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नेपाल में भारत के लिए नई चुनौती

संपादकीय डेस्क
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नेपाल में आम चुनाव के नतीजों से स्पष्ट हो चुका है कि देश में कम्युनिस्ट सरकार बनेगी। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ नेपाल- एकीकृत मार्क्सिस्ट लेनिनिस्ट (सीपीएन-यूएमएल) और द नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी- माओइस्ट सेंटर ने चुनाव पूर्व गठबंधन कर लिया था। संसद में इस गठबंधन ने बहुमत हासिल कर लिया है। नेपाली कांग्रेस को चुनावों में गहरा झटका लगा है। नेपाली संसद की 165 सीटों के लिए प्रत्यक्ष चुनाव होता है और 110 सीटों का फैसला दलों के आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर किया जाता है। बहरहाल, वाम दलों की भारी जीत से भारत के साथ नेपाल के रिश्तों को लेकर अटकलें लगाई जाने लगी हैं। जाहिर है कि सीपीएन-यूएमएल के नेता केपी ओली वापस प्रधानमंत्री पद पर आते हैं, तो भारत को रिश्तों की सहजता के लिए कड़े प्रयत्न करने होंगे। ओली का झुकाव चीन की ओर माना जाता है।

इस समय दक्षिण एशिया के छोटे देश- चाहे वो श्रीलंका हो या मालदीव, वे चीन के असर में हैं। श्रीलंका और मालदीव, चीन की समुद्री सिल्करूट परियोजना के अहम पड़ाव हैं, तो नेपाल चीन के महत्वाकांक्षी वन बेल्ट वन रोड अभियान का एक अहम बिंदु है। बांग्लादेश भी रोहिंग्या संकट से छुटकारा पाने में चीन के हाल के फॉर्मूले का स्वागत कर चुका है। पाकिस्तान तो चीन का घोषित मित्र और ‘छोटा भाई' माना ही जाता है। इस रूप में चीन की ओर से भारत की अघोषित ‘घेरेबंदी' दिख रही है। इसीलिए भारत के लिए अपने पड़ोसियों के साथ संबंधों में सुधार की जरूरत महसूस की जा रही है। इसलिए ये भारत के हित में है कि वो नेपाल की आगामी सरकार के साथ अपने रिश्ते फुर्ती से सामान्य बनाए और उसे हर संभव मदद का एक पक्का भरोसा दिलाए। अन्यथा संवादहीनता का फायदा उठाने में चीन देरी नहीं करेगा।

भारत को ये दिखाने की कोशिश करनी होगी कि वो वास्तव में नेपाल की लोकतांत्रिक महत्वाकांक्षाओं और राजनीतिक गरिमा का हितैषी है। इसके लिए भारत को चाहिए कि नेपाल के हर छोटे बड़े अंदरूनी मामले में दखल देने से बाज आए। नेपाल के लिए भी भारत के साथ दोस्ताना संबंध बनाए रखना हर हाल में जरूरी हैं। अपनी ईंधन आपूर्तियों और अन्य जरूरतों के लिए नेपाल पूरी तरह से भारत पर निर्भर है। दोनों देशों की सरकारों की तल्खी का असर आम नागरिकों पर नहीं पड़ना चाहिए। भारत को ये भी ध्यान रखना चाहिए कि नेपाल के साथ उसका रिश्ता किसी मजबूरी या स्वार्थ के वशीभूत न हो। चीन तो यही चाहेगा कि नेपाल उससे मदद मांगने की स्थिति में रहे। लेकिन भारत को चीनी सामरिकता की इस चालाकी को समझते हुए नेपाल के साथ अपने संबंधों को नई दिशा देनी चाहिए। नेपाल को भी ये सोचना होगा कि उसका स्वाभाविक मित्र कौन हो सकता है। वो अपने भूगोल के सामरिक महत्त्व के आधार पर भारत पर अन्यथा दबाव नहीं बनाए रख सकता। दोनों देशों को पारस्परिक सांस्कृतिक, आर्थिक और ऐतिहासिक जुड़ाव को नहीं भूलना चाहिए। रोटी-बेटी के संबंध से लेकर रोजमर्रा की इकॉनोमी, आवाजाही और सामाजिक आंदोलनों और पर्यटन तक भारत-नेपाल मैत्री के सूत्र बिखरे हुए हैं। 

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