जफरुल इस्लाम खान का ट्वीट

दिल्ली माइनॉरिटी कमीशन के चेयरमैन जफरुल इस्लाम खान पर हाई कोर्ट में सुनवाई होनी है। इस बीच लेफ्टिनेंट गवर्नर जाँच रहे हैं कि क्या जफरुल जी का पद पर बने रहना उचित है? यह सब एक ट्वीट के कारण जो जफरुल जी ने इधर किया। वह ट्वीट एक क्लासिक है। जिस से यहाँ प्रबुद्ध कहाने वाले मुसलमानों की मानसिकता, इतिहास, और हिन्दू सत्ताधारियों का भोलापन सब दिखता है। पहले वह ट्वीट (अनुवाद) पढ़ें:

‘‘भारतीय मुसलमानों के साथ खड़े होने के लिए कुवैत को शुक्रिया!  कट्टरपंथी हिन्दुओं ने समझा था कि आर्थिक कारणों से अरब व मुस्लिम दुनिया भारत में मुसलमानों के उत्पीड़न पर कुछ नहीं बोलेगी।

ये कट्टरपंथी भूल गए कि इस्लामी उद्देश्यों के लिए सदियों से किए कामों के लिए भारतीय मुसलमानों की अरब व मुस्लिम विश्व में बड़ी कद्र है। इस्लामी व अरबी विद्वता, सांस्कृतिक व सभ्यतागत देन के लिए भी। शाह वलीउल्लाह देहलवी, इकबाल, अब्दुल हसन नदवी, वहीदुद्दीन खान, जाकिर नायक, और कई नाम अरब व मुस्लिम दुनिया में आदर से घर-घर जाने जाते हैं।

याद रखो, कट्टरपंथियों, भारतीय मुसलमानों ने अभी तक तुम्हारे घृणा अभियान और लिंचिंग और दंगों की अरब व मुस्लिम दुनिया से शिकायत नहीं की है! जिस दिन वे ऐसा करने को मजबूर हुए, कट्टरपंथियों को जलजले का सामना करना पड़ेगा। – जफरुल इस्लाम खान, चेयरमैन, दिल्ली माइनॉरिटीज कमीशन, 28 अप्रैल 2020’’

इस तरह, जफरूल जी ने (1) भारतीय मुसलमानों को देश के अंदर अलग देश दिखाया, जिसे संविधान, न्यायपालिका को छोड़ मुस्लिम देशों का भरोसा व घमंड है, (2) इस्लामी उद्देश्यों के लिए सदियों से भारतीय मुसलमानों के काम पर फख्र किया, (3) कुछ भारतीय मुस्लिम विद्वानों को पूरे मुस्लिम विश्व में आदरणीय बताया, और (4) मुस्लिम देशों द्वारा भारत के हिन्दुओं को दंड दिलाने की धमकी दी।

यह चारो बातें गत सौ साल से यहाँ मुस्लिम राजनीति की बुनियाद हैं। इन में पहली, चौथी काफी लोग समझते हैं। लेकिन दूसरी, तीसरी बात के गंभीर माने लोग अधिक नहीं जानते। ‘इस्लामी उद्देश्यों के लिए सदियों काम’ का अर्थ हैः जिहाद से इस्लाम का विस्तार। प्रोफेट मुहम्मद ने इस से बड़ा कोई उद्देश्य नहीं बताया था। सो यहाँ ‘सदियों से’ बाहरी नृशंस मुसलमानों के जिहाद का श्रेय जफरूल जी भारतीय मुसलमानों को दे रहे हैं। यह भूल कर कि यहाँ एकाध प्रतिशत मुसलमान ही तुर्की, अरबी मूल के होंगे। शेष के पूर्वज हिंसा, बलात्कार, अपमान, व धमकी द्वारा हिन्दुओं से मुसलमान बनाए गए लोग हैं। किन्तु अपने पूर्वजों पर इस्लामी जुल्म को जफरूल जी ‘भारतीय मुसलमानों का काम’ कहकर फख्र करते हैं!

