Loading... Please wait...

जबरा मारे और रोने भी न दे!

प्रदीप श्रीवास्तव— पूर्वी उत्तरप्रदेश में एक कहावत है ‘जबरा मारे और रोने भी न दे’? केंद्र में विपक्ष की कमोबेश यही स्थिति है। संसद के दोनों सदनों में बजट सत्र के दूसरे चरण में जो कुछ हुआ उससे सरकार के रवैए की वजह से जनता के सामने विपक्ष जो दुखड़ा सुनाना चाह रही थी उसका हक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी ने छीन लिया।

लेकिन मुहावरे से एक कदम आगे बढ़ जबरा खुद रोने लगा। सत्र के अंतिम दिन संसद परिसर में भाजपा के सांसद और ढेरों मंत्रियों ने धरना दिया। आरोप लगाया कि विपक्ष संसद नहीं चलने दे रही है। कांग्रेस संसद में कामकाज में अवरोध डाल रही है। फिर इस गुरुवार को इसी आरोप को राष्ट्रीय मुद्दा बना कर प्रधानमंत्री समेत पूरी पार्टी और सरकार ने देश भर में जगह-जगह जा कर ‘उपवास’ का नाटक किया। केन्द्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि कांग्रेस और विपक्षी पार्टियों ने संसद नहीं चलने दी जिसके कारण हमें उपवास करना पड़ा है। इतना ही नहीं इस उपवास को बकायादा राष्ट्रीय समारोह के रूप में बदला गया। पीएम ने अनशन के लिए सांसदों को आडियो संदेश दिया। मंत्री और भाजपा सांसद कई जगहों पर तंबू लगा, पोस्टर, बैनर चस्पा लगाए बैठे। यानी करोड़ों रुपए खर्च हुए।

इसके पहले शायद ही कभी किसी प्रधान मंत्री, उसके मंत्रिमंडल या सत्तारूढ़ दल के सांसदों ने राजनीतिक मुद्दों को लेकर अनशन का इस तरह का नाटक किया हो। नाटक इसलिए क्योंकि सामान्यतः उपवास, धरना, प्रदर्शन अपनी उन मांगों को लेकर किया जाता है जिन्हें संबंधित प्रशासन, सरकार नहीं मानती है। या फिर सरकार के खिलाफ अहिंसात्मक तरीके से अपनी असहमति दिखाने के लिए। पर महात्मा गांधी ने कल्पना तक नहीं की होगी कि उनके इस हथियार का इस्तेमाल आगे चलकर सरकारें भी करने लगेंगी। वह भी बकायादा राष्ट्रीय उत्सव के रूप में।

प्रधानमंत्री ने अपने सांसदों और विधायकों को देश के सभी 600 जिला मुख्यालयों पर उपवास करने का निर्देश दिया। उन्होंने उनसे अपील की कि लोकतंत्र का गला घोटने वालों के खिलाफ आप सभी लोग गुरुवार को उपवास करें। सवाल है कि क्या वाकई विपक्ष लोकतंत्र का गला घोंट रहा है? उससे भी पहले असल सवाल यह है कि क्या वाकई 23 दिन जो संसद नहीं चली उसका जिम्मेदार विपक्ष था? इस सवाल पर बाद में आते हैं। यदि संसदीय रिकार्ड उठा कर देखें तो पता चल जाएगा, संसद को ठप कराने में भाजपा की कोशिशें और उसकी विशेषज्ञता कांग्रेस की अपेक्षा बहुत ज्यादा रही है। तीन-चार लोकसभा में सत्ता में रहने के अलावा भाजपा ज्यादातर समय विपक्ष की बेंचों पर रही है। उस दौरान एक-एक महीने से ज्यादा दिनों तक उसने संसद की कार्यवाही ठप कराई। संसद का पूरा का पूरा सत्र बगैर कार्रवाई के खत्म हुआ। फिर इस बार क्या ऐसा हुआ कि संसद के कामकाज को अपने पूरे दमखम से नष्ट कराने का रिकार्ड रखने वाले भाजपा नेताओं को सत्र खत्म होने के साथ यह लगने लगा कि ‘मुट्ठी भर ऐसी मानसिकता वाले लोग लोकतंत्र की हत्या कर रहे हैं।‘ ऐसी हत्या क्या पहली बार हुई है?

