में कृषि कानून वापस हुए हैं और उसी चिंता में श्रम सुधारों के कानूनों पर अमल टल रहा है। प्रधानमंत्री से लेकर वित्त मंत्री तक सब दावा करते थे कि सरकार सुधार जारी रखेगी। लेकिन अब कोई बड़ा सुधार नहीं होना है। अगले दो साल सिर्फ लोक लुभावन राजनीति होगी। कृषि कानून वापस लेकर सरकार ने इसकी शुरुआत कर दी है।

 

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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