कांग्रेस के लिए उम्मीदों का साल!

नया साल कांग्रेस के लिए उम्मीदों का साल है। इस साल कांग्रेस भारतीय राजनीति की मुख्यधारा में अपनी गंवा चुकी जगह को वापस हासिल करने की उम्मीद कर सकती है। हालांकि इस उम्मीद का पूरा होना आसान नहीं है। फिर भी यहीं साल है, जब कांग्रेस कुछ सकारात्मक होने की उम्मीद कर सकती है और उसकी तैयारी कर सकती है। इसके लिए कांग्रेस के पास अगले तीन महीने का समय है। अप्रैल-मई में होने वाले पांच राज्यों के चुनाव में कांग्रेस का बहुत कुछ दांव पर है। अगर इस बार कांग्रेस ने सही कदम उठाए, सही राजनीतिक दांव चले और जीतने वाले या कम से कम बराबरी की टक्कर देने वाला गठबंधन बनाया तो अगले साल के चुनावों में कांग्रेस मुकाबले में रहेगी।

इस साल जिन पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं उन राज्यों में भाजपा का मजबूत संगठन सिर्फ असम में है। पश्चिम बंगाल में भाजपा भले दो सौ सीट जीतने और सरकार बनाने का लक्ष्य लेकर चुनाव लड़ रही है, लेकिन हकीकत यह है कि उसकी लड़ाई संगठन और अपने नेताओं के दम पर नहीं, बल्कि भावनात्मक मुद्दों के दम पर है, जिसमें जीत हासिल होना एक संयोग ही होगा। बंगाल में भाजपा से बेहतर संगठन कांग्रेस पार्टी का है। ऐसे ही केरल में पिछले चुनाव में भाजपा 14 फीसदी वोट लेने में कामयाब रही थी पर इस बार वह प्रदर्शन दोहरा पाएगी, इसमें संदेह है। वहां सीधा मुकाबला कांग्रेस के गठबंधन बनाम लेफ्ट गठबंधन में है। तमिलनाडु में भाजपा को उसकी सहयोगी अन्ना डीएमके ने ही हैसियत दिखाते हुए कहा है कि उसे जितनी सीटें दी जाएंगी उतनी लेकर गठबंधन में रहना है तो रहे वरना बाहर जाए। पुड्डुचेरी में भी भाजपा के पास न संगठन है और न कोई नेता है। हां, उप राज्यपाल किरण बेदी जरूर, भाजपा की अलख जगाए हुए हैं। अगले साल सात राज्यों के चुनाव हैं, अगर इस साल कांग्रेस इन पांच राज्यों में अच्छा प्रदर्शन नहीं करती है तो पार्टी नेताओं का मनोबल बनाए रखना और पार्टी को एकजुट रखना मुश्किल हो जाएगा।

सबसे पहले पश्चिम बंगाल के चुनाव की बात करते हैं। पिछली बार की तरह कांग्रेस इस बार भी वाम मोर्चे के साथ मिल कर चुनाव लड़ रही है। पिछले चुनाव में कांग्रेस को वाम मोर्चे से तालमेल का लाभ मिला था वह अपनी सीटें बचाने में कामयाब रही थी और भले बहुत अंतर से सही, लेकिन राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी बनी थी। लेकिन इस बार ऐसा होना मुश्किल लग रहा है क्योंकि इस बार सीधा मुकाबला तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच है। इसके बावजूद कुछ सीटें ऐसी जरूर हैं, जहां सीधा मुकाबला नहीं है। कांग्रेस को इन्हीं त्रिकोणात्मक मुकाबले वाली सीटों की पहचान करनी होगी और वहां दम लगा कर लड़ना होगा। कांग्रेस ने अधीर रंजन चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बना कर बंगाल में पहला दांव ठीक चला है। अब अगर पार्टी वाम मोर्चे से तालमेल में अधीर चौधरी के असर वाले इलाके में ज्यादा सीटें लेकर लड़ती है तो वह सम्मानजनक सीटें हासिल कर सकती है। बिहार की तरह बहुत ज्यादा सीटें लेकर लड़ने की बजाय कांग्रेस को ऐसी सीटों पर लड़ना चाहिए, जहां उसके पास मजबूत उम्मीदवार हो और पहले से पार्टी का मजबूत संगठन हो।

असम में कुछ दिन पहले तक लग रहा था कि कांग्रेस महागठबंधन बना कर अच्छा प्रदर्शन कर सकती है। पर तरुण गोगोई के निधन के बाद हालात बदल गए हैं। अब कांग्रेस के पास कोई ऐसा चेहरा नहीं है, जो सभी विपक्षी पार्टियों को एकजुट कर सके। दूसरी ओर भाजपा ने अपनी स्थिति मजबूत की है। उसने असम गण परिषद से तालमेल बनाए रखा। बोडोलैंड पीपुल्स पार्टी से जरूर उसका तालमेल खत्म हुआ है पर उसने इसके दो बड़े और असरदार नेताओं को तोड़ कर अपने साथ मिला लिया है। कांग्रेस के नेता बदरूद्दीन अजमल की पार्टी एआईयूडीएफ से तालमेल की बात कर रहे हैं। पर बेहतर होगा कि पार्टी अकेले लड़े क्योंकि कांग्रेस और अजमल के साथ आने से मुकाबला आमने-सामने का होगा और ऐसे में भाजपा को ध्रुवीकरण कराने में मदद मिलेगी। इससे बेहतर है कि कांग्रेस बहुकोणीय मुकाबला होने दे। ऑल असम स्टूडेंट यूनियन यानी आसू ने भी पार्टी बनाई है और अखिल गोगोई की पार्टी भी चुनाव लड़ेगी। हाग्राम मोहिलारी की बीपीएफ पहले से बोडोलैंड इलाके की मजबूत पार्टी है। अगर आसू, गोगोई और मोहिलारी की पार्टी से कांग्रेस का तालमेल हो तो कांग्रेस को बहुत फायदा हो सकता है। संशोधित नागरिकता कानून यानी सीएए की वजह से स्थानीय लोगों में जो नाराजगी है उनके एकमुश्त वोट इनको मिल सकते हैं। अगर ये पार्टियां अलग अलग लड़ती हैं तो सीएए विरोधी वोट बिखरेगा, जिसका फायदा भाजपा को होगा।