संसद को चलाने की जिम्मेदारी किसकी है, इसे संसदीय राजनीति का मामूली जानकारी वाला व्यक्ति भी जानता है। सच पूछा जाए तो जिस तरह सत्तारूढ़ पार्टी, मंत्रियों और प्रधानमंत्री का अनशन करना ऐतिहासिक है उसी तरह पिछले सत्र में जो कुछ हुआ वह भी ऐतिहासिक रहा। सरकार कह रही है कि उसे काम नहीं करने दिया गया। वास्तविकता यह है कि सरकार को जो काम करना था वह उसने इस सत्र में निपटा लिया। संसदीय परंपराओं को दरकिनार कर हल्ले हंगामे में बगैर चर्चा के न केवल पूरा बजट, बल्कि अपने संशोधनों को भी सरकार ने पारित करा लिया। जो दस्तावेज, जो रिपोर्ट उसके थे वह भी दोनों सदन में पेश हुए।

ठिक विपरित विपक्ष और जनता के उद्देश्य इस सत्र में पूरे नहीं हुए। उन्हें पूरा नहीं होने दिया गया। बैंक घोटाला, दलित उत्पीड़न, किसान समस्या जैसे सात मुद्दों पर चर्चा कराने के लिए विपक्ष द्वारा दिए गए नोटिस जस के तस पड़े रहे। कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के नेता प्रेस कांफ्रेंस कर के इस दौरान यह रोना रोते रहे कि हम नहीं, बल्कि सरकार को समर्थन दे रही एक पार्टी की वजह से संसद की कार्यवाही नहीं चल रही है, यह सरकार और उस पार्टी की मिलीजुली साजिश का नतीजा है जो संसद नहीं चल रही है। वे यह भी रोते रहे कि लोकसभा और राज्य सभा के रिकार्ड में सरकार जो कुछ सदन में कह रही है, वह आ रहा है लेकिन हमारे बयान रिकार्ड नहीं हो रहे है। मतलब 10-15 साल बाद संसदीय इतिहास को जो भी पढ़ेगा वह आज के वक्त की संसदीय कार्रवाई में झूठ का इतिहास पढ़ेगा।

पिछले सत्र में पहली बार दिखाई दिया कि सरकार को अभी तक समर्थन देने वाली पार्टी के दर्जनभर सांसद आसन के समीप जा कर हल्ला मचाते रहे जबकि जरूरी विधेयक, यहां तक की अविश्वास प्रस्ताव के नोटिस हफ्ते भर से ज्यादा जस के तस लोकसभा अध्यक्ष की मेज पर पड़े रहे। आश्चर्य की बात यह कि सदन में संसदीय कार्य मंत्री हंगामा करने वाली पार्टी को लक्ष्य न कर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस को दोषी ठहरा रहे थे जबकि सदन के बाहर विपक्षी दल के नेता कह रहे थे कि हम तो शांति से अपनी जगहों पर बैठे हैं और सरकार हमारे ऊपर गलत आरोप लगा रही है।

ये सारे गंभीर मामले हैं। जो लोग संसद की कार्यवाही सीधे देख रहे थे उन्हें बहुत कुछ नजर आ रहा था, पर जो संसद के बाहर टेलीविजन पर देख रहे थे, उन्हें वही नजर आया जो कैमरे से दिखलवाया या वही आवाज सुनावाई जा रही थे जिनके माइक्रोफोन आन थे। संसद की कार्यवाही को जो लंबे समय से देख रहे हैं उन्हें इस बात पर आश्चर्य है कि महज दर्जन भर सांसद जो हफ्ते भर से अध्यक्ष के मेज के सामने, उनके पास जा कर अशोभनीय तरीके से बैनर, पोस्टर लहराते रहे, संसद को चलने नहीं दे रहे थे उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही है? मार्शल का इस्तेमाल कर संसद को बाधित होने से बचाया क्यों नहीं जा रहा है? जबकि पूर्व लोक सभा अध्यक्ष बालयोगी के समय सभी पार्टियों की आम सहमति से इस मामले में सख्त आचार संहिता बना दी गई थी।  यही नहीं इन नियमों का सदन में कई बार इस्तेमाल भी किया गया है।

