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बुजुर्ग तय करेंगे जर्मनी का राजनीतिक भविष्य

संपादकीय डेस्क
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जर्मन चुनावों की तैयारियां आखिरी चरण में हैं।सर्वेक्षणों में वर्तमान चांसलर अंगेला मैर्केल का पलड़ा भारी नजर आ रहा है।चुनाव में बुजुर्ग और अनुभवी मतदाताओं को निर्णायक माना जा रहा है। युवा और अनुभवी मतदाताओं की संख्या के बीच दोगुने से भी अधिक का अंतर है। 30 साल या इससे कम उम्र के मतदाताओं को छोटा है। 60 वर्ष या इससे अधिक उम्र के मतदाताओं का कुल हिस्सा 36 फीसदी का है, वहीं 30 साल से कम उम्र के मतदाताओं का हिस्सा महज 15 फीसदी का। पिछले चुनावों में आधे से अधिक मतदाताओं की उम्र 50 वर्ष या इससे अधिक थी। इसके विपरीत 1980 के आंकड़े बताते हैं कि पहले युवा और अनुभवी मतदाताओं के बीच बेहतर संतुलन था। उस वक्त तकरीबन 26.8 फीसदी मतदाता 60 वर्ष या इससे अधिक उम्र के थे, वहीं लगभग 22.3 फीसदी मतदाताओं की उम्र 30 साल से कम थी। लेकिन इस ट्रेंड में धीरे-धीरे बदलाव आया। आज कोई भी पार्टी केवल युवा मतदाताओं के बल पर चुनाव नहीं जीत सकती। वह बुजुर्ग मतदाताओं के भरोसे जीत की उम्मीद जरूर रख सकती है। 

साल 2005 के बाद 70 वर्ष और इससे अधिक उम्र के मतदाताओं की औसत भागीदारी में बढ़ोतरी हुई है। मतदाताओं के इस ट्रेंड को जर्मनी के पूर्व राष्ट्रपति रोमन हैर्सोत्ग की उस चिंता से भी समझा जा सकता है, जो उन्होंने 2008 में पेंशन बढ़ोतरी पर सहमति बनने के बाद व्यक्त की थी। हैर्सोत्ग ने जर्मनी के एक दैनिक अखबार से बातचीत में कहा था- जर्मनी में बुजुर्ग लोगों की संख्या बढ़ रही है और राजनीतिक दल इनके साथ गलत तरीके से खेल रहे हैं। 

हैर्सोत्ग की इस टिप्पणी पर उनकी काफी निंदा हुई थी।अब सवाल है कि क्या जर्मनी के बुजुर्ग मतदाताओं का वोट युवाओं के हितों को प्रभावित करता है। राइनगोल्ड इंस्टीट्यूट और बैर्टल्समन फाउंडेशन के एक अध्ययन के मुताबिक बुजुर्ग और अनुभवी मतदातायुवाओं की तुलना में भविष्य की तरफ ज्यादा ध्यान देते हैं। हालांकि आम धारणा है कि बुजुर्ग पीढ़ी का जोर भविष्य की बजाय वर्तमान पर अधिक होता है।

अध्ययनकर्ता क्रिस्टीना टिलमन कहती हैं-हमने स्टडी में पाया कि जिनकी अपनी राजनीतिक विचारधारा मजबूत होती है, उनके लिए भविष्य को देखते हुए निर्णय लेना आसान होता है। उन्होंने बताया कि 19-32 साल की उम्र वाले युवा चुनावों को लेकर ऐसी सोच नहीं रखते बल्कि वे अपनी व्यक्तिगत जरूरतों के आधार पर मतदान करते हैं।ऐसा भी नहीं है कि मौजूदा समीकरण ही युवा मतदाताओं की चुनावों में हिस्सेदारी सीमित कर रहे हैं। इतिहास पर नजर डालें, तो युवा मतदाताओं की राजनीति और चुनावों में दिलचस्पी 1953 से ही लगातार घटती नजर आ रही है। इसलिए एसपीडी, ग्रीन और वामपंथी पार्टियों ने लगातार मतदान की उम्र को घटाने के पक्ष में बात की है। ग्रीन पार्टी के नेता अंटोन होफराइटर के मुताबिक वर्तमान में लिए जाने फैसले युवा पीढ़ी को लंबे समय तक प्रभावित करेंगे, इसलिए जो भी मतदाता 16 साल की उम्र से वोट देना चाहते हैं उन्हें इसकी अनुमति मिलनी चाहिए।

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