इसकी पुष्टि उन की तीसरी बात भी करती है। जिन भारतीय मुस्लिमों को वे ‘अरब व मुस्लिम विश्व में आदरणीय’ बता रहे हैं, उन की ‘सभ्यतागत देन’ हिन्दू धर्म-समाज से घृणा, भारत पर चोट, और छल-बल से इस्लामी दबदबा बनाने की कोशिश के सिवा कुछ नहीं। जफरूल जी ने पाँच नाम लिए, जिन में एक उन के पिता मौलना वहीउद्दीन खान भी हैं। उन्हीं से शुरू कर देखें, कि इन भारतीय मुस्लिमों के विचार और काम क्या रहे हैं।   मौलाना वहीदुद्दीन (1925- ) तबलीगी जमात के बड़े सरपरस्त हैं। उन की पुस्तक तबलीगी मूवमेंट में जमात के प्रमुख द्वारा मुसलमानों को सिखाया गया है: ‘‘याद रखो! ‘मेरा देश’, ‘मेरा क्षेत्र’, ‘मेरे लोग’, आदि चीजें इस्लामी एकता तोड़ने की ओर जाती हैं। इन सब को अल्लाह किसी भी चीज से ज्यादा नामंजूर करता है।’’ यानी देश को भूल कर इस्लाम मजबूत करो। सो, जफरूल जी अपने पिता की सीख पर चल रहे हैं। मौलाना की पूरी पुस्तक तबलीगी जमात की गदगद बड़ाई है।

दूसरे आलिम शाह वलीउल्लाह (1703-62) हैं, जिन्होंने अफगानिस्तान के अहमद शाह अब्दाली को भारत पर हमला करके यहाँ फिर इस्लामी राज बनाने का न्योता दिया था। साथ ही, वे यहाँ मुसलमानों को भारतीय पहचान से काट कर पक्का इस्लामी बनाना चाहते थे, जिसे हर हिन्दू विचार, चिन्ह और रिवाज से घृणा हो। जिस में जिहाद द्वारा पूरे भारत को इस्लामी बनाने के सिवा कोई ख्वाहिश न बचे।

तीसरे हैं अबुल हसन अली नदवी (1914-1999) उर्फ अली मियाँ। ये तबलीगी जमात के उपाध्यक्ष, दारुल-उलूम देवबंद के प्रमुख, आदि पदों पर रहे थे। अली मियाँ यहाँ गो-हत्या को ‘अजीम इस्लामी काम’ मानते थे। उन्होंने एक भाषण (जेद्दाह, 3 अप्रैल 1986) में भारतीय मुसलमानों को समझाया था कि भारत में गोकशी करना जरूरी है, वरना मुसलमान भी हिन्दुओं जैसे गाय को आदर देने लग सकते हैं। फिर, कारगिल-युद्ध के समय अली मियाँ भारत की जीत के लिए दुआ के खिलाफ थे, क्योंकि ‘इसका मतलब जिहादियों की हार के लिए दुआ करना होगा।’ इस से बहुत पहले अली मियाँ ने कराची में यह भी कहा था कि 1971 ई. में पाकिस्तान टूटने से भारतीय मुसलमान बड़े दुखी हुए। और कि, “सारी दुनिया के मुसलमान और भारतीय मुसलमान भी मदद और दिशा-निर्देश के लिए पाकिस्तान की तरफ हसरत से देखते हैं।” (‘बैक टु स्क्वायर वन’, रिडिफ डॉट कॉम, 17 जुलाई 2000)

अली मियाँ के अनुसार, भारत ग्रीक, रोमन, जैसी लुप्त सभ्यताओं की तरह ‘‘प्राचीन स्मारक से अधिक कुछ नहीं है। केवल इस्लाम ही भारत को इस्ताम्बुल से जकार्ता तक के देशों का सरदार बना सकता है।’’ इस का उपाय बताते हुए उन्होंने कहा, ‘‘मजहबी-तंत्र तब तक नहीं बन सकता जब तक कि मजहब के हाथ में राज-सत्ता न आ जाए और सरकार इस्लामी बुनियादों पर आधारित हो।’’ (मौलाना वहीदुद्दीन खान, तबलीगी मूवमेंट)। इस प्रकार, अली मियाँ भारत में इस्लामी राज बनाने को कटिबद्ध थे। यानी हिन्दू धर्म, समाज का पूर्ण विनाश।