तमिलनाडु में कांग्रेस और डीएमके एक साथ हैं। लोकसभा चुनाव में इनके गठबंधन को शानदार जीत मिली थी। अगर विधानसभा चुनाव में गठबंधन वह प्रदर्शन दोहराता है तो फिर कांग्रेस महाराष्ट्र, झारखंड आदि राज्यों की तरह एक बड़ी क्षेत्रीय पार्टी के साथ सत्ता में साझीदार हो सकती है। यह भी कम बड़ी उपलब्धि नहीं होगी क्योंकि दोनों पार्टियां दस साल से राज्य की सत्ता से बाहर हैं। इसके लिए भी कांग्रेस को डीएमके के हिसाब से काम करना होगा। बिहार की तरह अगर वहां भी कांग्रेस ज्यादा सीटों के लिए अड़ी तो संतुलन बिगड़ेगा क्योंकि डीएमके और कांग्रेस के अलावा इस गठबंधन में दोनों कम्युनिस्ट पार्टियां हैं, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग है और दलित समुदाय में असर रखने वाली पार्टी वीसीके भी है। कांग्रेस को इसका ध्यान रखते हुए डीएमके नेता स्टालिन को अपने हिसाब से सीटों का बंटवारा और प्रचार की रणनीति तय करने देना चाहिए।

कांग्रेस अपने दम पर या अपने चुनाव पूर्व गठबंधन के साथ केरल में सरकार बनाने की उम्मीद कर सकती है। उम्मीद का आधार यह है कि केरल में हर पांच साल में सत्ता बदलती है। पांच साल एलडीएफ तो पांच साल कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूडीएफ सत्ता में रहता है। अभी एलडीएफ की सरकार है और पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस गठबंधन ने इस राज्य में अभूतपूर्व प्रदर्शन किया, राहुल गांधी इसी राज्य की वायनाड सीट से सांसद हैं, ऐसे में कांग्रेस अच्छा प्रदर्शन करने की उम्मीद कर सकती है। हाल में हुए स्थानीय निकाय चुनाव में लेफ्ट मोर्चे का प्रदर्शन बहुत अच्छा रहा है। लेकिन वह विधानसभा चुनाव के आकलन का आधार नहीं हो सकता है क्योंकि निकाय चुनावों में आमतौर पर सत्तारूढ़ दल को ही जीत मिलती है। भाजपा प्रदेश में बड़े अंतर से नंबर तीन की पार्टी है। इसलिए मुकाबला एलडीएफ बनाम यूडीएफ होगा। अगर कांग्रेस गठबंधन की सहयोगियों के साथ ठीक तरीके से सीटों का बंटवारा करती है और आपस में लड़ रहे पार्टी के बड़े नेताओं के बीच की गुटबाजी को खत्म करके चुनाव लड़ती है तो केरल की सत्ता में उसकी वापसी हो सकती है।

जहां तक पुड्डुचेरी का सवाल है तो वह एकमात्र राज्य है, जहां कांग्रेस की सरकार है। लेकिन वहां भी कांग्रेस गठबंधन के जरिए ही अपने को बचा सकती है। अगर डीएमके और कांग्रेस का तालमेल रहता तो कांग्रेस के लिए अवसर बन सकता है। लेकिन यह इस पर निर्भर करेगा कि पूर्व मुख्यमंत्री एन रंगास्वामी की पार्टी एआईएनआरसी अकेले लड़ती है या वह भी तालमेल करती है। अगर अन्ना डीएमके से उसका तालमेल होता है तो मुकाबला कांटे हो जाएगा। भाजपा को पिछली बार तीन सीटें मिली थीं और वह भी इस बार तमिलनाडु की अपनी सहयोगी अन्ना डीएमके को साथ लेकर चुनाव में जोर लगाएगी।

कुल मिला कर इस साल के चुनाव में कांग्रेस के लिए अवसर हैं, लेकिन यह कांग्रेस पर निर्भर करेगा कि वह इस अवसर को जीत में कैसे बदलती है। कांग्रेस उम्मीदों के इस साल की शुरुआत राहुल गांधी को अध्यक्ष बनाने के साथ कर सकती है। अगर एक महीने के अंदर राहुल फिर से कांग्रेस की कमान संभाल लेते हैं और अपनी टीम बना कर इन पांचों राज्यों में मेहनत करते हैं तो ऐसे नतीजे हासिल कर सकते हैं, जिनसे आगे की राजनीति कांग्रेस के लिए आसान हो जाएगी। अपनी जीत के साथ साथ भाजपा के लिए अपेक्षाकृत कमजोर इन राज्यों में भाजपा को रोकना भी उनकी रणनीति होनी चाहिए। इसके लिए जरूरी हो तो कांग्रेस क्षेत्रीय पार्टियों के लिए अपना हित कुछ हद तक छोड़ भी सकती है।

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