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दुग्ध सहकारिता है ग्रामीण समृद्धि का मूलमंत्र

संपादकीय डेस्क

आणंद को भारत का मिल्क कैपिटल यानी दुग्ध राजधानी कहा जाता है। इस जगह की पहचान अमूल डेयरी और श्वेत क्रांति से जुड़ी हुई है। इसी शहर में गुजरात को-ऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन लिमिटेड का मुख्यालय है। गुजरात अपने शक्तिशाली सहकारिता आंदोलन पर गर्व करता है। हाल के विधानसभा चुनाव के दौरान राज्य का डेयरी सेक्टर खूब चर्चा में रहा। इसकी वजह इससे जुड़े लाखों लोग हैं, जिनके वोटों की तरफ राजनीतिक दलों की निगाहें हमेशा टिकी रहती हैं। अमूल की स्थापना 1946 में सरदार वल्लभभाई पटेल के सुझाव पर हुई। मकसद बिचौलियो से दुग्ध कारोबार को बचाना था। सहकारिता के आधार पर विकसित हुआ ये कारोबार अब विशाल रूप ले चुका है। इसका संचालन गुजरात को-ऑपरेटिव मिल्क मार्केटिग फेडरेशन करता है।

अमूल ब्रांड को आज अंतरराष्ट्रीय पहचान और प्रतिष्ठा हासिल है। 18,536 डेयरी को-ऑपेरेटिव्स साझा रूप से इस ब्रांड के स्वामी हैं, अमूल रोजाना देश भर में एक करोड़ 20 लाख लीटर दूध की बिक्री करता है, इसमें 50 लाख लीटर की बिक्री अकेले गुजरात में होती है। 2015-16 में गुजरात को-ऑपरेटिव मिल्क मार्केटिग फेडरेशन का सालाना कारोबार 23 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का रहा। जिस सहकारिता मॉडल पर ये फूला-फला है, उससे उद्यमियों की नई पीढ़ी सामने आई है। यह डेयरी सहकारिताओं की ताकत की ही मिसाल है कि इन पर नियंत्रण के लिए भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस में हमेशा रस्साकशी रही है।

भाजपा का दावा है कि उसने इस कारोबार के नेटवर्क को मजबूत किया। 2033-04 में ग्रामीण सहकारिताओं की संख्या सिर्फ साढ़े दस हजार थी, जो आज 18 हजार से ज्यादा हो चुकी है। जबकि कांग्रेस का दावा है कि आज की कामयाबी उसके शासनकाल में हुए प्रयासों का ही परिणाम है। हाल के विधानसभा चुनाव के दौरान दोनों पार्टियों ने डेयरी कारोबार से जुड़े मतदाताओं को लुभाने के लिए खास वायदे किए। गुजरे साढ़े पांच दशकों में गुजरात के डेयरी उत्पादों की पहुंच देश के लाखों गांवों तक बनी है।आज इस के करोड़ों उपभोक्ता हैं, ये खेती-किसानी का ऐसा मॉडल है, जिसका देश की समृद्धि में योगदान रहा है।

मार्केटिंग रिसर्च फर्म आईएमएआरसी के एक अध्ययन के मताबिक 2010 से 2016 के बीच भारत में डेयरी सेक्टर की वार्षिक वृद्धि दर 13 प्रतिशत रही। जनसंख्या में बढ़ोतरी, लोगों की बढ़ती आमदनी, स्वास्थ्य को लेकर आई नई जागरूकता और सरकार की प्रोत्साहन नीति के कारण देश में दुग्ध उत्पादों की खपत बढ़ रही है। 2016 में भारत का डेयरी बाजार सात खरब रुपए का था। अनुमान है कि साल 2022 तक यह 16 खरब रुपए तक पहुंच जाएगा। भारत के डेयरी बाजार का एक बहुत बड़ा हिस्सा आज भी असंगठित है। इस हिस्से जुड़े लोग निजी तौर पर दूध और उससे बने उत्पाद पैदा करते और बेचते हैं। जबकि संगठित क्षेत्र के तहत आने वाली सहकारिताओं और प्राइवेट डेयरीज ने दूध और दुग्ध उत्पादों को किसानों से खरीदने और उन्हें बेचने का एक ठोस तंत्र बनाया हुआ है। जरूरत इस बात की है कि देश भर में उस मॉडल को अपनाया जाए, जिससे गुजरात के किसानों को आर्थिक आजादी मिली है।

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