जफरूल जी के अगले आलिम इकबाल (1877-1938) हैं। जो पाकिस्तान के वैचारिक जनक भी माने जाते हैं। उन्होंने लिखा था, “इन ताजा खुदाओं में सब से बड़ा वतन है। जो पैरहन है उस का वो मजहब का कफन है”। यानी, देशभक्ति इस्लाम के लिए मौत समान है।जाकिर नायक पर कुछ कहने की जरूरत नहीं। वे अपनी ‘विद्वता’ की बदौलत भारतीय कानून से भाग कर अरब में छिपे बैठे हैं।इस प्रकार, जफरूल जी के पाँचों महान भारतीय मुस्लिम इस्लामी कट्टरता और हिन्दुओं व भारत से दुराव के उदाहरण हैं। इसी ‘सभ्यतागत देन’ पर वे अरब मुसलमानों पर अहसान जता रहे हैं!

इस मानसिकता में कुछ नया नहीं। सौ साल पहले कांग्रेस अध्यक्षा और प्रख्यात विदुषी एनी बेसेंट ने कहा था, “मुसलमानों की पहली वफादारी मुस्लिम देशों के प्रति है, मातृभूमि के प्रति नहीं। यह उन्हें बुरा नागरिक साबित करता है, क्योंकि उन की निष्ठा के केंद्र राष्ट्र से बाहर है।” (डॉ. अंबेदकर, ‘संपूर्ण वाङमय’, खंड 15, पृ. 273)। हमारे अनेक महापुरुषों ने यही पाया था। स्वयं डॉ. अंबेदकर के शब्दों में, “इस्लाम का बंधुत्व अपने ही लोगों तक सीमित है और जो इस से बाहर हैं, उन के लिए इस में सिर्फ घृणा और शत्रुता ही है।”

उसी घृणा और शत्रुता से जफरुल जी भारत को धमकी दे रहे हैं। इस घातक इतिहास के बावजूद हमारे नेता ऐसे कट्टरपंथी मुसलमानों को ही पद-सम्मान देते हैं। मानवतावादी मुसलमानों को नहीं। नतीजन जफरूल जी जैसे लोग ‘उलटा चोर कोतवाल को डाँटे’ वाली कहावत चरितार्थ करते हैं। मानो, हिन्दुओं को अपने धर्म-समाज का विनाश सिर झुका के मानना चाहिए! वरना उन्हें कट्टरपंथी और दंगाई कह कर जलील किया जाएगा। यद्यपि दंगों का पूरा इतिहास उलटा है। इस प्रकार, हालत यह कि जफरुल खान जैसे मुसलमान कत्ल भी करें तो चर्चा नहीं होती। लेकिन सुधीर चौधरी जैसे हिन्दू आह भी भरें, तो बदनाम हो जाते हैं। क्या हमारे माननीय न्यायाधीश और लेफ्टिनेंट गवर्नर ऐसी दोहरी नैतिकता का जुल्म खत्म करेंगे?

6 thoughts on “जफरुल इस्लाम खान का ट्वीट

  1. bahut sundar aur satik
    kas hindu ka dambh bharane wali partiya bhi aap ki tarah apani ray rakhati to accha hota
    iske liye hindu khud jimmedar hai

  2. आदरणीय आचार्य प्रणाम आप का लेख बहुत ही उपयोगी ज्ञान से पूर्ण है ,आप से निवेदन कि आप एक लेख ऐसा लिखिए जिसमे भारत के युवा इस समस्या से भारत को कैसे मुक्ति दिला सकता है |प्रणाम

  3. Well articulated article delineating the core ideology of Islam through the tweet of Jafrul Islam Khan. This is such a radical ideology that a Hindu convert Jafrul Islam whose ancestors were either forced or lured into Islam, whose great great grandmother like relatives must have been molested in the hands of Muslim marauders, today identifies them as his forefathers.

    I wish every Hindu and Muslim read this article .

  4. आपके लेख तथ्यों से परिपूर्ण व सारगर्भित होते हैं। कोई किसी भी विचारधारा को मानने वाला हो परन्तु उसके पास सही तथ्यों की जानकारी अवश्य पंहुचनी चाहिये ताकि वह अपने विवेक से उन्हें समझ सकें।
    इसके लिये आपको साधुवाद।

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