6 अप्रैल तक रोज सदन की कार्यवाही शुरू होती और कुछ मिनट में ही दिनभर के लिए स्थगित कर दी जाती। विपक्ष के कुछ नेता उस दौरान खुला आरोप लगा रहे थे कि भाजपा संसद को चलने नहीं देना चाहती, इसलिए न तो वह अन्नाद्रमुक को शांत करा रही है और न ही उनके खिलाफ कार्रवाई हो रही है। पीएम कावेरी विवाद पर एक बयान देकर भी उन्हें शांत करा सकते थे। दूसरी तरफ भाजपा यह भी नहीं चाहती थी कि बैठक को अनिश्चितकालीन के लिए स्थगित कर दिया जाए।

इसकी वजह भाजपा के ही एक वरिष्ठ नेता ने सत्र खत्म होने के तीन दिन पहले मुझे बताई । उनका कहना था कि कर्नाटक चुनाव के चलते भाजपा के रणनीतिकार अविश्वास प्रस्ताव या किसी मुद्दे पर चर्चा नहीं चाहते। चर्चा होगी तो सरकार के खिलाफ सवाल उठाए जाएंगे। आरोप लगाए जाएंगे और माना जा रहा है कि इसका असर कर्नाटक के मतदाताओं पर पड़ सकता है। दूसरे विश्वास प्रस्ताव पर मतदान हुआ तो तेलगूदेशम्, शिवसेना जैसी समर्थक पार्टियों का जो मौजूदा रुख है उसमें इस बात का खटका है कि वे सरकार के खिलाफ मतविभाजन के वक्त  वोट नहीं दे या अनुपस्थित रह कर विरोध जता डाले। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा रणनीतिकार नहीं चाहते है कि चार साल के भीतर सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में चर्चा होने का मैसेज आम जनता में जाए। दूसरा, डर इस बात का भी था कि मतविभाजन में राजग बिखरा नजर आएगा। अगर इनमें से किसी ने सरकार के खिलाफ कोई मुद्दा उठाया तो भद पिटेगी।

इन सबके चलते रणनीति बनाई गई कि संसद भले नहीं चले, पर इसे बीच में अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर विपक्ष को यह मौका नहीं देना है कि वह जनता के बीच जा कर कहे सरकार चर्चा नहीं चाहती थी इसलिए भाग गई। इसकी जगह यह संदेश देना उचित होगा कि सरकार तो हर मुद्दे पर चर्चा के पक्ष में थी लेकिन कांग्रेस और विपक्ष ने सदन की कार्यवाही नहीं चलने दी और संसद के समय और जनता के पैसे का नुकसान किया। कांग्रेस के पूर्व केन्द्रीय मंत्री के मुताबिक सत्र खत्म होते ही चैनलों और अन्य मीडिया में यह हिसाब-किताब आने लगा था कि कितना करोड़ रुपए सदन की कार्यवाही में खर्च हुए और किसकी वजह से यह खर्च बेकार गया। देशभर में भाजपा सांसदों के धरने-प्रदर्शन का आयोजन भी इसी रणनीति में हुआ है।

243 Views

बताएं अपनी राय!

नीचे नजर आ रहे कॉमेंट अपने आप साइट पर लाइव हो रहे है। हमने फिल्टर लगा रखे है ताकि कोई आपत्तिजनक शब्द, कॉमेंट लाइव न हो पाए। यदि ऐसा कोई कॉमेंट- टिप्पणी लाइव हुई और लगी हुई है जिसमें अर्नगल और आपत्तिजनक बात लगती है, गाली या गंदी-अभर्द भाषा है या व्यक्तिगत आक्षेप है तो उस कॉमेंट के साथ लगे ‘ आपत्तिजनक’ लिंक पर क्लिक करें। उसके बाद आपत्ति का कारण चुने और सबमिट करें। हम उस पर कार्रवाई करते उसे जल्द से जल्द हटा देगें। अपनी टिप्पणी खोजने के लिए अपने कीबोर्ड पर एकसाथ crtl और F दबाएं व अपना नाम टाइप करें।

आपका कॉमेट लाइव होते ही इसकी सूचना ईमेल से आपको जाएगी।

© 2016 nayaindia digital pvt.ltd.
Maintained by Netleon Technologies Pvt Ltd